दहेज सभ्य समाज के आधारहीन प्रतिष्ठा

Posted by Abhimanyu Kumar
January 10, 2018

Self-Published

प्राचीन काल में शादी के वक्त लड़की को उनके परिवार वालों की तरफ से कुछ दैनिक उपयोग एव अन्य बहमूल्य से लेकर साधारण सामान दिया जाता था। जिससे कि वो खुशहाली से अपना जीवन व्यतीत कर सकें। पहले यह प्रथा सिर्फ राजा-महाराजा के स्तर तक ही सीमित था जो आगे चल सर्व-सधारण तक धीरे-धीरे ही सही लेकिन अपना जड़ जमा लिया। किन्तु यह तब तक सही था या यूं कहें की जब तक यह लड़की के परिवार के अनुरूप लेन-देन होता रहा यह एक हद तक सही रहा किन्तु बदलते हालातों ने इस खुशी से होने वाले लेन-देन को दहेज का रूप दे दिया अर्थात लड़की की शादी के समय लड़की के परिवार वालों के द्वारा लड़के या उसके परिवार वालों को नगद या किसी भी प्रकार की किमती चीज़ बिना मूल्य में देने को दहेज़ कहा जाने लगा। जिसका अर्थ यह है कि लड़के के परिवार वालों के द्वारा अपने लड़के की मूल्य भी समझा जा सकता है। वर्तमान समय मे दहेज प्रथा एक सामाजिक समस्या के साथ ही यह सभ्य समाज के लिए एक अभिशाप है। दहेज प्रथा गैर कानूनी होने के बावजूद यह ‘दहेज लोभी समाज के सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार ‘ बन चुका है। जो की समाज के आदर्शवादी होने पर सवालिया निशान लगा देता है। जिसे हम और आप ही आज तक बढ़ावा दे रहे है। वर्तमान स्तिथि तो यह है कि शादी के वक्त लोग मनमानी करने लगें और आज यही लेन-देन की प्रकिया जो कि दहेज प्रथा रूपी वट वृक्ष बन चुका है जो अपने आगोश में समाज को समाहित कर उसे धीरे-धीरे ही सही किन्तु आज इतने हद तक खोखला कर चुकी है की अगर आज के युवा पीढ़ी इस विषय पे अपना सकरात्मक रुख अख्तियार नही करेंगे तो यह समाज को पूर्णतः खोखला और बेमतलब कर देगा। ये प्रथा समाज के साथ ही साथ हमारे वैवाहिक जिंदगी को भी खोखला करती है। लेकिन अब वक्त आ गया है कि हमें दहेज प्रथा के खिलाफ एकजूट हो कर अपना आवाज बुलन्द करना चाहिए। क्योंकि हर एक समस्या का समाधान भी उसके अंदर ही होता है इस तरह से दहेज प्रथा का समाधान भी इसी प्रथा में ही है। बस हमे दहेज लेने और देने की आदत को ‘हाँ’ से ‘ना’ में बदलना होगा। क्योंकि समाज को अपूर्ण होने से बचाने में जितना साथ कि जरूरत लड़को से है उससे तनिक भी कम लड़कियों से नही है।
अगर हम सच मे दहेज प्रथा का उन्मूलन चाहते है तो हमे निम्न दो बातों को अपनाना होगा।
पहला – तेरी ही बगिया में खिली, तितली बन आसमां में उड़ी हूँ, मेरी उड़ान को तू शर्मिंदा ना कर, ए बाबूल मुझे दहेज़ देकर बिदा ना कर अर्थात अगर आप लड़की है तो आप कभी भी ऐसी घर मे शादी करने के लिए अपने परिवार को स्वीकृति न दे जो दहेज की मांग कर रहा हो।
दूसरा – महात्मा गाँधी ने दहेज प्रथा के बारे में कहा था कि जो भी व्यक्ति दहेज को शादी की जरूरी शर्त बना देता है तो वह अपने अर्जित शिक्षा के साथ ही अपने देश को भी बदनाम करता है और साथ ही साथ पूरी महिला जात को भी अर्थात अगर आप लड़का है तो आप दहेज को अपने शादी यानि वैवाहिक जिंदगी का हिस्सा ना बनने दे, जिससे आपके आने वाली पीढ़ी उससे प्रभावित ना हो।
बस समस्या हम में ही है। हम दहेज प्रथा को पूरी तरह नाकामयाब बना सकते है अगर हम अपने आप को पूरी तरह इसके लिए जिम्मेदार मान कर समाज की इस बुरी कुरीति से लड़ते है और ” न दहेज़ देंगे और न दहेज़ लेंगे “ इस विचार को आत्मसात करते है जब हम शुरुआत करेंगे तभी परिवर्तन आएगा क्योकि यह एक दिन में ठीक नहीं होने वाला रोग नही है। यह रोग समाज के लिए प्राणघातक है अन्तः परिवर्तन तभी होगा जब हम सब लोग मिलकर दहेज रूपी दानव के खिलाफ लड़ें।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.