दुनियादारी मज़बूरी नहीं, इंसान की दोगली सोच

Posted by PREETY MAHAWAR
January 13, 2018

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सभ्य समाज में लोगों को दोगलापन शब्द सुनना अक्सर नापसंद होता है| अगर दोगलेपन को चाशनी में डूबा दिया जाये तो वो दुनियादारी बन जाता है| हाँ अब शायद उन सभ्य समाज के सभ्य लोगों को ये शब्द सुनने में या पढने में बुरा न लगे| यही तो है दुनियाभर के उन सभी सभ्य लोगो की सच्चाई| जिसे बदलना आज की मांग और भविष्य की ज़रूरत है| ऐसे लोग जो दुनियादारी की आड़ में किसी को दुःख देते हैं, उन्हें यह समझने की ज़रूरत है की यह उनका दोगलापन है| जो एक खालिस मानसिक रोग है| यह एक ऐसी बीमारी जिसका इलाज आप खुद घर बैठे, वो भी मुफ्त कर सकते हैं| और इसकी दवाई के लिए भी आपको किसी केमिस्ट शॉप पर जाने की भी ज़रूरत नहीं| वो भी आपके ही पास है| वह दवाई है आप ही की इमानदारी|

इन्सान अक्सर अपने स्वार्थ की खातिर, अपनी ईगो सैटिसफैकशन के लिए, अपने झूठे दिखावे के लिए या यूँ कहें की अपनी कमियों को छुपाने के लिए बेशुमार झूठ का सहारा लेता है और उसे न सिर्फ बड़ी आसानी से बल्कि बहुत ही ज्यादा बेशर्मी के साथ दुनियादारी का नाम दे देता है| और वो इतने पर ही नही रुकता, वह यह भी चाहता है की उसके ज़हर से लिपटे हुए झूठ को सच मान लिया जाये और साथ ही उसे वो सब मिल जाना चाहिए जिसकी उसे चाह है| वो सभी खुशियाँ, वो सुख, वो ऐशों-आराम, नाम, दौलत, और उन सब से बढ़ कर झूठी शौहरत|

समाज ‘उसे’ या यूँ कहूँ ऐसे लोगों को वो इज्ज़त्त, दौलत, शौहरत, ऐशों-आराम सब बड़ी ही आसानी से दे भी देता है| क्यों ? क्योंकि समाज में ज़्यादातर लोग खुद भी उसी दोगलेपन की बीमारी के शिकार हैं| ऐसे लोग अक्सर दुनियादारी को मज़बूरी का नाम देते हैं जबकि मज़बूरी उनका झूठ है जो उन्हें सच कहने से रोकता है, मज़बूरी उनकी क्षीण मानसिकता है जो उन्हें ईमानदार बनाने में रोड़े डालती है| मज़बूरी उनकी गलत पैदाइश है जो बेटी को संस्कारों का पाठ पढ़ाते हैं और बेटे को कहते हैं “यही तो उम्र है इसकी अईयाशीयाँ करने की, अगर बहक भी जाये तो क्या हो गया, मज़बूरी वो सिरफिरे माँ बाप है जो अपने बच्चों को कभी अपने अन्दर का सच देखने का मौका तक नही देते| मज़बूरी वो बेशर्मी से भरा बेशुमार लाड प्यार है जो कभी उन्हें खुद पर नियंत्रण रखना ही नहीं सिखाती, मज़बूरी वो अर्थहीन बकवास है जो उन्हें अपने मूह पर लगाम लगाना ही नहीं सिखाती, मज़बूरी उनकी ख़राब सामाजिक दशा है जो उन्हें खुले-आम पोर्न परोसता है, मज़बूरी इन्टरनेट पर मौजूद गिरी हुई सोच के पुलिंदे, कामचोर जलकुकड़े लोगों का हुजूम है जो उन्हें बताती है की सेक्स करना एक फिजिकल नीड है और इसे पूरा करने वाला लड़का स्टड, जवान खून, मर्द का बच्चा, शरीफ साउ पुत्तर, गबरू जवान होता है तो वही अगर लड़की ऐसा करे तो वो टोट्टा, होर, छमिया, स्ल्ट, या केरेक्टरलैस, बेशर्म होती है, और जो लड़का या लड़की ऐसा न करे वो नॉट सो कूल या गंवार होते हैं| मज़बूरी वो अनपढ़ता है जो होते तो पोस्ट ग्रेजुएट है पर इंसान में ज़ात/ जगह/ धर्म/ रंग/ लिंग/ अमीरी-गरीबी का भेद करते हैं| मज़बूरी उनकी वो ख़राब संगत है जो बार बार उन्हें जुर्म करने के लिए, उन्हें गलत रास्ते जाने के लिए उकसाते हैं, मज़बूरी उनकी वैहशियत है जो उन्हें जानवर से इंसान बनने से रोकती है| और न जाने ऐसी हज़ारों मजबूरियां जो हमारी ही बनाई हुई है और इसकी सिर्फ और सिर्फ एक ही दवाई है इमानदारी|

वो इमानदारी जैसे नवजात बच्चे की कोमलता, प्यारी माँ की ममता, जैसे पिता की सक्षमता, भाई की सरलता, बहन की निश्चलता, बाबा-दादी की प्रगाढ़ता, नाना-नानी की सौम्यता, पति की कर्मठता, तो जैसे पत्नी की सहजता, प्रेमियों की आतुरता, तो दोस्त की प्रमाणिकता, जैसे एक शिक्षक की निर्मलता तो वहीँ शिष्यों की समर्पणता, जैसे फूलों की सुगंधिता, नदियों की कलरवता, तो दो किनारों की विरहता, जैसे ऋतुओं की चंचलता, त्योहारों की विहंगमता, जैसे पूजा की पवित्रता, और ऐसी सैकड़ों उपमाएं है जो इमानदारी को परिभाषित करती है| और यह कभी न खत्म होने वाला सिलसिला है|

हमारा आज, हमें चिल्ला चिल्ला कर कह रहा है की बदलो, अपने अन्दर की सच्चाई को अपनी अच्छाइयों को जगाओ| अपनी इमानदारी से न सिर्फ अपनी बुराइयों को, अपनी दुनियादारी को बल्कि अपने दोगलेपन को अपनी इमानदारी से हमेशा के लिए नेस्तोनाबूत कर दो| हमारे आज को हमारी इमानदारी की ज़रूरत है| बिना इमानदारी के हम न तो राम-राज्य बना सकते हैं और न ही कभी किसी पढ़े-लिखे सभ्य समाज की कल्पना कर सकते हैं| क्योंकि पढेगी दुनिया तभी तो बढ़ेगी दुनिया…. इमानदारी जिंदाबाद !

प्रीति महावर @journalistpreet

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