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नई उम्मीद और नए संकल्प का नया साल।

Posted by Sandeep Suman
January 1, 2018

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वर्ष के 365 दिन बीत गए हमे पता भी नहीं चला, पृथ्वी सूर्य का पूरा एक चक्र लगा आई और हम वही के वही ठहरे रह गए। पिछले साल के कुछ खट्टे-मिट्ठे अनुभव हमारे साथ रह जाते है, लेकिन हर साल नई उम्मीदे लेकर आता है,पूरी दुनिया जोशोखरोश से स्वागत करती है। पहला नया साल का उत्सव करीब 4000 वर्ष पूर्व रोम के सम्राट जूलियस सीज़र द्वारा मनाया गया। उसने महीने का नाम Janus, जो की रोमन दरवाजे और द्वार के देवता थे उनके नाम पर रखा। चुकी जानूस के दो चेहरे होते है एक आगे के ओर दूसरा पीछे की ओर, इसी कारन पहले महीने का नाम उनके नाम पर रखा गया।
नया साल मानाने की पीछे की मान्यता है कि साल का पहला दिन अगर उत्साह और खुशियों के साथ मनाया जाए तो पूरा साल उत्साह और खुशियों के साथ व्यतीत होगा, शुरुआत अच्छी तो आगे का सफर भी सुखद हो जाता है। वास्तविक जीवन में ऐसा होता नहीं, जीवन की सच्चाई है कि हर दिन एक सामान नहीं होता, कभी खुशियां है तो कभी गम भी हमारे हिस्से में पड़ता है, उतार-चढ़ाव जीवन का अभिन्न अंग है, लेकिन नया साल हमें नए शुरुआत के लिए प्रेरित करता है, एक उम्मीद को को हमारे मध्य जीवित करता है कि आज से पुनः एक नए दौर की शुरुआत की जाए, जो पीछे छूट गया उसे भुला कर एक नए कल की नींव रखे, जो कल न पा सके उसे अब पाया जाए। क्योंकि कहा गया है ‘बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि लेय। यानि बीती बातो को पकड़ के बैठने से कुछ हासिल नहीं होने वाला, भविष्य की चिंतन करे। यही मनुष्य का धर्म भी होना चाहिए की वो अपने अमूल्य जीवन को यूँ व्यर्थ न कर अपने जीवन के हर पहलू को आने वाले कल को खुल की जिए और उसका संम्मान करे।
समय हमें रचता है और हम समय को रचते है, किन्तु समय की रचना सब नहीं कर पाते है। आवश्यक है इसके लिए समय की सही पहचान और उसेअपने अनुकूल मोड़ देने का सामर्थ्य। समय या तो हमारे अनुकूल होता है या प्रतिकूल। समय को अपने अनुकूल करने के लिए हमे समय के साथ संघर्ष करना होता है, जैसे धरा के विरुद्ध तैरने के लिए नदी में धारा के विरुद्ध बल लगाना होता है तब कही जाके हम अपने लक्ष्य को प्राप्त करते है। समय को अपने अनुकूल करने के लिए समय से, उससे उत्पनं, परिस्थितियों से हमेशा संघर्ष करना होता है। यही समय के प्रति संघर्ष कर्म कहलाता है। समय का दास बनाना आसान है, किन्तु समय का साथी बनाना बहुत कठिन, हमे हमेशा समय का साथी बनने का प्रयत्न करनी चाहिए क्योंकि जीवन उससे ज्यादा सफल होगा, दास बनने की अपेक्षा।
यूँ तो नए साल के ख़ुशी में दिल से मांगी दुआ ज्यादा कारगर सिद्ध होती है, किन्तु आज उपभोग्तावादी समाज में, दिल मांगे मोर वाली संस्कृति का ज्यादा जोर है। आज व्हाट्स एप और सोशल मीडिया, ग्रीटिंग्स कार्ड का स्थान ले ली है, रिश्तेदारों के घर जाने की परंपरा ने गूगल डुओ और स्काइप ने ले ली है। हमारी खुशियां और खुशियां मानाने का तरीका दोनों आज मशीन का गुलाम सी हो गई है, समय बचत के इस दौर में समय की अहमियत कही गम सी हो गई है। आज नववर्ष को हमे तय करना चाहिए की हम समय के साथी बने न की गुलाम, समय को सम्मान दे उसकी अहमियत को समझने की। आज से पूरे 365 दिन हमारे साथ है, एक नए उम्मीद और नए उत्साह के साथ इसका स्वागत कीजिए, साथ ही साथ अपने निजी सामाजिक और सार्वजनिक भूमिकाओं को ज्यादा जिम्मेदारी और मजबूत साझेदारी के साथ निभाएं। सभों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

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