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सामाजिक नफरत कम करने से ही कम होंगे ऑनलाइन ट्रोल्स

Posted by Aseem Trivedi in #NoPlace4Hate
January 18, 2018
Facebook logoEditor’s Note: With #NoPlace4Hate, Youth Ki Awaaz and Facebook have joined hands to help make the Internet a safer space for all. Watch this space for powerful stories of how young people are mobilising support and speaking out against online bullying.

गॉडफादर फिल्म में टॉम हैगन एक बार कहते हैं, “मिस्टर कॉर्लिओने इज़ अ मैन हू इन्सिस्ट्स ऑन हियरिंग बैड न्यूज़ इमीडिएटली।” कायदे से देखा जाए तो हम सबको ऐसा ही करना चाहिए। बुरी बातें जितनी देर छिपी रहती हैं, उतनी ही घातक होती जाती हैं और जितनी जल्दी सामने आ जाएं उतनी ही संभावना होती है उनमें सुधार करने की। हम बीमारियों के बारे में जानते हैं कि जितना ज़ल्दी डिटेक्ट हो जाएं उतनी ही आसानी होती है उनके इलाज में।

ठीक यही बात सामाजिक बीमारियों पर भी लागू होती है। सोशल मीडिया ट्रोलिंग कितनी भी बुरी बात हो पर हम इसका ये एहसान नहीं भूल सकते कि इसने समाज में पनप रही नफरत और हिंसा की भावना को हमारे सामने ला दिया है। हमारे देश की एक ऐसी तस्वीर सामने रखी है, जिसका हमें कोई आईडिया ही नहीं था। जहां नफरत है, हिंसा है, गुंडई है। अहिंसा, सद्भाव और प्रेम का कहीं दूर दूर तक नाम भी नहीं है। ऐसा नहीं है कि हम पहले एकदम बेखबर थे। पर स्थिति इतनी बुरी होगी, इसका अंदाज़ा भी शायद ही किसी को रहा हो।

अब पता लग गया है तो इसकी वजह खोजनी होगी। जिस तरह के राजनीतिक और धार्मिक ठेकेदारों ने इसे यहां तक पहुचाया है, उनकी पड़ताल करनी होगी। किस तरह ये उन्माद देश भर में हावी हो गया है, उसे जानना होगा और ठीक करना होगा। लेकिन सबसे ज़रूरी बात ये हुई है कि हमें पता लग गया है कि हम किस तरह के लोगों से घिरे हुए हैं। ठीक करने से पहले ज़रूरी है, सावधान रहना।

मैं नहीं कह रहा कि हम डर जाएं लेकिन इसे नज़रअंदाज़ करके न चलें कि आप जिस समाज में रह रहे हैं उसकी हालत कैसी है। बात सिर्फ ट्रोलिंग या गाली गलौच की नहीं है, बात चरित्र की है। जो सोशल मीडिया पर हिंसक और नफरत से भरा हुआ दिखता है, वो असल जीवन में भी बहुत सामान्य व्यक्ति तो नहीं होगा। सोशल मीडिया पर तो आप अपनी सेटिंग्स में बदलाव करके या ब्लॉक करके इन लोगों से दूरी बना सकते हैं। पर आपको नहीं पता कि इस व्यक्ति को मेट्रो में या सड़क पर कैसे पहचानेंगे। असामान्य लोगों के साथ रहना पड़े तो एक सीमा तक सावधानी ज़रूरी हो जाती है।

एक बड़ा डर उन लोगों के जैसा हो जाने का भी है। नफरती और हिंसक लोगों की भीड़ उस ज़ॉम्बी समूह जैसी होती है जो दूसरों को भी ज़ॉम्बी बनाना चाहती है। हिंसा ही हिंसा की सहज प्रतिक्रया है, चाहे विचारों की हो या कर्म की। और इसी से सबसे ज़्यादा सावधान रहने की ज़रूरत है। अपने विचारों और बातों में रिएक्शनरी होना इस हिंसा और नफरत को और बढ़ाएगा। ज़रूरत है संभलकर हल खोजने की।.नफरत का वास्तविक हल प्रेम ही हो सकता है लेकिन इसकी मैकेनिज़्म खोजना ही सबसे कठिन भी है।

बहुत लम्बे समय तक अवसरवादी राजनेताओं ने, कट्टर धर्मगुरुओं ने, मारधाड़ और दबंगई से भरपूर घटिया सिनेमा और आम जन से दूर खड़े साहित्य ने मिलकर देश को यहाँ पहुचाया है। जहां हर कोई गाली देकर या हिंसा भड़का कर हीरो बनना चाहता है। अपने देश में ही गांधी बिलकुल हाशिये पर खड़े नज़र आते हैं। ये सब अचानक से कतई नहीं हुआ। एक लम्बी यात्रा रही है इस गिरावट की। इसे पलटना या सुधारना भी इतनी ज़ल्दी नहीं हो सकता। फिलहाल बहस को दूसरों मुद्दों की तरफ भटकाना ही शायद सही ढंग होगा। नफरत के इस नैरेटिव पर बहस करने से हम इसे और हवा ही देंगे। इसे नज़रंदाज़ करना होगा। इस नफरत को भी, गालियों को भी। दूसरी बातें करनी होंगी और जहां गलती हुई है वहीं सुधारना होगा।

गालियों का जवाब गालियों से देना आसान है, बच्चे ऐसा ही करते हैं। लेकिन ज़रूरी ये है, कि गालियों का जवाब इस सोच के साथ दिया जाए कि कल इस नफरत को समाज से हटाया जा सके। शायद इसके लिए गालियों को नज़रअंदाज़ करना पड़े. गालियों को अटेंशन देने से भी ट्रोल्स का मनोबल बढ़ा है। इसे भी बदलना होगा, मुद्दे बदलने होंगे, धर्म और जाति से बड़े मुद्दे इस देश में हैं. पांच छः साल पहले जो देश भ्रष्टाचार पर बात कर रहा था, वो सिर्फ धर्म जाती के चारों ओर कैसे घूमने लगा ये आश्चर्य की बात है। देश यही था, लोग भी यही थे और उनकी प्रवृत्ति भी यही रही होगी। लेकिन बस दूसरी तरफ भटके हुए थे, कुछ कुछ असल मुद्दों की तरफ। एक बार फिर इनका ध्यान भटकाने की ज़रुरत है। जिससे इस बढ़ते हुए इन्फेक्शन को नियंत्रित किया जा सके।

इंटेलेक्चुअल्स और लिबरल्स के लिए तो बहुत कुछ लिखा जा रहा है। कुछ-कुछ सिनेमा भी बन रहा है, लेकिन उन्हें इसकी कुछ ख़ास ज़रुरत है नहीं। आप जो स्टेटस लिख रहे हैं, उससे जो पहले ही सहमत हैं, उन्हें उसकी क्या ज़रुरत। ज़रुरत उनके लिए लिखने की है जो दूसरी तरफ खड़े हैं। उनके खिलाफ गालियाँ लिखकर उन्हें बदलना तो कतई संभव नहीं होगा। कुछ ऐसा लिखना होगा, बनाना होगा, जो उनके अवचेतन पर प्रभाव छोड़े। उनकी भाषा में ही उनसे बात करनी होगी और वो भी बहुत आहिस्ता से। लम्बा वक्त लगेगा, अगर हम इसे बदल पाए तो। वरना ज़्यादा वक्त नहीं लगेगा स्थितियां नर्क से भी बदतर होने में। फैसला हमें करना है, इस हालत को बदलने कि जिम्मेदारी ट्रोल्स के ऊपर नहीं, आपके ऊपर है।

आने वाले कल की दो सूरतें हो सकती हैं। या तो ये नफरती और हिंसक भीड़ आपको और आपकी आने वाली पीढी को बदलकर अपने जैसा नफरती बना लेगी। आपको ये नामुमकिन लग रहा है तो आप गलती पर हैं, वो इसके लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। पिछले कुछ सालों में हमने उनकी ऐसी बहुत सी हरकतें देखी हैं, जिनसे आपकी आखों में खून उतर आया था। और दूसरी सूरत ये हो सकती है, कि इस नफरती भीड़ को या उसकी आने वाली पीढ़ियों को आप अपने जैसा बना लें फर्क बस इतना है कि उनकी तादाद आपसे बहुत ज्यादा है. और उनको अपने तरीके भी अच्छी तरह पता हैं। लेकिन आपको अपने तरीके अभी खोजने हैं। फैसला आप पर है।