निरपेक्ष बचपन

Posted by Binal Shrimali
January 9, 2018

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– नीर नैन

कुछ दिनों पूर्व एक कार्यक्रम के चलते बड़ौदा जाना हुआ। एक रिश्तेदार के घर जब जाना हुआ तो अचानक एक दृश्य दिखा तो लगा कि यथार्थ मानो अब यहीं सदा रहना चाहिए।

बचपन में दो बच्चों के आपसी झगड़े को यह कहकर शांत कर दिया जाता हैं कि बच्चे हैं उन्हें क्या पता? और बात शायद वहीं समाप्त हो जाती हैं। पर सोचती हूँ कि जब बड़े और स्वयं को समझदार कहने वाले जब झगड़ते हैं तो उनके उस झगड़े को क्या कहकर शांत किया जाए….?

दृश्य कुछ इस प्रकार था कि भाई के घर पर कुछ काम होने के कारण वहां मजदूर बुलाए गए थे। और हर मजदूर औरत की भाँति वह औरत भी अपने दो छोटे बच्चों के साथ वहां आई थीं जो ईंटो के छोटे टुकड़े से कुछ खेल रहे थें।

कुछ समय बाद भाभी जब अपनी पाँच साल की बेटी को ढूंढने लगी तो पता चला कि वह भी उन दो छोटे बच्चे के साथ खेल रही थी। तब चेहरे पर एक हल्का सा स्मित छा गया। लगा कि यह बचपन और इसका बचपना भी कितना अलग होता हैं। इसे कोई भेद समझ नहीं आता ।

इस बचपन को कोई मायने नहीं लगता कि एक बच्चा एक अच्छे समृद्ध परिवार से हैं तो एक उस घर से जहाँ शायद सिर्फ दो जून के खाने जितनी कमाई होती हैं। एक जो कॉन्वेंट स्कूल में पढता हैं तो दूसरा शायद ये भी नहीं जानता कि स्कूल क्या हैं।  क्योंकि इस बचपन के लिए इसका बचपना ही मायने रखता हैं जो सदा उसे खुशी देता हैं ।

       दृश्य देख लगता हैं कि काश! कितना अच्छा होता कि हमारे यह स्वयं को समझदार कहने वाले बड़े बच्चे बन जाएं या फिर अपने उस सोये हुए बचपन को फिर से अपने अंदर जगा लें।

क्योंकि यदि ऐसा कुछ हो जाता हैं तो शायद अभी जो महाराष्ट्र में हुआ या अन्य स्थानों पर आमतौर पर होता वह कभी होता ही नहीं। कभी कोई भेद होता ही नहीं मुख्यतः हमारे धर्म, जाति, या काम के आधार पर । कभी कोई द्वेष नहीं होता। होता तो सिर्फ वो स्मित जो उन बच्चों को खेलते देख मेरे मन पर छा गया था ।

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