पद्मावती फ़िल्म के सभी विरोधी अपनी स्थिति अच्छे से जान लें

Posted by Himanshu Priyadarshi
January 2, 2018

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पद्मावती…….! हम इस विषय पर कुछ भी कहना या लिखना नहीं चाहते थे लेकिन बात बनी नहीं सो हमने कहने और लिखने की प्रतिज्ञा ही ले ली और अब वही प्रतिज्ञा पूरी करने में जुटे हैं। “पद्मावती” नाम का ही भौकाल चल रहा है आजकल। धोक्खे से भी मुंह से पद्मावती निकल जाए बस फिर क्या अंतर्राष्ट्रीय बहस छिड़ जाएगी पद्मावती पर फिर चाहे उन बहेसियों में से कोई भी पद्मावती के बारे में कुछ भी न जानता हो लेकिन पद्मावती पर कथा बांचने तथा धर्म और संस्कृति की रक्षा करने में एक कदम भी पीछे नहीं रहेगा….असल में ये तो भेड़-बकरियां हैं जिधर भी इनका गड़रिया हांकेगा उधर ही चल पड़ेंगी और चल भी रही हैं। इन भेड़-बकरियों का अपना कोई दिमाग नहीं है अपना कोई पता-ठिकाना नहीं है वैसे पता-ठिकाना तो इन गड़रियों का भी नहीं है और अपना दिमाग भी…..और दिशा-निर्देश तो इन गड़रियों के सरदार देते हैं वे जिस ओर इंगित करते हैं गड़रिये उधर ही अपनी भेड़-बकरियों को हांक देते हैं और बात-बात पर बल्कि हर बात पर फतवे जारी कर दिए जाते हैं बैन की मांग होने लगती है फिर भले ही उन बैन और फतवों के पूरे हो जाने से कुछ हो या न हो पर जनजीवन में कहीं कोई बदलाव नहीं आता…..चलो बैन और फतवों तक तो फिर भी ठीक है लेकिन बैन(माने प्रतिबन्ध) और फतवों के साथ ही मारने-काटने(इसके माने नाक-कान और गला काटने हैं याद रखियेगा बल्कि अब तो आदत डाल लीजिये ऐसा सुनने की) और ऐसा करने वालों के लिए इनाम(5 करोड़, 10 करोड़ अथवा जिसकी जैसी श्रद्धा हो इनाम देने की) की घोषणा-उद्घोषणा करना कहाँ से सही है? ऐसी घोषणाएं जनसाधारण के लिए सही नहीं हैं लेकिन हां घोषणायें करने वाले के लिए सब सही है वे घोषणाएं करें या कुछ भी करें, उनके लिए न तो सामाजिकता को कोई फर्क पड़ता है और न ही कानून को लेकिन यदि कोई फिल्म बना दे या किताब लिखकर बाजार में उतार दे तो समाज और कानून को कोई फर्क पड़े या न पड़े लेकिन उन्हें(जाति, धर्म और संस्क्रति के रक्षकों को) सबसे ज्यादा फर्क पड़ता है…..

कितना विरोध सही?
हमारे नियम-कानून व्यवस्था तथा संविधान के मुताबिक हम हर उस बात का विरोध कर सकते हैं जिससे जनसाधारण के जीवन को किसी भी तरह की दिक्कत या परेशानी हो, व्यक्ति-विशेष को जीवन निर्वहन करना मुश्किल हो जाये या फिर  कोई भी लोक परंपरा और रीति-रिवाज जो सभी के लिए सुखकर हों फायदेमंद हों और कोई व्यक्ति या संगठन उसे धूमिल करने की या नष्ट करने की चेष्टा करे या फिर किसी समुदाय, पंथ या धर्म को बदनाम करने की कोशिश करे और तरह की अन्य चीजें जिनसे किसी को भी नुकसान न हो बल्कि फायदा ही हो फिर भी कोई उसपर उंगली उठाये तो ऐसे लोगों अथवा संस्थाओं का विरोध किया जा सकता है लेकिन शांतिपूर्ण तरीके से रैली निकालकर और जनसभाएं करके वो भी कानूनी दायरे में रहकर……इस प्रकार का विरोध सर्वथा उचित है और इससे अधिक बिल्कुल भी नहीं अन्यथा वो क़ानूनतः दण्ड का भागीदार होगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ये प्रावधान होता है प्रत्येक व्यक्ति को अभिव्यक्ति की आज़ादी है जबतक कि उस व्यक्तिविशेष की अभिव्यक्ति से किसी को भी कोई नुकसान न हो…..

लेकिन अभी पद्मावती को लेकर जो चल रहा है और कांचा इलैया की पुस्तक के एक अध्याय को लेकर जो जो कांड किया गया वो सभी कानूनी दायरों से बाहर होकर किया गया लेकिन उनपर कानून ने कोई कठोर कार्यवाही नहीं की गई और ऐसा हर बार होने की बजह से इन कांड करने वालों के हौंसले बुलंद होते जाते हैं और वे अपनी ही मनमानी करने लगते हैं……चलिए मान लेते हैं कि संजय लीला भंसाली ने पद्मावती पर फ़िल्म बना के राजपुताना समुदाय तथा पूरे हिन्दू समाज की भावनाओं से खिलवाड़ किया करणी सेना और राजपुताना समाज के ठेकेदारों के मुताबिक…..क्या दीपिका पादुकोण को उनके नाक-कान काटने की धमकी देना तथा भंसाली का गला काटने वाले को 5 करोड़ तथा 10 करोड़ का इनाम घोषित करना आदि कार्यों से राजपुताना और हिन्दू संस्कृति की रक्षा हो जाएगी और क्या ऐसे विक्षिप्त मानसिक कार्यों को अंजाम देने से महिलाओं के सम्मान में अपार बढ़ोत्तरी हो जाएगी? यदि ऐसा करने से महिलाओं के सम्मान की रक्षा तथा उनके सम्मान में वृद्धि होती है तो क्या दीपिका पादुकोण महिला नहीं हैं जो उन्हें मारने-काटने की उद्घोषणाएं की गईं? और क्या वे भी महिलाएं नहीं है जो पद्मावती फ़िल्म के समर्थन में अपने विचार रख रही हैं उन्हें भी महिलाओं के सम्मान और राजपूताना संस्क्रति की रक्षा के नाम पर घटिया से घटिया बातें कही जा रही हैं बल्कि वे ट्रोलिंग का शिकार हो रही हैं और तो और जो महिलाएं पद्मावती फ़िल्म का समर्थन भी नहीं कर रही हैं लेकिन यदि किसी ने सगाई और शादी-ब्याह आदि के संगीत कार्यक्रमों में इसी फिल्म के घूमर गीत पर नृत्य कर लिया उन्हें भी नहीं बख्शा गया….हाल ही में इसी बात को लेकर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अर्पणा को धमकियां दी गईं और उन्हें ट्रोलिंग का शिकार होना पड़ा…..ये इल्म रहे कि ये सब महिला सम्मान की रक्षा और अपने तथाकथित राजपूताना संस्कृति की रक्षा के नाम पर ही किया जा रहा है जिसमें बख्शा महिलाओं को भी नहीं जा रहा है।

इस सब में लोकतंत्र कहाँ गया? जबाब ये है कि लोकतंत्र की हर बार और हरेक मर्तबा ऐसे कृत्यों से हत्या कर दी जाती है और जब ऐसा होने लगे कि सिर्फ पहला कहेगा और दूसरा सिर्फ सुनेगा ही मतलब दूसरा बोल ही नहीं सकता उसे बोलने की आज़ादी ही नहीं है और यदि दूसरा बोलने का प्रयास करेगा तो पहला उसका और उसकी आवाज का दमन कर देगा क्योंकि पहले वाले ने सुनना सीखा ही नहीं और इसीलिए उसमे सुनने का धीरज भी नहीं है असल में यही तो तानाशाही की निशानी है जहां सिर्फ पहला बोलेगा और आदेश देगा और दूसरा केवल सिर झुकाए सब सुनेगा और हुक़्म की तामील करेगा किन्तु बोलेगा कुछ नहीं ये तानाशाही नहीं तो और क्या है? अरे महाराजाओं ऐसी महिला सम्मान की रक्षा और सांस्कृतिक विरासत रक्षा तुम्हीं को मुबारक़ हो और कृपा करके हमारे भारतीय समाज तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था को खंडित न करें निस्तेनाबूत न करें।

अब आते हैं भेड़-बकरियों, गड़रियों और उनके सरदारों पर…ये वो लोग हैं जो अपने को राष्ट्रवादी विचारधारा के नम्बर एक के देशभक्त और प्रतिनिधि बताते हैं और जाति-धर्म और संस्कृति के रक्षक और दावेदार तो हैं ही। अब समझो ये कि इनकी देशभक्ति और राष्ट्रवाद इन्हीं से शुरू होता है और इन्हीं पर ख़त्म और जो इनके खेमे के नहीं हैं उनको देशभक्ति और राष्ट्रवादिता के प्रमाणपत्र माने सर्टिफिकेट बांटते घूमते हैं…..अब मूल प्रश्न ये है कि जब ये नाक-कान और गला काटने की सार्वजनिक तौर पर धाराप्रवाही धमकियां देते हैं तब इनकी देशभक्ति और राष्ट्रवादिता कहाँ छूमन्तर हो जाती है? या फिर ये इतने अक्ल से पैदल हैं कि इनको राष्ट्रवाद और देशभक्ति के माने भी नहीं पता हैं…..अरे देशभक्ति केवल धर्मविशेष का झंडा ऊंचा करने, राष्ट्रगान गाने या राष्ट्रीय गीत कण्ठस्थ कर लेने भर से नहीं निभ जाती बल्कि देशभक्ति तो अपने साथ-साथ दूसरों के दुःख-तकलीफ दूर करने और उन्हें आपस में बांटने तथा एक-दूसरे की भावनाओं का ख़्याल से निभाई जाती है…..जब हम सामनेवाले का उतना ही सम्मान करें जितना कि हम खुद अपने लिए चाहते हैं, जब हम अपने आपसी व्यवहार में लिंग-जाति-धर्म-पंथ विशेष आदि को बिल्कुल भी बीच में न लाएं तब कहीं जाकर राष्ट्रवाद और देशभक्ति बल्कि राष्ट्रीयता अपना पूर्ण स्वरूप ग्रहण करती है……अब भेड़-बकरी-गड़रिये और उनके सरदार इस बात पर गौर करें कि वे अभी कहाँ खड़े हैं मतलब देशभक्ति और राष्ट्रीयता जिसका वे गाहे-बगाहे हवाला देते रहते हैं से कितनी दूर स्थिर हैं……।

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