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बंद होते प्राथमिक विद्यालयों के दौर में ‘शिक्षा के अधिकार‘ की तस्वीर

Posted by Rishabh Kumar Mishra
January 25, 2018

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अक्सर प्राथमिक शिक्षा की चुनौतियों में आधारभूत सुविधाओं की कमी, शिक्षकों का अभाव और दायित्वहीनता, विद्यार्थियों की अनुपस्थिति आदि का उल्लेख किया जाता है। इस तरह की चर्चा में कम से कम इतना तो सुनिश्चित है कि विद्यालय मौज़ूद और कमाबेश क्रियाशील है। हालत तो तब बदतर हो जाती है जब विद्यालय को ही बंद कर दिया जाता है। हाल में ही खबर आयी है कि उड़ीसा में लगभग 165 प्राथमिक विद्यालय बंद किये जा रहे हैं। यह स्थिति तब संभव है जब प्राथमिक विद्यालय में जाने वाले आयुवर्ग के विद्यार्थी न हो या वे सरकारी विद्यालय के बदले निजी विद्यालयों में जा रहे हो या वे विद्यालय ही न जा रहे हों। पहली स्थिति के संदर्भ में संबंधित जिलों (रायगढ़, गंजम और सुदंरगढ़) की जनसंख्या को देख सकते हैं। 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर रायगढ़, गंजम और सुदंरगढ़ जिलों में 6 वर्ष तक की आयु के बच्चों की जनसंख्या का कुल जनसंख्या में प्रतिशत क्रमशः 15, 11.30 और 11.97 है। स्पष्ट है कि इन जिलों में प्राथमिक विद्यालयों में नामांकन के लिए बच्चों की संख्या का अभाव नहीं है। अब अन्य स्थितियों पर विचार करते हैं। शिक्षा के अधिकार कानून (2009) के अनुसार 60 विद्यार्थियों तक, अन्य सुविधाओं सहित दो शिक्षकों की व्यवस्था का प्राविधान है। जिन स्कूलों को बंद किया जा रहा है वहां 5 और उससे कम विद्यार्थियों के नामांकन को कारण बताया जा रहा है। प्रथमतः इस आधार पर विद्यालय को बंद करना शिक्षा के अधिकार कानून की अपूर्ण व्याख्या है और इस कारण वर्तमान और भावी जनसंख्या के अधिकारों का हनन है। मान लीजिए जिन क्षेत्रों में विद्यालय बंद किये जा रहे हैं वहां 5 वर्ष बाद पुनः विद्यालय खोलने की आवश्यकता हुयी तो उसकी व्यवस्था और विद्यालय को क्रियाशील करने में भी समय व संसाधन लगेगा। कुल मिलाकर प्राथमिक शिक्षा की सुविधाओं को उपलब्ध कराने की दृष्टि से ये गांव एक दशक पीछे हो जाएगें। इस तरह ये यह फैसला शिक्षा के अधिकार कानून की उस शर्त का भी उल्लंघन करता है जिसके अनुसार बच्चों के आवासीय क्षेत्र के एक किमी के दायरे में प्राथमिक विद्यालय होना चाहिए। प्रशासन द्वारा यह तर्क दिया जा रहा है कि जिन विद्यालयों को बंद किया जा रहा है उनके विद्यार्थियों को निकटवर्ती विद्यालय में प्रवेश दिया जाएगा और यदि विद्यालय दूर हुआ तो परिवहन की व्यवस्था की जाएगी। ये व्यवस्थाएं क्षतिपूर्ति के तर्क पर तो सही जान पड़ती है लेकिन आदिवासी भाषा और संस्कृति की विविधता और इस विविधता के समावेशन, दूरी के कारण विद्यार्थियों पर पड़ने वाले बोझ, मौसम या अन्य आकस्मिक परिस्थितियों की बाधाओं का क्या विकल्प होगा? इसके अतिरिक्त यह व्यवस्था वैकल्पिक किंतु गुणवत्ताहीन छोटे प्राइवेट स्कूलों को जन्म देगी। इस व्यवस्था में सस्ती कीमत पर घर और उससे जुड़े अतिरिक्त स्थान पर विद्यालय जैसी संरचना को खड़ा कर दिया जाता है और सीमित संसाधनों द्वारा साक्षरता की कुशलता के विकास का थोड़ा-बहुत प्रयास किया जाता है। ये विद्यालय गरीबों परिवारों को आकर्षित तो करते हैं लेकिन शुल्क आदि के खर्चे शिक्षा को एक ऐसी वस्तु बना देते हैं जिसे न खरीद पाने की मजबूरी अशिक्षित होने की पहचान का कारण बनती है। सरकारी स्कूलों से उम्मीद की जा सकती है कि उनके संचालन में संवैधानिक मूल्यों का संचार होगा है लेकिन इनके अभाव में ‘फिलानथ्रोपी‘ के नाम पर खुलने वाले निजी विद्यालयों की नियत पर भी सवाल उठाए गए हैं। नंदिनी सुदंर ने छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में खुले ऐसे ही निजी विद्यालयों की छुपी हुई पाठ्यचर्या के उद्घाटन के माध्यम से धार्मिक समाजीकरण की प्रवृत्ति को पहचाना है। ये प्रवृत्तियां पंथ निरपेक्षता के मूल्य के लिए तो खतरा हैं ही, साथ ही आदिवासी और गैर-आदिवासी अस्मिता के विवाद को भी जन्म देती हैं। उक्त प्रकरण का एक अन्य पक्ष है कि ये सभी विद्यालय आदिवासी बहुल इलाकों में है।

आदिवासी बच्चों के संदर्भ में विद्यालय से दूरी सदा से ही चिंता का कारण रही है। इस बार भी विद्यार्थियों के अति अल्प नामांकन का कारण क्या है? जैसे वाजिब सवाल पूछने के बजाय विद्यालय को बंद किये जाने का फैसला शिक्षा के अभाव में इनके सामाजिक-आर्थिक बहिष्करण को प्रेरित करने वाला निर्णय सिद्ध होगा। जो स्थानीय विद्यालय आदिवासी बच्चों के लिए आदिवासी-संस्कृति और मुख्यधारा की संस्कृति के बीच सेतु बन सकते थे उनके बदले इन बच्चों को नगर या कस्बे के विद्यालय या अन्य विद्यालयों में भेजना टिकाऊ और स्थानीय विकास के लिए भी खतरा है। आवासीय विद्यालयों के माध्यम से नगर में रहना और वहीं रोजगार की तलाश करने का माॅडल स्थानीय संस्कृति को हीन और उपेक्षित बना देता है। यह प्रवृत्ति देशज ज्ञान और विरासत के लिए भी संकट की स्थिति पैदा करती है। ऐसी स्थिति में विद्यालय मध्यमवर्गीय और नौकरीपेशा भूमिका के लिए विद्यार्थियों को तैयार करते हैं। यह स्थिति भारत के ग्रामीण क्षेत्रों के स्वालंबन और समग्र विकास के लिए भी चुनौती है। मार्जरी साइक्स ने 1980 के दशक की कुछ ऐसी ही परिस्थितियों को ग्राम-स्वराज की असफलता का कारण पाया है।

शिक्षा के लक्ष्यों को विद्यालय के हस्तक्षेप की खानापूर्ति द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है। वर्तमान में यह स्वास्थ्य और परिवहन जैसी जरूरत आधारित आवश्यकता नहीं है बल्कि जीवन का स्वाभाविक अंग बन चुकी है। इसी कारण राज्य ने भी इस जरूरत की बिना बाधा पूर्ति को मूलाधिकार माना है। उड़ीसा की यह घटना इस मूलाधिकार को कानून की व्याख्या द्वारा शिथिल करने का उदाहरण है। इसे मुद्दे पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी राज्य सरकार को तलब किया है। शिक्षा के उद्देश्यों की दृष्टि से देखें तो प्राथमिक शिक्षा को मूलाधिकार की श्रेणी में रखने का औचित्य था कि शिक्षा के द्वारा विकास की संभावनाओं को प्रत्येक व्यक्ति (खासकर सुविधा हीन लोगों तक) पहुंचाया जाए और उन्हें आगे के स्तरों (माध्यमिक और उच्च शिक्षा) के लिए गतिशील किया जाए। नागरिकता के विमर्शों की दृष्टि से देखे तो आधुनिक राज्यों और लोकतंत्रों ने जिस आदर्श नागरिक की परिकल्पना को स्वीकारा है उसमें नागरिक का शिक्षित होना उसकी एक महत्वपूर्ण विशेषता मानी गयी है। संस्थागत समाजीकरण की दृष्टि से कहें तो व्यक्ति और समाज के संबंधों को संस्कृति के धागे से मजबूत किया जाता है। इन तीनों दृष्टियों से प्राथमिक विद्यालयों को बंद करने का फैसला शिक्षा के लक्ष्यों और अधिकारों को बाधित करता है और सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने की सुघड़ (सुदंर) बनावट में गांठ पैदा करता है।

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