बापू के विचार और मौजूदा भारतीय समाज।

Posted by Sandeep Suman
January 31, 2018

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”आप मुझे जंजीरो से जकड़ सकते है, यातना दे सकते है, यहां तक कि आप मेरे शरीर को नष्ट भी कर सकते हैं, लेकिन आप मेरे विचारों को कैद नही कर सकते।” यह कथन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की है, दुनिया को आधुनिक धर्मशास्त्र देने वाले गांधीजी इस दुनिया से गए सत्तर वर्ष हो गए, मगर आज भी उनकी प्रासंगिकता बरकरार है भले ही 30 जनवरी 1948 को गोडसे ने गोली मार गांधीजी की हत्या कर दी गई। उनके विचार आज भी स्वतंत्र है, उनके दर्शन आज भी नेता से अभिनेता और आम से खास में व्यप्त है, क्या वाकई ?
बापू के इस नश्वर संसार को त्यागें 70 वर्ष हो गए, उनके विचार और दर्शन पर विरले ही सवालिया निशान कोई लगाएं, सर्वसम्मत इस समाज मे जरा उनके विचारों को तलाशिए कहाँ-कहाँ आपको बापू के सत्य, अहिंसा और स्वदेशी की विचार जीवंत प्राप्त होते है ? जरा ठहरिए मौजूदा मीडिया या सोशल मीडिया का सहारा ना ले क्योंकि उनके बापू बस दो दिन के होते है, एक 2 अक्टूबर उनके जन्मदिवस पर दूसरा 30 जनवरी पुण्यतिथि पर, बाकी दिन हिन्दू-मुस्लिम, बाबाओ का राश्लीला, आरोप-प्रत्यारोप करते पैनलिस्ट और जजमेंट देते एंकर का ही कब्जा होता है।
राजनीति की गलियारों को देखे तो आज बापू और उनके विचार कैद प्रतीत तो नहीं होते, किन्तु ढाल बने जरूर प्रतीत हो जाएंगे, कोई उनके नाम का इस्तेमाल कर सत्ता सुख को अभिलाषी है तो कोई उनके विचारों के आर में अपना एजेंडा चलाने को आतुर है। राजनीति में कोइस ऐसा व्यक्तित्व नही जो बापू के विचारों से सहमत ना हों, किन्तु कोई ऐसा भी नही जो उनके विचारों पर चलता प्रतीत हो। हिन्दू-मुस्लिम को देश के दो आँख मानने वाले बाबू के विचारों का दावा करने वाले राजनीतिक पार्टियां, इन दो नयनों का तुष्टिकरण में लगे हुए जबकि एक को पहुँचा हानि दोनो को प्रभावित करेगा और मौजूदा दौर में कर भी रहा है, जिस प्रकार ईश्वर की इस सुंदर दुनिया को देखने के लिए दोनों नयनों की आवश्यकता होती है उसी प्रकार देश के उज्जवल भविष्य के लिए हिन्दू-मुस्लिम रूपी देश के दो नयनों का साथ।
भारतीय समाज के मौजूदा हालात भी राजनीति से कुछ ज्यादा अलग नहीं है, क्योंकि समाज मे अब विचारों और दर्शन की जगह कट्टर राजनीति ज्यादा समावेश कर चुकी है, बाबू की विचारधारा को समाज धीरे-धीरे भूलता जा रहा है। मुँह में पान, गुटखा दबाए चौक-चौराहे पर कई महापुरष आपको बाबू की विचारधारा से प्रेरित मिल जाएंगे, किन्तु अगले ही पल पीड़की कोने में पिचका तिलांजलि दे जाएंगे। बाबू स्वच्छ्ता को स्वतंत्रता से भी ज्यादा अहम मानते थे, किन्तु आज प्रधानमंत्री के स्वच्छ्ता अपील की वावजूद कुछ लोग इसे अपने राजनीतिक अहम का मसला बना इस अभियान में निष्क्रियता दिखला रहे है, राष्ट्रपिता के नाम से संबोधित करने वाले लोग भी बाबू के इस विचार को ठेंगा ही दिखते रहे है, आज भी देश के सड़के, गालियां, सावर्जनिक स्थल कूड़ों के अंबार के नीचे दबा है। दूसरी और जहाँ बापू सत्य और अहिंसा का विचार हम्म दिए थे आज समाज मे छीन होते जा रहा है, छोटी सी बातों पर जातीय व धार्मिक हिंसा भड़क जाती है। लव जिहाद, गौहत्या, धर्मपरिवर्तन जैसी घटनाएं बापू की अवधारणा वाले समाज में सामाजिक प्रदूषण का रूप लेते जा रही है जो समाज और सामाजिक व्यवस्था को नष्ट करने पर उतारू है।
स्वदेशी पर जोर देने वाले बापू, मानते थे कि हम तब ही एक सही मायने में विकास कर सकते है जब स्वदेशी को अपनाएं वरना हम स्वतंत्रता के बाद भी आर्थिक गुलाम बन राह जाएंगे, इसी विचारधारा को आगे बढ़ने के लिए उन्होंने खादी को अपनाया और लोगो से अपनानाने की अपील की,परंतु आज मौजूदा वक्त में हम वस्त्र से लेकर संगीत के लिए भी पश्चात दुनिया की और ताकते है, दूसरी और स्वदेशी का बाजारीकरण हो गया है, लोग स्वदेशी के नाम पर अपना धंधा चमका रहे है। स्वदेशी पर दिखावा भारी प्रतीत होता जा रहा है। विदेशी ब्रांड रखना और लेना लोग अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ देखते है।
वास्तव में बापू ने भारतीय समाज और सभ्यता की श्रेष्ठता को सम्पूर्णता में प्रस्तुत किया था, उनके विचार भारतीय सभ्यता से अधिक प्रभावित थे क्योंकि वो मानते थे कि एक देश अपने ही संकृति को आत्मसात कर आगे बढ़ सकता है, और भारतीय संस्कृति सत्य, अहिंसा और भाईचारे का घोतक रहा है, पथभ्रमित होते भारतीय समाज के इस दौर में अगर भारतीय समाज की श्रेष्ठता को कोई वापस ला सकता है तो वो सिर्फ बापू के दर्शन और विचार, उन्ही के पद चिन्हों पर चल भारत विश्व गुरु बन सकता है, समय की मांग है कि हमें बापू के विचारों को आत्मसात करना चाहिए न कि उनके विचार कोई एक दिवसीय समारोह में पढ़ी और बताई जाने वाली उक्ति भर राह जाए।

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