भक्ति भावना का गुलाम भारत

Posted by Vikram Singh
January 25, 2018

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भारत की राजनीति से लेकर तमाम संस्थाओं में भक्ति भावना देखने को मिल जाती है। यहां टैलेण्ट की उतनी कद्र नहीं है जितनी चापलूसी और भक्ति की है। लोगों के साथ सम्मान पूर्वक व्यवहार करना एक अलग बात है लेकिन जब यही सम्मान चापलूसी और भक्ति में बदल जाता है तो यह घातक सिद्ध होता है। यह व्यक्ति की सृजनशीलता और नए करने की कला को नष्ट कर देता है। अधिकतर चापलूसी और भक्ति इतनी चरम पर पंहुच जाती है कि जिसकी भक्ति की जा रही है उसकी गलतियां दिखाई नहीं पढ़ती। ऐसा नहीं हैं कि यह चापलूसी और भक्ति भावना किसी एक राजनैतिक पार्टी में है बल्कि यह भावना भारत में हर जगह मौजूद है। छोटे नेता अपना कद बढ़ाने के लिए बड़े नेताओं की चापलूसी करते हैं तो वहीं कुछ लोग किसी संस्था में अपना स्थान पक्का करने तथा पद में पदोन्नति करने के लिए चापलूसी करते हैं। कई बार यह भावना स्कूल, कॉलेज, यूनीवर्सिटी आदि में भी देखने को मिलती है। कुछ छात्र अध्यापकों की सिर्फ इसलिए चापलूसी करते है ताकि वे उनके प्रिय छात्र बन सकें। ऐसे छात्र कभी भी अध्यापक की गलत बात पर उनका विरोध नहीं करते। कई बार छात्र ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि चापलूसी करने वालों को अध्यापकों द्वारा ज्यादा महत्व दिया जाने लगता है। कुछ लोग खुद से चापलूसी करते हैं जबकि कईओं को मजबूर भी किया जाता है। कई कॉलेजों में अनुशासन के नाम पर चापलूसी करना तथा भक्त बनना सिखाया जाता है। इस दौरान व्यक्ति अपने आत्म सम्मान की भी परवाह नहीं करता और एक गुलाम की तरह व्यवहार करनें लगता है। बॉलीबुड इंडस्ट्री से लेकर क्रिकेट के मैदान तक में तभी नए लोगों को आगे बढ़ाया जाता है जब व्यक्ति अपने टैलेण्ट को दांव पर रखकर चापलूसी करने में माहिर हो जाता है। हलांकि इसमें कुछ गिने चुने ही अपवाद देखने को मिलते हैं। भारत में तमाम धर्म गुरुओं की प्रसिद्धि का कारण यही भक्ति भावना है।
इस भक्ति भावना तथा चापलूसी का परिणाम यह होता है कि देश को विकास की ओर ले जाने वाले सृजनशील विचारों का नाश हो जाता है। इसी भक्ति भावना तथा चापलूसी के कारण तानाशाही सोच का जन्म होता है जिसमें व्यक्तिगत लाभ के लिए सबकुछ दांव पर लगा दिया जाता है। ऐसी ही भावना के कारण ही हिटलर जैसे तनाशाहों का जन्म होता है जो व्यक्तिगत अहं की संतुष्टि के लिए लाखों लोगों की जान की हत्या करने से नहीं चूकता।
हमारा संविधान सभी को बराबरी का हक प्रदान करता है लेकिन इस भक्ति भावना और चापलूसी के कारण बराबरी की भावना को में भारी कमीं दिखाई देती है।

–विक्रम प्रताप सिंह, इटावा

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