भारतीय राजनीति और जाति

Posted by राहुल बाजपेई
January 29, 2018

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किसी भी राजनेता या राजनीतिक पार्टी का भविष्य कुछ कारकों पर निर्भर करता है। देशों के साथ-साथ ये कारक भी बदलते रहते हैं, भारत में ये कारक हैं धर्म, जाति, लिंग, पैसा, भाषा, क्षेत्रीयता इत्यादि। लेकिन इनमें से यदि सबसे अधिक यदि किसी कारक ने भारतीय राजनीति को प्रभावित किया है तो वो है जाति। संविधान का अनुच्छेद 15 और 17 स्पष्ट रूप से जातिगत भेदभाव को नकारता है, लेकिन इसके बावजूद आज भी हर भारतीय खुद को जातिगत आधार पर पहचाने जाने पर गर्व महसूस करता है, भले ही वह किसी भी वर्ग से सम्बन्ध रखता हो। शायद ये जातियों के राजनीतिकरण का फल है।

भारतीय राजनीति में चुनावी दाल को पकाने के लिए जातिगत जुमलों का प्रयोग नमक की भांति बखूबी किया जाता रहा है। मसलन बसपा संस्थापक काशीराम द्वारा दिया गया नारा “तिलक, तराज़ू और तलवार, इनको मारो जूते चार” जिसने बसपा को क्षणिक लाभ भी दिया।समाजवादी नेता डॉ राम मनोहर लोहिया ने भी एक नारा दिया था “जिसकी जितनी संख्या भारी,उसकी उतनी हिस्सेदारी” यह भी काफी चर्चाओं में रहा। फिलहाल तो वर्तमान समाजवादी पार्टी के समाजवाद से हम सभी परिचित हैं जो केवल एक ही जाति तक सीमित है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर द्वारा प्रधानमंत्री के लिए नीच जाति का प्रयोग इसका ताज़ा उदहारण है।

जाति अगर जुमलों तक सीमित रहे तब तो ठीक है, लेकिन जब यही जाति जब व्यवस्था का अंग बन जाती है तो अभिशाप बन जाती है। राजनेताओं को चाहिए की चुनाव, जाति के बजाय नीति पर लड़ें, कहीं ऐसा न हो कि जाति जोड़ने के चक्कर में देश टूट जाए।

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