महिलाओं की दुर्दशा में मीडिया का योगदान

Posted by Amit Yadav
January 29, 2018

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देश के विकास के साथ मीडिया में भी बदलाव आए । जहाँ मीडिया पहले देश के आंदोलन में एक प्रमुख भागीदार था, वो आज बदलकर एक व्यापार बन गया । मीडिया के व्यापारीकरण के साथ ही उसका स्वरूप पूरी तरह बदल गया । जो मीडिया कभी स्त्रियों के हक में बात करती थी आज उसने स्त्रियों का प्रयोग अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए करना प्रारम्भ कर दिया । स्त्रियों ने इस बारे में नहीं सोचा कि दरअसल जिसे उन्होंने अपना उत्थान समझा वो उनके ही विरुद्ध कार्य करेगा । विज्ञापनों ने स्त्रियों के अंगों का प्रदर्शन अपने उत्पादों के विक्रय के लिए करना प्रारम्भ किया ।
इस व्यवस्था से स्त्रियों को बल तो मिला परन्तु वो एक उत्पाद बनकर रह गयीं । जिसका प्रयोग मीडिया अपने हक में करने लगा । आजकाल ज्यादातर न्यूज़ चैनल स्त्रियों को मुख्य चेहरे के रूप में प्रस्तुत करते हैं ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग उनके न्यूज़ चैनल की तरफ आकर्षित हो । स्त्रियों को उनके पुरुष समकक्षों के समान वेतन भी नहीं दिया जाता । उन्हें वो काम दिए जाते हैं जो उनके चैनल के लिए दर्शक आकर्षित करने का कार्य करें । मीडिया ने हमारे सामाजिक ताने-बाने को बुरी तरह प्रभावित किया है । सिनेमा में दिखाए जाने वाले गानों व उनके संवादों ने किस तरह से महिलाओं के प्रति समाज के व्यवहार को प्रभावित किया है , यह बात किसी से छुपी नहीं है । कई मंचों पर इसे स्वीकार करते हुए बॉलीवुड के अभिनेता एवं अभिनेत्रियों ने ये कहा कि उन्हें शर्म आती है कि उन्होंने महिलाओं के प्रति ऐसे व्यवहार को प्रोत्साहित किया जो वह स्वयं पसंद नहीं करेंगे । मीडिया में दिखाई जाने वाली हर बात लोगों को प्रभावित करती है, यहीं कारण है कि आज हर एक व्यापारिक घराना किसी न किसी रूप में मीडिया से जुड़ना चाहता है । मीडिया यदि चाहे तो किसी को भी रातों-रात हीरो बना सकता है और इसका उल्टा भी उतना ही सत्य है । आज लोग इस विषय में जागरूक हो रहे हैं और वो मीडिया को भी इस विषय में सोचने पर मजबूर कर रहे हैं । मीडिया समाज के लिए आईने का काम करता है यदि वहीं महिलाओं के प्रति गलत व्यवहार को बढ़ावा देगा तो समाज को शिक्षा देने का कार्य कौन करेगा । मीडिया ने महिलाओं को कभी मुख्य भूमिकाओं में दिखाया ही नहीं जो समाज को संदेश देने के काम आ सके । ऐसा नहीं है कि महिलाएं किसी काम में अपनी कमजोरियों का प्रदर्शन करती हों। कई ऐसी महिला पत्रकार हैं जो आज उन बीहड़ इलाकों से रिपोर्टिंग करती हैं जहाँ पुरुषों को भी जाने से डर लगता है । समाज का ताना-बाना बदल रहा है महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो रही हैं । वो समान कार्य के लिए , समान वेतन की मांग भी अब करने लगी हैं । कुछ परिवर्तन हुए हैं और अभी बहुत सारे परिवर्तनों की दरकार है । मीडिया को यह समझना होगा कि यदि वह महिलाओं के प्रति गलत बर्ताव को  बढ़ावा, अनजाने में ही सही अब तक देता रहा है तो अब वह इसे बदल भी सकता है ।

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