मैं एक उम्मीद हूँ…मैं एक लड़की हूँ…मेरे भी सपने हैं ,…..

Posted by Vidya Bhooshan Singh
January 6, 2018

Self-Published

भारत सांस्कृतिक, भौगोलिक एवं पर्यावरणीय विविधिता का एक अनोखा देश है, जहाँ विभिन्न जाति, धर्म एवं सम्प्रदाय के आधार पर सामाजिक परिवेश का गठन होता है और इसके साथ साथ देश में सुविधाएं भी सामाजिक स्तर, जातीय समीकरण के आधार पर उपलब्ध होती है, 
सामाजिक विषमता का शिकार देश आज भी एक क्रांति के इंतजार में है, जहाँ एक ओर कल्पना चावला, चंदा कोचर का नाम लेकर हम खुश होते है कि हमारे समाज में महिलाएं भी शीर्ष स्थान हांसिल कर रही है वही 21वीं सदी के इस दौर में राजस्थान के अरावली की पहाड़ियों में बसे गांवो की लड़कियां अपने सपनों को आज भी पंख  देने के बजाय स्कूल के चारदीवारों के पीछे बकरियां चराने को मजबूर है। देश में शिक्षा का अधिकार अधिनियम(RTE), को लागू करने और नीति एवं व्यवस्था सुदृढ़ कर सरकार आज हर गांव और फली तक पहुच बना चुकी है और एक नया मुकाम देने को हर संभव तत्पर है, साक्षरता दर में भी काफी सुधार आया है। आज भारत की साक्षरता दर 74%(census-2011) और सेक्स Ratio 943 है ।
वही राजस्थान के आदिवासी बाहुल्य सिरोही जिले की बात करें तो यहाँ की हकीकत कुछ और ही दयनीय है, राजस्थान का साक्षरता दर 66%,(महिला-52%) के सापेक्ष में सिरोही 48% जिसमें महिला साक्षरता मात्र 32% है जोकि काफी चिंतनीय है, आप समझ सकते है कि जिस समाज मे 68% महिला पढ़ना लिखना न जानती हो ऐसे में उसका भविष्य कौन और कैसे निर्धारित होता होगा ।
यही राजस्थान राज्य के सापेक्ष में आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र सिरोही का सेक्स Ratio (908/888) बेहतर है।
इन दोनों के कारणो  को जानने की कोसिस की तो एक बेहद चौकाने वाला सच सामने आया जहाँ समुदाय के अधिकांश लोगों का मानना है कि लड़की को पढ़ाने से कोई फायदा नही इसकी तो शादी होकर दूसरे घर जाना है और दूसरी तरफ एक सच यह भी है कि परिवार में औसतन 5-6 बच्चे होते हैं जिसमें लड़की को मूलतः बकरी चराने की ज़िम्मेवारी होती है, इस तरह अगर उसको स्कूल भेजेंगे तो उनका अपना व्यवसाय ठप हो जाएगा।
यहाँ लड़की 6 साल से 14 साल तक बकरी चराती और उसके बाद 15 से 16 साल के नाजुक उम्र में शादी कर लेती है । नाज़ुक उम्र में शादी और अशिक्षा आने वाली  नए पीढ़ी को भी असुरक्षित भविष्य देने को तत्पर है और यही कारण है की पीढ़ी दर पीढ़ी यह समस्या जटिलता की ओर बढ़ती जा रही है, जहाँ स्वास्थ्य, कुपोषण, दिवंगता एक उपहार के रूप में इनको मिला है जो ग़रीबी के दुसचक्र और जटिल करता जा रहा है ।
सेक्स Ratio का बेहतर होना यह ज़रूर दर्सता है की लड़कियों की भ्रूण हत्या कम हो रही है लेकिन यह बिलकुल नहीं की लोग लड़की के अच्छे भविष्य के बारे में सोंचते हों और उनको एक मुक़ाम पर देखना चाहते हो, यह ज़रूर है की उनके जन्म से दुखी नहीं है , लेकिन इसका ख़ास वजह इस समुदाय का स्वार्थ है  क्योंकि आदिवासी परिवार में लड़की की शादी में ज्यादा खर्च नहीं होता है और साथ ही साथ यह लड़कियां शादी से पहले परिवार के भरण पोषण का मुख्य का मुख्य श्रोत है जहाँ बकरीयां चराना उसका देखभाल इनकी प्रमुख ज़िम्मेदारी होती है ।
ऐसे बच्चों से मिलकर एक अजीब असंतोष होता है जहाँ एक बच्ची दूसरों की बात समझ नही सकती, किसी से कुछ बोल नही सकती, और हम अपने आप को बदलते भारत के अग्रणी नागरिक के रूप में देखते है।  एक भारत जो इन गांवों में है इसका  विकास कब होगा ? कैसे होगा ? कौन करेगा ? इसी मर्म के साथ घर वापस आ जाता हूँ …..
यह एक बहुत जटिल समस्या है जहाँ पुरुष शराब के नशे में धुत रहता हो महिला कोसों दूर से पानी लाए और लड़की बकरी चराये ……….इस समाज को एक स्थायी दिशा देने के लिए शिक्षा और महिला सशक्तिकरण के सार्थक प्रयास के लिए आगे आना होगा ।
विद्या भूषण सिंह
सामाजिक चिंतक
email- vbs.bhooshan@gmail.com

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