“राजनीति की अमर्यादित भाषा व लोकतंत्र “

Posted by Parmar jitendra
January 23, 2018

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लोकतंत्र के सफलतम 70 वर्ष पूरे करने के बाद भी हम ये तय नही कर पा रहे है कि एक स्वस्थ लोकतान्त्रिक प्रणाली में अभिव्यक्ति की भाषा का स्तर क्या होना चाहिए | यही तो कारण है कि मौजुदा हालातो में भाषा की दुर्दशा इस कदर बढी है | अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भारतीय संविधान का दर्शन है, यंहा कोई भी भारतीय नागरिक बिना बंदिशो के अपने विचार व्यक्त करने को लेकर आजाद है, लेकिन बावजूद इसके इस पर कुछ नैतिक नियंत्रण है | लेकिन हालिया वाकयो पर नजर डाले तो भड़काऊ व गैरजिम्मेदाराना  बयान देना एक तरह का  पैशन बन गया है | इस मामले में सबसे आगे राजनीति है | आजकल  राजनेताओ का एक ही काम बचा है ,जुबानी किचड़ उछालना, और वो अपने बयानो व वक्तव्यो द्वारा अपने विरोधियों को नीचा दिखाने की भरसक कोशिश करते है |

ताजा मामलो पर नजर डाले तो हमारे सामने एक ही समय में ऐसे मामले आते है जो भारतीय राजनीतिक संस्कृति के साथ साथ मानवीय नैतिकता को तार तार कर रहे है | मोदीजी के एक मंत्री महोदय ने धर्मनिरपेक्षता पर ही सवाल खड़े कर लिए , जितनी घटिया उनकी सोच है उतना ही घटिया उनका बयान था | मंत्रीजी बताते है कि जो लोग धर्मनिरपेक्ष होते है उनको अपने बाप दादा का पता नही होता | मंत्रीजी यह भी बताते है वो सरकार में इसीलिए आये है की वो संविधान को बदल सकें | एक और मंत्री महोदय का बयान आता है जो डाक्टरों को ही नकस्ली

बनने की सलाह दे डालते है ,मंत्री भी उस महकमे के जिस पर आन्तरिक सुरक्षा व अनुशासन बनाए रखने का जिम्मा हो |

एक नेताजी जो विधायक भी है गौ तस्करो को सीधे मारने की ही बात करते है |

युपी के मंत्रीजी ने तो ऐसे बोल बोले है की गरिबो की भावनाओ का खुन ही कर डाला ,वो कहते है सारे गरिब दारू और मुर्गा खाकर वोट देते है | ये तो सिर्फ उदाहरण है इनकी फेहरिस्त बहुत लंबी है | अभी गुजरात चुनाव के वक्त एक कोन्ग्रेस नेता ने प्रधानमंत्री को नीच कह दिया तो खुद प्रधानमंत्री ने गुजरात चुनाव में पाक की भूमिका बताकर गैर जिम्मेदाराना बयान दिया |

क्या हो रहा है ये ? क्या हमारे नेताओ के पास शब्दो की इतनी कमी पड़ गयी कि उन्हे अपने विचार बताने के लिए कर्कश व भावनाओ को भड़काने वाले शब्दो का इस्तेमाल करना पड़ रहा है | क्यू ऐसा सोचते है नेता लोग ? क्या राजनीतिक पारदर्शिता खत्म हो चुकी है या जो लोग राजनीति में है वो मानसिक विक्षत है | धर्मनिरपेक्षता ! यही तो है भारतीय राजनीति का दर्शन जो विभ्भीन सम्प्रदायों को एक सुत्र में बाँध सकता है ,फ़िर ऐसी क्या जरुरत आन पड़ी हमारे मंत्री महोदय को कि धर्मनिरपेक्ष लोगों की भावनाओ को आहत कर संवैधानिक विरोध का गुनाह कर बैठें | क्युं सरकार संविधान को बदलना चाह रही है, जैसा की मंत्रीजी ने इच्छा जताई | क्यु सरकार के विधायक सांसद भी मरने मारने पर उतारू हो गये है | क्या उन्हे भारतीय कानून व्यवस्था पर भरोसा नही रहा | क्यों विपक्षी नेता  संवैधानिक पदो के सम्मान का ध्यान नही रखते और पीएम तक तो अपशब्द बोल देते है | ऐसे ही और भी कही उदाहरण है जो ये जाहिर करते है की भारतीय राजनीतिक व्यवस्था लकवाग्रस्त हो चुकी है |

ये नेतागण पार्टी और सरकार की अभिव्यक्ति का काम करते है ,इनको पुरा राजनैतिक संरक्षण मिला हुआ होता है ,तभी तो वो बेधड़क जो चाहा बोल देते है |

नेताओ के इस तरह के बयान ना सिर्फ भारतीय संविधान की मुल भावना के साथ खिलवाड़ करते है बल्कि भारतीय राजनैतिक संसकृति को भी तार तार करते है | इस तरह के बयानो का समाज पर गहरा असर पड़ता है तथा यही वो कारण है जो देश में साप्रदायिक, जातिय व क्षेत्रिय माहौल खराब करता है | जिनके कंधो पर लोगो की भावनाओ को मूर्त रुप देने की जिम्मेदारी होती है वही अगर जनता की भावनाओ का खात्मा करेंगे तो फिर भारत का लोकतांत्रिक होना ही हमारे लिए अभिशाप है | क्या अब भी इनके बोलो पर लगाम नही लगना चाहिए ? लगना तो चाहिए पर पहल कौन करें | सब पार्टियां आजकल समझौतावादी विचारधारा की राह पर है | कोई भी राजनीतिक दल अपने चुनावी फ़ायदे के लिए कोई भी समझौता करने के लिए तैयार है |

क्या राजनीति में सुधार असंभव है ? नही ! बहुत ही मुश्किल है पर नामुमकिन नही है ! इसके लिए पहल तो हम साधारण लोग ही कर सकते है | चुनावो में हम इन नेताओ को इनकी असलियत बताकर इन्हे सबक सिखा सकते है की बड़बोले व असंवेदनशील नेताओ के लिए उनके दिल में कोई जगह नही है | कुछ अच्छे व मानवीय नेताओ का मनोबल बढाकर राजनीति की तरफ आकृष्ट करना चाहिए | सरकार व विपक्षी दलो को राजनैतिक शुद्धिकरण की दिशा में एक आवश्यक पहल कर ऐसे नेताओ को तुरंत पार्टी की सदस्यता से निष्कासित करना होगा | एक ऐसा कानून जो इन नेताओ पर कानूनी नियंत्रण लगाए व सजा भी दे सकें, की सख्त जरुरत है |

बहुत मुश्किल है ! पर कदम उठाने होंगे | जीवंत  लोकतंत्र के रुप में विश्वभर में हमारी पहचान है | तमाम देश हमसे सिखते है | इसलिए हमे हर हाल में अपनी लोकतान्त्रिक व्यवस्था को कायम रखना होगा | एक बार फिर भाषा के उस स्तर को पाना होगा जो राजनीति की परिपक्वता के रंग बिखेरेगा |

 

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