वो सुनहरी बचपन की यादें…

Posted by Divyanka Agarwal
January 30, 2018

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जैसे ही मैं अपने उस स्कूल की सामने से गुज़रती हूँ एक यादों की बाढ़ सी आ जाती है मुझ पर  . जैसे की उन पुराने दिनों के सारे  पल मुझे सरोबर करने को बेत्ताब हैं . वो गुलमोहर का पेड़ आज भी वही खड़ा है तन के , ये बात अलग है की, , बच्चों के कितनी ही पीढ़ियों को झुलाते हुए कुछ टहनियां अब झुक सी गयी है. कितने ही फल बरसाया होगा उसने खुद ही, उन बच्चो के पत्थरों की चोट खा कर. आज वो लम्हा याद आ रहा है जब लंच ब्रेक में एक दुसरे पर उसके सुन्दर लाल फूल फेक कर हम खिलखिलाया करते थे. एक वो सुन्दर लाल फूल उड़ के सड़क किनारे गिरा हुआ था. उसे देख के लगा जैसे कल की ही तो बात थी. वो आज बेजान सा दिखने वाला बगीचा हमारी वो आधे घंटे की आज़ादी का गवाह होता था . जब हम उसके नर्म घास पर बैठ के जल्दी से अपना खाना ख़तम करने की जद्दोजहत करते हुए , एक दुसरे से अपना डब्बा ख़तम करने की मिन्नत करते थे ,घर पे डांट से बचना जो होता था . लुका छुपी खेलते हुए कब अगले क्लास की घंटी बज जाती पता ही नहीं चलता , फिर खामखा सजा के तौर पे क्लास में खड़ा रहना पड़ता था. वो रंगबिरंगे झूले, इतने सुन्दर नहीं हुआ करते थे उस वक़्त. नाही इतने तरह के होते थे, हम तो रंग खुरचे हुए उन फिसलपट्टी से झूल के ही खुश हो जाया करते थे, और बारिश के मौसम में उन पर चढ़ के पानी पर छपकने का अलग ही मज़ा होता था . आज वो झूले तो वही है पर वो एहसास शायद कही खो गया है . कुछ जाने पहचाने चेहरे नज़र आ  रहे है,  अभी दीवारों से चिपक के लगे ठेले  में . ये वही चुस्की वाले काका है , अब उनका ठेला शायद वो नटखट सा लड़का चलता है जो आशा भरी आँखों से हमें खेलते हुए देखता था,. पॉकेट मनी से बचाए हुए पैसो से अक्सर हम यहाँ चुस्की खाया करते थे , और वो काका ढेरों आर्शीवाद भी न जाने क्यू बरसा जाते थे हमपर . काका की आँखें आज कमज़ोर हो गयी हैं, पर वो प्यारी मुस्कान आज भी चुस्की खाने का निमंत्रण दे रही है मुझे .
आज शायद स्कूल की छुट्टी है जो गेट बंद था, वही गेट जिसके खुलने का हम बेसब्री से इंतज़ार करते, की कब वो खुले और हम अपने घरों की ओर भागे.

आज जी चाह रहा है ये गेट हमें अपने अन्दर ही कैद कर लेता . वो ज़िन्दगी सबसे खूबसूरत थी .
आज वो स्कूल पीछे छूट गया , वो दोस्त कही ग़ुम गए और ज़िन्दगी कितनी आगे बढ़ गयी है , पर आज भी इस स्कूल के सामने से गुज़रते हुए वक़्त वही ठहर जाता है और मैं फिर से बच्ची बन जाती हूँ, आजाद ,बेफिक्र और जिंदा ..

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