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वज़ीर-ऐ-आज़म नरेन्द्र मोदी के नाम एक ख़त

Posted by Manto
January 18, 2018

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जनाब नरेन्द्र मोदी साहिब,

अस्सलामु-अलैकुम.

मेरा नाम सादत हसन मंटो है l

अक्सर लोग मुझे सियाह क़लम, तरक्की -पसंद और फहश-निगार  कहते हैं, हालाँकि मैं सिर्फ एक अफसाना निगार हूँ l खैर, मेरा आपसे एक पुराना रिश्ता है, मैं कश्मीरी हूँ और आपको कश्मीरियों से वहशत l यूँ तो मेरी परवरिश अम्रिस्तर में हुई और मेरी आधी जवानी बम्बई में गुज़री , बाद बटवारे के, मैं लाहौर चला गया l मेरे वालिदैन और मेरा पहला बच्चा सरज़मीं-ऐ-हिन्दुस्तान में दफ्न हैं l

मंटो के मानी कश्मीरी में डेड सेर के हैं, लेकिन 56 इंच के आगे डेड सेर क्या और सवा सेर क्या !

मैं आपसे कभी मिल तो नहीं पाया लेकिन आपको अक्सर इतवार के रोज़ रेडियो पर हाल-ऐ-दिल बयान करते सुना है l सियासी जुलूसों में चिल्लाते हुए देखा है, विलायती मुल्कों से आते और जाते हुए हवाई जहाज़ की सीड़ियों पर हाथ हिलाते देखा हैं l

एक दफा आप यूँही सैर करते हुए पाकिस्तान भी चले आये थे बिन बुलाये किसी की सालगिरह में, याद है आपको ?

आप हैं के पाकिस्तान से बेहद अखलाक़-ओ-रब्त रखते हैं और आपके लोग वहां ये धमकी दिया करते हैं के ‘Go To Pakistan’. यानी के आपका पाकिस्तान आना मुक़द्दस समझा जाता है, मुझे ये जान कर बेहद ख़ुशी हुई l

रेड्क्लिफ्फ़ ने जब हिंदुस्तान की डबल रोटी के दो टुकड़े कर टोस्ट बना दिए थे, वो दिन है और आज का दिन हैं, यकीन मानिये आज भी ये दोनों ही मुल्क नफरत के चूल्हे में  उसे सेक रहे हैं l

मोदी जी, बुरा न मानियेगा, मेरी तहरीर नीम की तरह कडवी ज़रूर हैं, लेकिन अब तो जो चाशनी में डुबो कर नफरत और झूठ परोसा जाता रहा है, उससे किसी का क्या फायदा हुआ ?

नीम के पत्ते कडवे ज़रूर होते हैं, लेकिन खून भी साफ़ करते हैं l

सयासी जुलूसों के इस शोर में मोदी जी, आपको इंसानियत की लरज़ती और कांपती हुई आवाज़ क्या सुनाई देती है  ?  क्या आपको कश्मीर की वादियों से सिसकियाँ भारती हुई उस माँ की आवाज़ सुनाई देती है जिसके 15 साल के बच्चे को आपके लोगों से पत्थर बाज़ और जिहादी क़रार दे कर उसकी आँखें फोड़ दी हैं ? क्या आपको वादी की उदासी सुनाई देती है ?

क्या आपको उन बेवाओं की सिसकियाँ सुनाई देती हैं जिनके शोहर एक अँधेरी रात ग़ायब हो गए और अब उन लाखों गुमनाम क़ब्रों में से किसी एक कब्र में करवटें बदल रहें हैं ?

आपके कानो तक ये अफ्सुर्दगी पोहोंचती है ? बा-ख़ुदा कहियेगा l

मोदी जी, आप एक अज़ीम-ओ-शान और हसीं-ओ-तरीन शख्सियत हैं, कुछ लोगों का कहा माने तो UNESCO ने आपको सबसे बेहतरीन वज़ीर-ऐ-आज़म के ख़िताब से नवाज़ा है l नवाज़ने से याद आया, मियां नवाज़ जो बेहद ही शरीफ हैं, आपको बड़ा याद करते हैं, बात होती है उनसे ?

हत्ता के wikileaks वाले जूलियन साहिब ने ये तक कह दिया है के अमरीका भी आपसे डरता है और डरे भी क्यूँ न भला, माशाअल्लाह आपका मक़ाम ही ऐसा है l

चुनाचे, सियासत मुझे ज़्यादा समझ तो नहीं आती, मेरी सियासत की समझ उतनी ही है जितनी गाँधी जी को सिनेमा में दिलचस्पी थी l मेरी सियासत की समझ और गाँधी जी, दोनों का ही हो हाल हुआ है, वो अब ज़माने के सामने बा-ज़ाहिर है l आपको अकसर गाँधी जी की बात करते सुना है, आपकी रियाहिश भी गुजरात है, गाँधी जी भी गुजराती थे l

खैर, नुक्ताचीनी की मेरी आदत नहीं, मट्टी डालिए गाँधी और गोडसे पर l मोदी जी आपके मुता’लिक़ ये कहा जाता है के आप 18 घंटे काम करते हैं l अब इसमें कितनी सच्चाई है ये तो आप ही बेहतर जाने मगर ये ज़रूर कहना चाहूँगा के इतना काम सेहत के लियें ठीक नहीं l

मोदी जी, आप हिन्दुस्तान के वज़ीर-ऐ-आज़म है, लेकिन कभी कभी लगता है के आप सिर्फ हिन्दुओं के वज़ीर-ऐ-आज़म हैं l क्या ये सही है ? अगरचे ऐसा नहीं भी है, तो फिर क्यूँ हर दिन हिन्दुस्तानी मुसलमानों के मुताल्लिक़ इतना ज़हर घोला जा जा रहा है ?

ये सारे हालात मुझे हमारे ज़िया की याद दिलाते हैं l ज़िया ने इस्लाम की अफीम चटाई थी, आप हिंदुत्व की चरस बो रहे हैं l मोदी जी, अफीम और चरस हरी हो या भगवा, इंसान को वेह्शी ही बनाई है, धर्म और मज़हब का परचम नहीं लहराती l

शराब की बात अलग है, शराब ख़ुद भी पीजिये और दुनिया को भी पिलाईये l

शराब और मेरी मुफलिसी के मुत्तालिक मिर्ज़ा ग़ालिब कह गए हैं के “क़र्ज़ की पीते थे मय और समझते थे के हाँ, रंग लावेगी हमारी फाक़ा मस्ती एक दिन ”  गोया, फाक़ा मस्ती रंग तो न लायी लेकिन क़र्ज़ ज़रूर गर्दन तलक हो चला है l

अब ज़रा मूड को हल्का किये देता हूँ, चलिए एक लतीफा सुनाता हूँ आपको l

अमरीका वाले नारंगी अंकल सैम से आपका तार्रुफ़ करने की ज़रुरत तो अलबत्ता यहाँ हैं नहीं, आपका तो उनसे रब्त-ओ-ज़ब्त है l इससे ज़्यादा मज़खर्फ़ लतीफा और क्या हो सकता है भला?

कभी कभी सोचता हूँ के अगर कोलंबस ने अमरीका को दर्याफ्त नहीं किया होता तो इस माशरे की तस्वीर कितनी अलग होती l

तस्स्वुरात में ही सही, मगर ये ख़याल मेरी रूह को तस्सल्ली देता है l

इस माशरे में लास वेगास की रातों की सरगोशियाँ भले न हों, लेकिन ये ज़रूर है के जो क़हर अमरीका ने सारे मुमालिक पर नाज़िल किया है, कम से कम वो जहालत तो बरपा नहीं होती l  इस माशरे में भले हि न्यू यॉर्क की वो आसमान को ठेंगा दिखलाती इमारतें न हों, लेकिन सीरिया और बग़दाद के किसी गुमनाम शहर में चैन की नींद सोता वो बुज़ुर्ग देहात ज़रूर होगा जिसे ये डर नहीं है के किसी भी वक़्त उसकी चाट पर ड्रोन से बारूद की बारिश होने लगेगी l मिआमि की वो रंगीन-ज़द बीच नहीं होते जहाँ शर्म-ओ-हया के परखच्चे उड़ा करते हैं l और मेडिटेरियन के किसी वीरान जज़ीरे पर बेह के आया वो एलन कुर्दी नाम का गोश्त का टुकड़ा न होता जिसमे कभी जान थी l

मगर ये तो बस ख्वाबों में ही मुमकिन है, असल में कहानी कुछ और है, किरदार भी मुख्तलिफ हैं l मुख़्तसर से अल्फाज़ में अमरीकी तारीख के मुताल्लिक़ सिर्फ इतना कहा जा सकता है के ये वो आह है जो वाह में लपेट कर पेश की जाती रही है l अमरीका ज़हर है, लेकिन निहायती खालिस क़िस्म का l ये वो आतिश है जो लगाये न लगे और बुझाए न बने l या फ़िर जैसा की ख़ुदा-ऐ-सुखन मीर कह गए हैं :

“मीर क्या सदा है बीमार हुए जिसके सबब, उसी अत्तार के लौंडे से दवा लेते हैं..”

लतीफे की बात चली है तो मैं यहाँ बताता चलूँ के हिंदुस्तान और पाकिस्तान पर भी एक लतीफा शाया हुआ है, नाम उसका जम्हूरियत है, इंगरेजी में जिसे डेमोक्रेसी कहा जाता रहा है l यक़ीन मानियेगा, इस डेमोक्रेसी की आड़ में जो ट्रेजेडी आहें भर्ती है, उसे सियासी कान सुन कर भी अनसुना कर देते हैं l इन आहों में उस मज़लूम की अफ्सुर्दगी दबी होती है जिसकी शोरीदा रातों में नींद मयस्सर नहीं, घुर्बत है, जिसकी मुफलिसी रोज़ उसकी हसरतों का मज़ाक उडाती है l इस मज़लूम का कोई मज़हब भी नहीं है, इसलियें के, खाली पेट का मज़हब रोटी होता है l

उन आहों में शायद आपको उस दुखयारी माँ की आहें सुनायीं दें जिसका 17 बरस का मासूम बच्चा, ट्रेन में सफ़र करते हुए मार दिया जाता है l उस पर ये इलज़ाम था के वो मुसलमान है l

मोदी जी, जैसा की मैं पहले ही अर्ज़ कर चूका हूँ, यूँ तो मैं एक अदना सा अफसाना निगार हूँ, मगर हर वक़्त यही सोचता रहता हूँ के मैं बड़ा अफसाना निगार हूँ या ख़ुदा l और बक़ोल मेरी बहन, मैं किसी लोह-ऐ-जहाँ पर हर्फ़-ऐ-मुक़रर्र नहीं हूँ l

अगरचे मेरा अंदाज़-ऐ-बयां ज़रूर कड़वा है, मगर मैं आदमी अच्चा हूँ l

मेरी कोई बात अगर आपको नागवार गुज़री हो तो मैं आपसे माफ़ी का तलबगार हूँ, मुझे आपसे कोई शिकवा नहीं, इस दुनिया के निज़ाम, इस सोसाइटी और इस तहज़ीब-ओ-तमद्दुन से हैं l  ये निज़ाम हिप्पोक्रेसी की एक ऐसी मिसाल है जहाँ चकला चलने वाली औरत को सोसाइटी की गंदगी समझा जाता है मगर उसी चकले पर रंग रलियाँ मानाने जाता मर्द पाकीज़गी की सूरत समझा जाता है l

इस निज़ाम में मुफलिसी की गिरहों में बंधा हुआ, गर्दन तलक जकड़ा हुआ मज़लूम और उसकी दर्द भरी आहें किसी को सुनायीं नहीं देतीं मगर एक अमीर सेठ की आह के हर तरफ चर्चे होते हैं l कभी कभी लगता है इस निजाम के कानों में कोई जदीद टेक्नोलॉजी का फ़िल्टर लगा है जो शायद मज़लूम की सिसकियों को फ़िल्टर कर दिया करता है l

मैंने, 47 की तबाही देखी है, होलोकॉस्ट की दर्दनाक तस्वीर यूरोप के कैनवास पर यहूदी मुस्सव्विरों के हाथों से उतारते हुए देखा है l आपने इसकी तारीख पढ़ी होगी, मैंने देखी है l

यक़ीन मानियेगा, दर्द और अफ्सुर्दगी के सिवा और कोई हासिल नहीं है l हिटलर की कहानी इस माशरे को कुछ नसीहत दे या न दे, गोया ये ज़रूर बलाती है के खुद को ख़ुदा समझने वाले तख़्त-नशीनो का अंजाम वही होता है जो एक कीट-पतंगे का जलती मशाल के बोहोत नज़दीक जाने से होता है l

बाक़ी आप बेहतर जाने l मैं सबकी तरफ से जवाब नहीं दे सकता, मगर अपने मुताल्लिक़ ये ज़रूर कह सकता हूँ के अगर किसी माशरे में गाये की क़त्ल की अफ़वाह भर से  एक शख्स की जान ले ली जाती है तो लानत है ऐसे माशरे पर l मैं जानता हूँ हिंदुस्तान में गाये को एक मुक़द्दस मकाम हासिल है, मुझे किसी की अकीदत से कोई ऐतराज़ नहीं, मगर क्या इंसान की जान मुक़द्दस नहीं ?

खैर, बोहोत कुछ कह दिया, बाक़ी जो रह गया, वो फिर किसी दिन l मैं अफसाना निगार हूँ और मेरे अफसानों के किरदार सोसाइटी की घलाज़त यूँहीं बयां करते रहेंगे l मेरे अफसानों की किरदार एक वेश्या हो सकती है लेकिन कोई हिन्दू मुस्लिम फसाद ज़ेर-ऐ-बहस नहीं हो सकता l

चुनाचे, मेरी तहरीर में मज़हबी नुक्ताचीनी के लियें ज़र्रे भर जगह नहीं l

मैं इसी तरह सुफेद चाक से सोसाइटी के तख़्त-ऐ-सियाह पर लिखता रहूँगा l सादत हसन भले ही मर जाये, मगर मंटो जिंदा रहेगा और वो दुनिया की हैवानियत खुर्दबीन से देख देख कर बहार निकलता और दुनिया को दिखलाता रहेगा l मैं कोई एक्टिविस्ट नहीं हूँ के जुलूस और धरनों से अपनी बात कहूँ, मैं सोसाइटी की चोली क्या उतारूंगा, जो है ही नंगी, मैं उसे कपडे पहनाने की कोशिश भी नहीं करता l

हाँ, अलबत्ता ये ज़रूर है के बॉम्बे और लाहौर के दरमियाँ जो एक दिवार के जिस पर गहरे खून के नासूर पल रहे हैं, उन्हें अपने नाखून से कुरेदता और सहलाता रहूँगा l और किसी न किसी शक्ल-ओ-सूरत में, हर नस्ल में एक नया मंटो पैदा होता रहेगा, और उसकी पैदाईश वजह ये नंगी सोसाइटी होगी जिसे वो आईना दिखलायेगा l

आपसे मुख़ातिब होकर अच्चा लगा, उम्मीद है आप भी कभी यूँही मुख़ातिब होंगे, मुझे इंतज़ार रहेगा l

आपके जवाब का तालिब,

मंटो

@gustakhmanto

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