शरद ऋतु गरीबों के लिए अभिशाप

Posted by Abhimanyu Kumar
January 12, 2018

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मैं एक छोटा सा अनुभव बहुत ही कम पंक्तियों में आपलोगों को बताना चाहूँगा। पिछले वर्ष जनवरी महीने में मैं अपने नानी घर से आ रहा था। रात में करीब दो बज कर तीस मिनट पे गाड़ी एक रेलवे स्टेशन पे रुकी। वहाँ ट्रेन करीब आधा घण्टा रुकती है। मैं ट्रेन के डिब्बे से निकल कर धीरे-धीरे चाय की गुमटी के तरह बढ़ रहा था। गुमटी में तीन अधेड़ उम्र के व्यक्ति बैठे थे। जो इस सर्द भरी रात से बचने के लिए अपने बदन और ठंडी हवा के बीच मे आपने तन पे एक पतली सी चादर ओढ़े बैठे थे। जैसे सड़क पे वाहनों की रफ्तार को कम करने के लिए रोड ब्रेकर होता है। उसमे भी चादर करीब दर्जन भर छिद्र, चादर देख के मानो ऐसा लग रहा था जैसे कि किसी रेगिस्तान के बीच मे बने महल जिसमे मंजिल के हिसाब से खिड़की की संख्या हो। उपरोक्त शब्दो से उनकी गरीबी का हँसी नही उड़ा रहा हूँ बल्कि अपने देश के उस विकास को यह शब्द धत्ता बता रहा है जिसमे पिछले चार दशक से हम गरीबी मिटाने की बात कर रहे है जिसका असली चेहरा यह है। वे लोग गुमटी में चूल्हे की आग को अपना रजाई बना गुमटी को घर मान कर, गृह चौपाल का आयोजन कर अपने-अपने जीवन की चर्चा कर रहे थे। इसी दौरान उनमे से एक व्यक्ति ने बोला कि ” ठंडा बहुत बढ़ गेलइ हे, समझ मे न आवीत हे कि कईसे हमनी गरीब के जिनगी पार लगतइ, सरकारों हमनी पे ध्यान न देईत हई “ तभी उनके चौपाल को हमारी बोली ‘ जरा एक कप चाय जल्दी से दअ, न त ट्रेन छूट जायत हमर ‘ भंग करती है। चाय ले कर हम वापस ट्रेन में चढ़ गये। चाय के चुस्की लेते हुए उनकी बातों को अपने मन मे मंथन करने लगा। सोचा कि अगर यह मात्र ट्रेलर है तो पूरी फिल्म तो काफी भयावक होगी।

वैसे शरद ऋतु सभी के लिए बहुत ही कठिनाई वाली ऋतु है। यह विशेषरुप से, गरीब लोगों के लिए सबसे अधिक कठिनाईयाँ पैदा करती है, क्योंकि उनके पास पहनने के लिए गर्म कपड़े और रहने के लिए पर्याप्त आवास की कमी होती है। वे आमतौर पर, फुटपाथ या अन्य खुले हुए स्थानों, पार्कों आदि में सूरज की रोशनी में शरीर को गर्मी देने का प्रयास करते हैं। बहुत से बुजुर्ग लोग और छोटे बच्चे अधिक सर्दी के कारण अपना जीवन भी खो देते हैं।

शरद ऋतु की चरम सीमा के महीने में उच्च स्तरीय ठंड और तेज सर्द हवाओं का सामना करना पड़ता है। वातावरण में दिन और रात के दौरान बड़े स्तर पर तापमान में परिवर्तन देखते हैं, रातें लम्बी होती है और दिन छोटे होते हैं। आसमान साफ दिखता है हालांकि कभी-कभी सर्दी के चरमोत्कर्ष पर पूरे दिनभर धुंध या कोहरे के कारण अस्पष्ट रहता है। कभी-कभी शरद ऋतु में बारिश भी होती है और स्थिति को और भी अधिक बुरा बना देती है।
बिहार के आम जन-मानस में एक कहावत काफी लोकप्रिय है। जो इस प्रकार है जेठ के दुपहरिया, भादो के अंधरिया, कार्तिक के अँजोरिया एवं माघ के जड़इया अर्थात हिन्दी माह में ज्येठ महीने(अंग्रेजी महीना सम्भवतः मई) में चलने वाले गर्म हवा यानि लू अन्य महीने से ज्यादा गर्म होता है। ठीक उसी तरह हिन्दी माह भादो (सम्भवतः सितम्बर) के रात अन्य महीनो से काफी अँधेरा होता है, वही कार्तिक मास(सम्भवतः नवम्बर) के रात में अंधेरा ना हो कर काफी हद तक उसमे उजाला होता है, एवं हिंदी महीना माघ जो अंग्रेजी महीना में लगभग जनवरी में होता है इस महीने की सर्दी अन्य महीनो के उपेक्षा अपने चर्मोउत्कर्ष पे होता है।कहा जाता है कि गर्मी में लोगो की हैसियत का अंदाजा नही लगाया जा सकता है किंतु सर्दी का मौसम ही कुछ ऐसा है कि लोगो की आर्थिक परिस्थित की गणना करना आसान हो जाता है। समय आज की हो या दशको पहले का शरद ऋतु का मौसम गरीबो के लिए एक दुःस्वप्न से कम नही होता है। शाम है बुझी बुझी वक्त है खफा खफा, कुछ हंसीं यादें हैं कुछ भरी सी आँखें हैं, कह रही है मेरी ये तरसती नजर, अब तो आ जाइये अब न तड़पाइये। उन्हें हर वर्ष एक ऐसे दानकर्ता के इंतेजार में सर्दी का आधा समय गुजारना होता है कि कोई आयेगा और उनकी मदद करेगा। जो उन्हें इस मौसम में गर्म कपडे देंगा जिससे की उनकी रक्षा इस सर्द भरी रात से हो सके। क्योकि कहा जाता है कि लू मारल खीरा से, ठंडा मारल हीरा से भी ना, अर्थात गर्मी के महीने में अगर गर्म हवाओं का आपके स्वास्थ्य पे पर प्रभाव पड़ता है तो वह एक खीरे से भी ठीक हो सकता है। यहाँ खीरे की संज्ञया इसलिए दिया गया है कि जिस तरह से खीरा सर्व सुलभ है जो की ज्यादा मूल्यवान भी नही है। वही हीरा का तात्पर्य है कि हीरा बहुमूल्य होता है जो की हर एक के पहुँच से बाहर होता है। यही कारण है कि शीत लहर गरीबो के लिए अभिशाप से कम नही होता है।

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