शायद सच में आज भारत का लोकतंत्र खतरे में है.

Posted by Kanhaiya Kumar
January 28, 2018

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२५ जनवरी को गुरुग्राम के स्कूल बस पर राजपूतों द्वारा पद्मावत फिल्म के विरोध प्रदर्शन के दौरान पत्थर लगने के कारण क्रांतिकारी न्यूज़ चैनल एंकर, तुष्टिकरण कि राजनीति करने वाले पॉलिटिशियन और हिन्दू विरोधी वामपंथी नेता तथा पत्रकारों ने न जाने कौन कौन से उपनामों से राजपूतों को और करनी सेना को सुसज्जित किया. हिन्दू आतंक दिखने लगा इन लोगों को.

२६ जनवरी की गणतंत्र दिवस सुबह उत्तर प्रदेश के काशगंज में कुछ हिन्दू युवाओं द्वारा तिरंगा यात्रा निकला गया था. हालाँकि देश के प्रतीकों के सम्मान में आज तक इस तरह के प्रयोजन देश के हिन्दू समुदाय के द्वारा ही किया जाता रहा है. हाँ तो तिरंगा यात्रा जब जिले के बडडू नगर इलाके में पहुंची, मुस्लिम समुदाय के लोगों ने तेजाब और पत्थर से हमला किया, विरोध करने पर मुस्लिम समुदाय की और से गोलीबारी की गयी, जिसमे शहर के नदरई गेट निवासी हिंदू कार्यकर्ता चंदन (22) पुत्र सुशील गुप्ता की मौत हो गई. इसे इस तरह से कहना गलत नहीं होगा की मुस्लिम जिहादी आतंकियों ने भारत के गणतंत्र दिवस के मौके पर तिरंगे से सम्मान में निकाले गए यात्रा में एक हिन्दू की हत्या कर दी. मुस्लिम समुदाय में सूफिज्म को मानने वालों को छोड़कर हमे नहीं लगता की कोई भी शांति और सद्भावना के साथ जीने वाला और देश से प्रेम करने वाला बचा है.

ऐसी घटनाएं पूर्व में होती रही हैं, लेकिन पहले के समय में हिंदुन में एकता नहीं थी, जानकारी के आभाव के कारण लोगों को घटनाओं के बारे में पता भी नहीं चलता था. आज इंटरनेट और सोशल मीडिया के कारण ऐसी घटनाओं की जानकरी तुरंत हो जाती है. हिन्दुओं में एकता बढ़ी है. मुसलमानों के कृत्यों का प्रतिकार करना शुरू किया है लोगों ने तो हिन्दुओं को आज के तथाकथित क्रन्तिकारी पत्रकार, भ्रष्ट नेताओं और मुस्लिम समुदाय के स्वघोषित देशभक्तों ने हिन्दू आतंकवाद का नाम गढ़ना शुरू किया. बॉलीवुड ने (कुछ लोगों को छोड़ कर) तो हमेशा ही मुस्लिम कौम के प्रति अपनी भक्ति दिखा कर हिन्दू सभ्यता को अपमानित करने में कोई कोर कसार नहीं छोड़ा है. इनका पाकिस्तान प्रेम आये दिन उमड़ कर सामने आता है. दुबई की फंडिंग और पाकिस्तान प्रेम के कारण इन्होने हर सिमा लाँघ दी है. राष्ट्रवादी विचार के लोग जब विरोध करें तो देश में असहिष्णुता का प्रचार प्रसार होता है, JNU के कन्हैया, उम्र खालिद, शेहला जैसे देश विरोधी सोच रखने वाले लोगों को हीरो बना दिया जाता है. गन्दी राजनीति का खेल शुरू हो जाता है.

चलो हिन्दू तो अब आतंकी हो गए आपलोगों की नजर में, जबसे उन्होंने अपने ऊपर हुए हमलों का प्रतिकार लेना शुरू कर दिया. मुस्लमान कब से देश भक्त हो गए. आज़ादी के पहले भी १-२ मुसलमानो को छोड़कर सबने ही जिन्ना का साथ दिया था. आज़ादी के बाद कुछ मुस्लमान जो देश में रह गए वो केवल देशभक्ति की वजह से नहीं बल्कि अपनी पुरखों की संपत्ति के लालच में और कांग्रेस की दोगली नीतिओं के कारण लाखों हिन्दुओं की हत्या करने बाद भी यहाँ जमे रहे. फिर भी उदार हिन्दू समुदाय ने इनके साथ आने वाले समय में भाईचारे रखा. सबकुछ भूलकर बहुसंख्यक समाज ने इन्हें अपनाया और बदले में कश्मीर जैसा नरसंहार मिला, १९४७ के बाद न जाने कितने मुजफ्फरनगर हुए. २००२ गुजरात में इन्हे लगा की मार दो, कहने सुनने वाला कोई नहीं है. कारसेवकों को गोधरा में जिन्दा जला दिया. पहला प्रतिकार हुआ, हजारो मुसलमानो को मार डाला गया. गुजरात में अगले १२ वर्ष तक कोई दंगा नहीं हुआ.

प्रतिकार जरुरी हो जाता है जब कांग्रेस जैसी भ्रष्ट पार्टी और मुस्लिम तुष्टिकरण पर जीने वाली सरकारें बहुसंख्यक समाज के लोगो पर हुए अत्याचार को अनदेखा करती रहे. हिन्दू समाज उदार था, है और हमेशा रहेगा. हमारे धर्मग्रंथों में जिहाद जैसी कोई शिक्षा नहीं है, जिसमे दूसरे धर्म के लोगों की हत्या करना सिखाया जाता है. हमे वसुधैव कुटुम्बकम का पथ पढ़ाया जाता है. हमे बचपन से ही दूसरे धर्म और समुदाय के लोगो और उनकी आस्था का सम्मान करना सिखाया जाता है. लेकिन इसका ये मतलब बिलकुल न निकला जाय कि हिन्दू समुदाय पर हुए अत्याचार का प्रतिकार नहीं लिया जायेगा. ये मनुष्य कि प्रवृति होती है अत्याचार का प्रतिकार.

आज का भ्रष्ट राज तंत्र, दोहरे चरित्र कि मीडिया, नक्सल समर्थक वामपंथी गिरोह, हिंदुस्तानी सभ्यता पर चोट करते फ़िल्मी गैंग, जिहादी लोगों का समूह और उनका संरक्षण करनेवाले नेता सब मिलकर देश को रसातल में लेकर जा रहे हैं. आज तिरंगा यात्रा पर हमला हुआ है, कल अल्लाह हो अकबर न कहने पर हमला होगा और ये परिस्थिति जल्द ही सामने आनेवाली है. दोगले चरित्र के लोग तो जी लेंगे इस्लाम कबूल कर लेकिन जिनके दिल में त्रिदेव बसते हैं, जो माँ दुर्गा, माँ काली, माँ लक्ष्मी कि आराधना करते हैं वो कैसे जियेंगे. या तो उनकी हत्या होगी या फिर वो लोग आत्महत्या कर लेंगे.

मुस्लिम तुष्टिकरण को न रोका गया तो देश जलेगा ये मेरा अनुमान हैं. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को लोकतंत्र खतरे में आज नजर आया, जब सिक्खों का नरसंहार हुआ, कश्मीरी पंडितों का नरसंहार हुआ था तब इन्हें लोकतंत्र खतरे में नहीं लगी. राम मंदिर विवाद को सुलझाने के लिए जैसे ही एक दूसरे न्यायाधीश कि तरफ से लगातार सुनवाई होने कि बात कि गयी, लोकतंत्र खतरे में आ गया. एक १०० रुपये कि चोरी के मुकदमे का फैसला इन महान न्यायाधीशों द्वारा २० वर्षों में पूरा नहीं होता, तब लोकतंत्र खतरे में नहीं आता. भ्रष्ट नेता हत्या करते हैं, करवाते हैं, गिरफ्तार होतें हैं, मुक़दमे चलते हैं, जमानत पर बाहर निकल कर फिरसे अपराध करते रहते है, न्यायाधीश महोदय को अपराधियों को जमानत देते समय लोकतंत्र खतरे में नहीं दिखता.

न्याय तंत्र को अगर भ्रष्ट न कहें तो क्या कहें? बड़े बड़े अपराधी नेता बन जाते हैं, नेता से विधायक और सांसद फिर सरकार में मंत्री और मंत्री बनते ही उनके अपराधों कि सजा लगभग माफ़ ही हो जाती है. कभी सबूत का हवाला देकर तो कभी गवाह नहीं हैं, कभी कोई और तर्क देकर न्यायाधीश महोदय इन्हे बाइज्जत बरी कर देते हैं, तब लोकतंत्र खतरे में नहीं आता. बलात्कार जैसे जघन्य अपराध में भी दोषियों को बरी करते समय लोकतंत्र खतरे में नहीं आता. एक महिला अपने आत्मसम्मान को खोकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर लेती है तब लोकतंत्र खतरे में नहीं आता. गरीब व्यक्ति न्याय पाने के लिए बीसियों वर्ष तक अदालत के चक्कर लगाता है, फिर भी न्याय नहीं मिलता इन न्यायाधीशों के द्वारा तब लोकतंत्र खतरे में नहीं आता.

माननीय न्यायाधीश महोदय एवं महोदया, दोहरे चरित्र वाले पत्रकार समूहों के क्रन्तिकारी पत्रकार महोदय एवं महोदया, भ्रष्ट तंत्र के अधिकारी महोदय एवं महोदया और भ्रष्ट राजनीति के वीर महोदय एवं महोदया! मैं बताता हूँ कि लोकतंत्र खतरे में कब आता है-

– जब गरीब को न्याय नहीं मिलता.

– जब बलात्कारियों को सजा नहीं मिलती.

– जब किसान आत्महत्या करता है.

– जब जे.एन.यू. के कन्हैया, उमर खालिद, शेहला रशीद जैसे लोग हीरो बन जाते हैं.

– जब हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी, तेजस्वी यादव जैसे जातिवाद कि राजनीति करने वालों को अदालत कुछ नहीं कहती और मीडिया उन्हें हीरो बनाती है.

– जब जातिवाद की राजनीति कर दंगा करवाने वाले नेताओं को अदालत सजा नहीं देती.

– जब कश्मीरी पंडितों को सुरक्षा के लिए एक भी सैनिक नहीं दी जाती और पद्मावत फिल्म के लिए हजारों सैनिकों को तैनात किया जाता है.

– जब कश्मीरी पंडितों कि हत्या करनेवालों को सजा नहीं मिलती बल्कि उनके रहनुमाओं को सैनिक सुरक्षा मिलती है.

– जब सिक्खों के नरसंहार करनेवालों के रहनुमाओं को सजा नहीं मिलती.

– जब गुजरात दंगे में अधिकांश लोगों को सजा मिलती है, लेकि गुजरात दंगे के मूल कारण गोधरा कांड के अधिकांश दोषियों को सजा नहीं मिलती.

– जब बकरीद पर खून कि होली का समर्थन होता है लेकिन हिन्दुओं के पर्व होली पर प्रवचन दिए जाते हैं और अदालती फरमान सुनाया जाता है.

– जब न्यू ईयर सेलिब्रेशन पर प्रदुषण नहीं दिखता है और दिवाली में प्रदुषण देखकर अदालत के तुगलकी फरमान जारी होते हैं.

– जब मामूली सी चोरी के अपराध में लोग वर्षों तक जेल में सड़ते हैं, लेकिन करोड़ों का घोटाला करने वालो को या तो छोड़ दिया जाता है या २-३ वर्षों की जेल ऐशों आराम की जिंदगी के साथ तोहफे में दिया जाता है.

– जब आम अपराधियों को सुखी रोटी खाने को दी जाती है और अपराधी नेताओं के लिए जेल को स्वर्ग बना दिया जाता है.

– जब निर्भया कांड में सबसे ज्यादा हैवानियत करने वाले हरामी को, १७ साल की उमर में, नाबालिग साबित कर सजा देने के बदले बाल सुधर गृह भेजकर उसका संरक्षण किया जाता है. और बाहर निकलते ही केजरीवाल जैसे स्वघोषित ईमानदार द्वारा बलात्कार का इनाम दिया जाता है. मीडिया और अदालत चुप रहती है.

– जब आर्मी के जवानो को रेपिस्ट बोला जाता है.

– जब अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हिन्दू धर्म का अपमान किया जाता है.

– जब अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर अफजल जैसे गद्दार का महिमामंडन किया जाता है.

– जब अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर आर्मी का मजाक उड़ाया जाता है.

– जब अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश के टुकड़े करने की बात की जाती है.

ऐसे अनगिनत बातें हैं जिनके कारण लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है, जिसके संरक्षक और उत्पादक स्वयं मीडिया के लोग, हमारी न्यायपालिका, भ्रष्ट राजनेता और नक्सल समर्थक वामपंथी सोच के लोग हैं. लोकतंत्र को मजबूत बनाये रखने के लिया सबसे पहले बहुसंख्यक समाज की आस्था का मजाक उड़ाना बंद करें, अदालतें न्याय करने में देर न करें. अपराधियों को न्यायसंगत सजा मिले. देश में सम्पूर्ण रूप से एक ही कानून लागू हो. किसी भी धर्म या समुदाय का कोई भी पर्सनल लॉ न हो. एक देश एक कानून. सर्वधर्म समभाव के साथ साथ सर्वजन समभाव को प्रमुखता मिले.

बाँकी आप महानुभावों की मर्जी. हम तो आम आदमी हैं, सचमुच वाले, दिखावे वाले नहीं.

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