शिक्षा को बेचकर निजी करण को बढ़ावा देती राजस्थान सरकार!

Posted by Pushpendra Sharma
January 4, 2018

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नमस्कार

मैं पुष्पेंद्र शर्मा

अभी कुछ दिनों पहले राजस्थान शिक्षा जगत में कुछ हलचल हुई राजस्थान सरकार सरकारी विद्यालयों को पीपीपी( पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) अर्थात निजी हाथों में दे रही है क्या आपको लगता है कि इससे शिक्षा के स्तर में सुधार आएगा शायद कभी नहीं!

जैसा मेरा मानना है जहां पर सरकार पर जिम्मेदारी बढ़ जाती है या वह नाकाम होती है या उसका तंत्र विफल होता दिखाई देता है तो वह हमेशा ऐसे फैसले लेती है जिससे कि वह अपने कार्य के परिणामों का ठीकरा जनता के सर पर फोड़ सके पिछले आंकड़ों को देखते हुए भी यह लगता है कि यह फैसला भी ऐसा ही परिणाम लाएगा.

उदाहरण के लिए देखिए बिजली विभाग राजस्थान में मीटर लगाने ,लाइने बदलने, ट्रांसफार्मर बदलने आदि के लिए गरीब जनता को ठेकेदारों के पांव छूने पड़ते हैं और उनको पैसा देना पड़ता है तब जाकर उनके घर मैं उजाला होता है यहां तक कि BPL परिवारों को भी मीटर लगाने वाले ठेकेदार रिश्वत के बिना कोई काम नहीं करते और अपने निजी उद्योगों के लिए उनके पास मीटर नहीं होता है सरकारी अफसर का काम बस इतना है कि वह आए हस्ताक्षर करें और चला जाएं इन सब का भुगतान आम जनता को भुगतना पड़ता है दिल्ली जैसे क्षेत्र में 3 से ₹4 प्रति यूनिट बिजली का बिल आता है और राजस्थान में 6 से ₹7 प्रति यूनिट.

अब शिक्षा के हालात देखिए शिक्षा नीति में सरकार कोई नया प्रावधान नहीं लाती सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता को कोई बढ़ावा नहीं प्राथमिक शिक्षा, बालिका शिक्षा ,आंगनबाड़ी शिक्षा ,के लिए कोई नीति नहीं बस नजर आता है निजी विद्यालयों का परीक्षा परिणाम

असफल विद्यालय ,बच्चे पढ़ते नहीं, शिक्षक आते नहीं और आते हैं तो पढ़ाते नहीं ऐसा तर्क देकर सरकार अपने दायित्व से पीछा नहीं छुड़ा सकती पीपीपी मॉडल में निजी लोगों का पैसा लगेगा और सरकार अपनी जमीन निजी लोगों ,बड़े लोगों को दे सकेगी जिससे वह अपना और उद्योग भी वहां पर कर सकेंगे यह सब होगा तो शिक्षा का अधिकार कानून ,अनिवार्य शिक्षा, निशुल्क शिक्षा का क्या मतलब रह जाएगा

“बच्चों को सिखाइए कि कैसे सोचा जाता है यह नहीं कि क्या सोचा जाए”

बदलाव के तरीके निम्न भी हो सकते हैं

1- सभी प्राथमिक शिक्षा आंगनबाड़ी शिक्षा का विशेष मॉडल तैयार किया जाए और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की नियमित मॉनिटरिंग हो

2- ग्रामीण क्षेत्रों में जनप्रतिनिधियों( पंच, सरपंच ,उपसरपंच )व शहरी क्षेत्रों में अधिकारी व जनप्रतिनिधि (प्रधान ,ग्राम सेवक ,SDM ,विधायक ,कलेक्टर ,पुलिस ऑफिसर ,शिक्षक )इन सब के बच्चे सरकारी विद्यालयों में ही पढ़ाए जाने चाहिए जिससे यह सब लोग समय पर मॉनिटरिंग भी करेंगे और इससे ग्रामीण लोग सरकारी विद्यालयों पर भरोसा भी करेंगे

3- बच्चों को आठवीं तक फेल न करने का मॉडल भी बदलना और छोटी कक्षाओं पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए इससे उनकी नींव मजबूत होगी इसके पीछे तर्क भी दिया जाता है कि आठवीं तो इस साल पास होकर चली जायेगी। उनके लिए हमारे पास अगला साल नहीं होगा। मगर पहली-दूसरी को तो बाद में भी समय देकर सिखाया जा सकता है। इस सोच के कारण बहुत से स्कूलों में हर साल पहली-दूसरी क्लास की उपेक्षा होती है। इसका असर बच्चों के अधिगम स्तर पर पड़ता है।

बदलाव के लिए पहल

इस स्थिति में बदलाव के लिए बच्चों के ऊपर पहली कक्षा से ही ध्यान देने की जरूरत है। ताकि बच्चों को शुरुआती सालों में पढ़ना-लिखना सिखाया जा सके और उनका स्कूल से जुड़ाव बना रहे। अगर कोई बच्चा शुरुआती सालों में पढ़ना-लिखना सीख ले तो उसके नियमित स्कूल आने की संभावना बढ़ जाती है। मगर यह सारी चीज़ें तभी संभव है जब स्कूल में पर्याप्त शिक्षक हों और पहली-दूसरी कक्षा के बच्चों को पढ़ाना जरूरी माना जाता हो।

बच्चों अभिभावकों और शिक्षकों का समय पर संवाद होना जरूरी है जिससे बच्चों में सीखने में होने वाली प्रगति की नियमित समीक्षा की जा सके  एवम व्यापक मूल्यांकन का सही ढंग से इस्तेमाल हो सके बच्चे को सीखने में कहां पर दिक्कत हो रही है, इस बारे में शिक्षक व अभिभावक सोच सके.

धन्यवाद

पुष्पेंद्र शर्मा

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