शोर किस बात का, बढ़ावा तो हमने ही दिया

Posted by PREETY MAHAWAR
January 22, 2018

NOTE: This post has been self-published by the author. Anyone can write on Youth Ki Awaaz.

अपराध बढ़ गया बोलने से अच्छा है, खुद का भी आकलन करें

“संस्कारों को अपनाएं, खुद के मॉडर्न होने की दुहाई न दे”

हम बड़ी ही आसानी से कह देते हैं की आज समाज में अपराध कितना बढ़ गया है. लेकिन क्या कभी हमने अपना या अपने परिवार का आकलन किया ? क्या कभी ये खुद से पूछा की क्या हम खुद एक अच्छे इंसान हैं ? क्या हमें संस्कारों का ज्ञान है ? या फिर क्या हमें ‘संस्कार’ शब्द सुनना अच्छा लगता भी है या नहीं ? क्या हमें सही और गलत का सटीक ज्ञान है ? क्या हमें हमारे स्वर्णिम और विशाल इतिहास का विषद ज्ञान है ? क्या वाकई हम अपने बच्चों को सही राह दिखा रहे हैं ? क्या हम अपने प्रति, अपने रिश्तों के प्रति या अपने समाज के प्रति ईमानदार हैं ?
क्या हम किसी तरह का कोई भेद-भाव करते हैं ? क्या हम सेक्स जैसे पाक रिश्ते को यह कह कर शर्मसार नही करते की यह महज़ एक फिसिकल नीड है ?  क्या हम अपने ही बच्चों के सामने गन्दी गालियाँ नहीं देते ? क्या हम घमंडी नहीं हैं ? क्या हमें अपने से आगे रहने वालों से इर्ष्या नहीं होती ? क्या हमें गुस्सा नहीं आता ? क्या कभी हमारा मन नहीं करता किसी को बुरी तरह से बर्बाद करने का ? क्या हम किसी का दिल नहीं दुखाते ? और ये जानते हुए भी की हम गलत हैं, हम पापी भी हैं, हम दुनिया के सामने खुद को पाक-साफ़ नहीं बताते ?
क्या हम अमीरी और गरीबी का भेद नहीं करते ? क्या हम मच्योरिटी और मासूमियत के सही अंतर को समझते हैं ? क्या हम लड़की और लड़कों की परवरिश का पैमाना अलग-अलग नहीं रखते ? क्या हमें बियर और बार में कोई बुराई नज़र नहीं आती ? क्या हम बुरी संगत नहीं करते ? क्या कभी हमने अपने ‘मैं’ को भूल कर ‘हम’ को तवज्जों दी है ? क्या मूंह में राम बगल में छूरी जैसी कहावते हमारे लिए नहीं बनी ? क्या हम दिखावे के लिए दूसरों से, अपने पेरेंट्स से, अपने बच्चों से, अपने भाई-बहनों से, अपने रिश्तों से और यहाँ तक की अपने आप से भी हज़ार झूठ बोलने में भी कोई गुरेज़ नहीं करते ? क्या वाकई हम सभ्य हैं ? क्या सच में हम इंसान हैं ? क्या वाकई हम अपराधी नहीं ?
ऐसा है या नहीं, ये आप खुद निर्धारित कीजिये. लेकिन हम सब के अन्दर दबे सुर से, दिल के किसी कोने से एक आवाज़ ज़रूर बहार निकलती है की हाँ, हाँ हम भी कहीं न कहीं अपराधी हैं. सामाजिक बुराइयां, सामाजिक विषमताएं, छुआ-छूत, अशिक्षा, गरीबी, क्षेत्रीयतावाद, जातिवादी/धार्मिक तुष्टिकरण, भुखमरी, पीयर ग्रुप प्रेशर, लक्ष्य भ्रमित युवा, लोक प्रशाशन में पारदर्शिता का अभाव, धीमी/लचर न्याय प्रणाली, ग़लत शिक्षा पद्धत्ति, लोक प्रणाली में फेव्रेटीज़म, डिप्रेशन, आधुनिकता बनाम पश्चिमीकरण, छोटी मानसिकता, ख़राब लोक नीति निर्माण (कुछ कानूनों में बर्डन ऑफ़ प्रूफ कथित अभियुक्त पर शिफ्ट कर दिया है), मीडिया का अनैतिक प्रभाव, स्वतंत्र इन्टरनेट व्यवस्था, लचर साइबर कानून प्रणाली, अनिश्चितता जैसे कई कारण हैं जिनकी वजह से अपराध होते हैं.
अपराध बढ़ने के ऐसे सेकड़ों कारण दुनिया में विदित हैं लेकिन सबसे प्रमुख कारण हमारी ख़राब परवरिश है. बचपन में जब बच्चा स्कूल से किसी की पेंसिल चुरा कर आये या किसी की कॉपी फाड़ दे या फिर खेल में जीत हासिल करने के लिए अपने प्रतिद्वंदी दोस्त को गिरा दे तो अक्सर पेरेंट्स उसे उसी वक्त रोकने की जगह, उसे सही-गलत सिखाने की जगह, उसे प्यार से समझाने या थोड़ा सख्त होने की जगह, खुश होते हैं और यह कहते हैं की देखो हमारा बेटा कितना स्मार्ट है. और वह बच्चा उसी मानसिकता को लेकर बड़ा भी हो जाता है. इस बीच वो न जाने कितने झूठ, कितनी चोरियां, कितने लड़ाई-झगड़ें, कितने बवाल, कितने गलत काम करता है और न जाने कितनी ही असामाजिक तत्वों में लिप्त हो जाता है. पर माँ-बाप फिर भी यही कहते हैं “मेरा बेटा तो बड़ा शरीफ है”.
बचपन में स्मार्ट, चालाक और एनर्जेटिक समझा जाने वाला वही बच्चा बड़े हो कर जब किसी लड़की को ज़बरदस्ती हासिल करने के लिए उसे शारीरिक तथा मानसिक तौर से पीड़ा देता है तब भी उसके सिरफिरे माँ-बाप बड़ी ही बेशर्मी से ये बोलने से नहीं चूकते की तो क्या हो गया, वो है ही इतना स्मार्ट, जवान खून, ऐसी छोटी-मोटी बातें तो होती ही रहती हैं. नॉट अ बिग डील. यहाँ एक बात तो समझ आती है की बच्चे को कुसंस्कार अपने माँ-बाप की ख़राब परवरिश से मिले और उन माँ-बाप की ऐसी सोच उन्हें उनके पैसों के रुतबे, उनकी पितृसत्तामक सोच और उनके भी पेरेंट्स द्वारा की गई उनकी ख़राब परवरिश का, उनके ख़राब सामाजिक दशा का, उनकी ख़राब संगती का, उनके विकृत मानसिकता का, उनकी अजीब सी घिसी-पिटी सोच का, उनके कम पढ़े लिखे होने का, या उनके घमंडी होने का, या यूँ कहें की उनके इमानदार न होने का कारण है.
यही अपराध अगर बेटी से हो जाये तो, उन्ही माँ-बाप के सुर एकदम से बदल जाते हैं और कहते हैं “तूने तो अपने शरीफ खानदान की इज्ज़त्त मिटटी में मिला दी” हर बात को धुंए में उड़ाने वाले लोग कभी एक सभ्य समाज की रचना नही कर सकते. और यह हमारे देश की बदकिस्मती है की आज ऐसे संस्कृतिहीन लोगों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ ही रही है. कोई अपने अवगुण देखने को तैयार नहीं, सिर्फ अपनी फालतू बातों को सही साबित करने में लगे होते हैं. उन्हें संस्कार नाम से ही एलर्जी है.
आज ज़्यादातर पेरेंट्स में होड़ सी मची हुई है की उनका बच्चा भी टीवी पर दिखे, रियलिटी शोज़ जीते, उसे भी अवार्ड्स मिले, वो भी खूब सारा पैसा कमाए, चाहे उसकी उम्र 5 साल या 1 साल ही क्यों न हो. उसे भी ऑक्सफ़ोर्ड, एमआईटी, स्टैनफोर्ड, आईआईटी जैसे बड़े-बड़े संसथान में एक ही प्रयास में दाखिला मिल जाये, चाहे वह पढाई में अच्छा हो न हो. आज कामकाजी पेरेंट्स अपने एक महीने के बच्चे तक को अपने और अपने घर से दूर दूसरे लोगों के भरोसे  क्रेच में छोड़ देते हैं और उम्मीद करते हैं की वो भी संस्कारी बने और उनमे वो सारे गुण आ जाये जो उन्हें अपने माँ-बाप से मिली.
लगभग हर पेरेंट्स यही चाहते हैं की उनके बच्चे को संस्कारों का पता हो न हो, अपनी संस्कृति का ज्ञान हो न हो, अपने इतिहास का ज्ञान हो न हो, अपनी टेक्स्ट बुक्स के लेसंस याद हो न हो लेकिन उन्हें अंग्रेजी बोलना आना चाहिए. तभी शायद उन्हें मॉडर्न होने का एहसास होगा. तभी शायद भारत का हर बच्चा खुद को पढ़ा-लिखा कह पायेगा. कोई 12वी भी ठीक से पास नहीं, लेकिन अंग्रेजी आती है तो उसे एकदम से मॉडर्न होने का तमगा पहना दिया जाता है. और इसके पीछे वो बकवास सोच है जो भाषा को भी ऊंच-नीच का कारण बना देते हैं.
हमने कभी इस बात को समझने की ज़हमत उठाई की स्कूल का कांसेप्ट दुनिया में क्यों आया ? क्योंकि बच्चों का कॉम्पिटिशन दुनिया भर के बच्चों से नहीं बल्कि कम बच्चों से एक छोटे से ग्रुप से हो ताकि एकदम से नही बल्कि धीरे-धीरे उनका सर्वांगीण विकास हो सके. ठीक वैसे ही जैसे एक नए वाहन के इंजन को शुरूआती दिनों में हम जान-बुझ कर हम मिनिमम माइलेज पर रखते हैं (यह जानते हुए भी की इससे आयल कंसम्पशन ज्यादा होगा), क्योंकि वही इंजन सालो-साल बिना किसी रुकावट के चल सके. इस बात को सभी लोग समझें और यह सीख लें की बच्चों की मासूमियत उनसे न छीने. उन्हें मच्योर होने का वक्त दें, उन्हें उम्र के हिसाब से चीज़ों को अनुभव करने दे, ज़बरदस्ती उन्हें मच्योर (एडल्ट) होने का एहसास न कराएँ. अगर आप स्कूल के पीछे के कांसेप्ट को समझेंगे, कुछ लोगों को यह बात बताएँगे तो वो भी इस बात का अनुसरण करेंगे और यह सिलसिला बढेगा तभी बच्चों में मासूमियत बनी रहेगी और हर तरह के बाल-अपराध खत्म होंगे.
हमें यह समझना होगा की जो सोच आज हमारी है वही हम अपनी अगली पीढ़ी को हस्तानांतरित करते हैं. हमें ज़रूरत है की हम ग़लत को ग़लत और सही को सही कहने की आदत डालें. अपने ढकोसलों और कुबुद्धि पर मॉडर्निज़्म का जामा न चढ़ाये. संस्कारों को समझे, अपने पेरेंट्स से हर मुद्दे पर बात करें, हर रोज़ एक हेल्दी डिस्कशन ज़रूर करें. अपने आस-पास की अच्छाइयों और बुराइयों को समझे. उनसे सीख लें. इमानदारी, सच्चाई और सहनशक्ति की भावना से ही सारे काम करें. इन बातों को समझे, अपनी सोच को विशुद्ध रूप से अच्छा बनाये और ज्यादा से ज्यादा सकारात्मक ज्ञान देने वाले लोगों के सानिध्य में रहें. यह कह देना की सिर्फ हमारे अकेले के करने से कुछ नहीं होता, यह हमारी सबसे बड़ी बेवकूफी है. हमें समझना ही पड़ेगा की हम खुद को सुधारेंगे, तभी हम अपने परिवार को, अपने समाज को और इस दुनिया को अपराध मुक्त बना पाएंगे. इसके साथ ही बिना शोर मचाये, हम अपनी महत्ता को समझते हुए अपने परिवार से ही अच्छाई की इस मुहीम को अपने स्तर से शुरू करे, मेरा विश्वास है की हमारी यह पाक मुहीम भी दुनिया से अपराध का खात्मा करने में सहायक रहेगी.

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