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सँभलने का वक्त

Posted by Pallav Anand
January 17, 2018

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मजबूत शारीरिक बनावट और बलिष्ठ भुजाओं के साथ हाथ जोड़कर बैठे एक व्यक्ति की तस्वीर। तस्वीर के ऊपर सोशल मिडिया के उन्मादियों द्वारा हिंदुत्व को महिमामंडित करने वाले विशेषणों और उपाधियों का प्रयोग। ऐसा लग रहा था जैसे हिन्दू धर्म का संपूर्ण अस्तित्व खतरे में हो और एक तारणहार उसकी रक्षा को अवतरित हुआ हो।

शम्भू नाथ रैगर एक जघन्य हत्या को अंजाम देता है। उसकी वीडियो बनाता है। फिर धर्म का चोंगा ओढ़कर अपनी नुमाइश लोगों के सामने करता है। फेसबुक और व्हाट्सएप की बौराई भीड़ उसमें अपना नायक ढूंढ लेती है। उसकी तस्वीर को लोग अपनी डीपी में लगाने लगते हैं। हिन्दू एकजुटता के नाम पर उसके अकाउंट पर पैसे जमा किये जातेे हैं।

नफरतों की यह चिंगारी तब और उग्र हो जाती है जब उद्दंड भीड़ का एक जत्था हिंसा और मारपीट पर उतारू हो जाता है। उदयपुर न्यायालय की छत पर भगवा ध्वज लहरा दिया जाता है।

अब जाकर यह ख़बर सामने आती है कि अपने अनैतिक कृत्यों और गुनाहों पर पर्दा डालने के लिए इस व्यक्ति ने लव जिहाद का स्वांग रचा। धर्म की आड़ लेकर खुद को ढकने की कोशिश की।

इस सोशल मीडियाई युग में कितना आसान है लोगों को विद्वेष और घृणा के आवेग में बहा ले जाना। पिछले कुछ समय में ऐसी कई घटनाएं हुई, जिसमें अफवाहों और झूठे तथ्यों ने सोशल मीडिया का सहारा पाकर हिंसा और उपद्रव का सफर तय किया।
विशेषकर धार्मिक मामलों में ऐसा कर पाना और भी आसान हो गया है।

यह ठहरने और सँभलने का वक्त है और संभलकर सोचने का भी। खासकर नई फसलों के लिए। क्योंकि उसके विचारों में विष भरा जा रहा है। उसे काटा जा रहा है, अपनी साझी सम्पदा और विरासत की जड़ों से। उसे एकांगी बनाने की कोशिश हो रही है। अगर यहाँ नहीं संभले तो एक दिन हम अपने मुल्क की आत्मीयता, एक-दूसरे को समाहित कर लेने की क्षमता और उसकी खूबसूरती को खो बैठेंगे।
पल्लव

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