संविधान में अधिकारों के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता

Posted by NEERAJ YADAV
January 25, 2018

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आज भारत अपने आइन के लागू होने की 69वीं वर्षगाँठ मना रहा है साल दर साल ये दिन केवल खुशियाँ मनाने के लिए नहीं आता बल्कि इसलिए आता है कि भारतीय संसद ये मूल्यांकन करे कि अधिकारों की नई व्याख्या की जरूरत है या नहीं क्योंकि प्रौद्योगिकी के बढ़ने की वजह से राज्य व्यक्ति के अधिकारों में सेंध लगाकर उसके दायरे को सीमित कर रहा है।1950 में जब हम आजाद हुए तो जनता के साथ भेदभाव के कुछ सीमित आधार थे इसलिए संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 15 में केवल रेस,जाति,लिंग,धर्म और जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव की पाबंदी लगाई।26 नवंबर 1949 के एतिहासिक भाषण में डॉ आंबेडकर ने कहा कि हर पीढ़ी अपने आप में एक राष्ट्र होती है और वो अपने अधिकारों के दायरे को अनुच्छेद 368 का प्रयोग कर बढ़ा सकती है।1994 में दक्षिण अफ्रीका ने विश्व के महान क्रांतिकारी नेता नेल्सन मंडेला के नेतृत्व में जब संविधान को अंगीकार किया तो अफ्रीका ने अपने बिल ऑफ़ राइट में भेदभाव के आधारों को बहुत व्यापक किया अफ्रीका ने उसमें race, gender, sex, pregnancy, marital status, ethnic or social origin, colour, sexual orientation,
age, disability, religion, conscience, belief, culture, language and birth place को आधार बनाया।अफ्रीका केवल लिंग तक सीमित नहीं रहा उसने जेंडर के नाम पर होने वाले भेदभाव को भी पटल पर लाया,प्रेगनेंसी पर होने वाले भेदभाव को पटल पर लाया,यहीं नहीं रुका उसने सेक्सुअल ओरिएंटेशन को भी भेदभाव का आधार मानते हुए उसे दूर करने के लिए उत्तरदायी हुआ।सेक्सुअल ओरिएंटेशन मीन्स LGBT को संरक्षण के दायरे में लाना।1994 में अफ्रीका ये अधिकार देता है अपने नागरिकों को लेकिन 2012 में भारतीय अपेक्स कोर्ट LGBT के अधिकारों को असंवैधानिक करार देती है।आज 69 साल हो गए इन्हीं 69 सालों में अफ्रीका    में मंडेला जेल से बाहर आते हैं और अपनी जनता को अधिकार दिलाते हैं और मर कर अमर भी हो जाते हैं लेकिन हम इन 69 सालों में बाबरी ढहाते हैं,सिख दंगे कराते हैं,गोधरा कराते हैं यही नहीं आपातकाल भी लगाते हैं और दूसरे के सेक्सुअल ओरिएंटेशन का मज़ाक बनाकर प्रोफेसर सिरस जैसे को मरने पर मजबूर कर देते हैं।राज्य अधिकार को सीमित करने के लिए दलील देता है कि राजनैतिक आज़ादी सामाजिक और आर्थिक आज़ादी देने में बाधा उत्पन्न करता है।बिना राजनैतिक अधिकारों के तो राज्य निरंकुश हो जाता है, साहब!डॉ आंबेडकर ने कहा है राजनैतिक,सामाजिक और आर्थिक अधिकार तीनों का संबंध अटूट होना चाहिए नहीं तो एक भी टूटा तो संविधान और आज़ादी का उद्देश्य बिखर जाएगा।

 

 

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