संस्कार जनित यौन कुंठा से बाधित होती सर्जनात्मकता

Posted by Vikash Anand
January 24, 2018

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हम भारतीयों को अक्सर यह याद दिलाया जाता रहता है कि भारत युवाओं का देश है या देश कि बहुत बड़ी आबादी अभी युवा है (इसमें युवतियाँ भी शामिल है परन्तु यह लेख युवाओं पर ही केन्द्रित रहेगा)। कि युवा देश की दिशा और दशा बदलने का दमखम रखते हैं। परन्तु युवाओं की दशा और वे किस दिशा में जा रहे हैं, उनकी समस्याएँ आदि पर यदा-कदा ही सुनने या पढ़ने को मिलता है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि यदि युवा अपनी शायद ही सुधरने वाली दशा के बारे में पढ़कर या सुनकर उसके कारणों को जानने कि कोशिश में लग गए तो सिंहासन खाली करने की नौबत आन पड़ेगी।

खैर चिंता की कोई वजह नहीं है क्योंकि इस देश की हवा ही थोड़ी आशावादी है, जिसने देश के अधिकांश शिक्षित युवाओं को रोजगार पाने के प्रयास में अपनी युवा अवस्था या जवानी को खपा देने में व्यस्त किये रखा है। वैसे यह लेख रोजगार या बेरोजगारी जैसे चुनावी मुद्दों पर राय प्रकट करने के लिए नहीं लिखा गया है। यह लेख तो बेरोजगार युवाओं के यौवन की नैसर्गिक इच्छाओं और उससे उपजने वाली समस्याओं के बारे में बात करने वाला है।

आज के दौर में एक शिक्षित युवा के अच्छी नौकरी प्राप्त कर जीवन में तथाकथित व्यवस्थित (सेटल्ड) होने तक, उसकी आयु कम-से-कम 26-27 वर्ष की तो हो ही जाती है। और यदि चाहत सरकारी नौकरी की हो तो आयु का कभी-कभार तीस के पार चले जाना कोई  आश्चर्यजनक बात नहीं है। जबकि युवा या जवान होने की शुरुआत तो 13-14 वर्ष की आयु से ही हो जाती है।  21 वर्ष कि आयु पार करते-करते यौवन कि नैसर्गिक इच्छाएँ अपनी माँग शरीर पर थोपने भी लग जाती हैं। ऐसी स्थिति में युवा मन अपने शरीर के साथ क्या करे?

वर्तमान समय में हमारे समाज की एक अनोखी माँग है युवाओं से कि जब तक लड़का आर्थिक तौर पर पूरी तरह सुरक्षित या रोजगार नहीं पा लेता है तब तक उसे शादी नहीं करनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, वयस्क होने के बावजूद भी शादी से पूर्व कोई लड़का सम्मानजनक तरीके से यौन-इच्छओं की पूर्ति नहीं कर सकता। हालांकि, बड़े शहरों में लिव-इन (सहवास) बड़े प्रचलन में है (अपनी विद्रूपताओं के साथ)। परन्तु, मंझले और छोटे शहरों में लिव-इन में जीना मुश्किल ही है। साथ ही हम इससे भी इंकार नहीं कर सकते कि  भारतीय समाज शादी किये बगैर विपरीत सेक्स के बीच स्थापित शारीरिक संबंधो को हेय की दृष्टि से देखता है।

अब सवाल ये उठता है कि फिर देश के ज्यादातर युवा अपनी प्राकृतिक यौन इच्छाओं का दमन करके तथाकथित संस्कारी जीवन क्यों बिता रहे हैं?

इस सवाल का जवाब भारत में बच्चे के पढा़ई शुरू करने से लेकर उसके रोजगार प्राप्त करने तक के उसके सफर में छुपा हुआ है। भारत में, घरवाले अपने बच्चे को तब तक गुजरा भत्ता (खर्च करने के लिए रूपये) देते रहते हैं जब तक कि उनका बेटा रोजगार प्राप्त नहीं कर लेता है। भारत में सामान्य रूप से रोजगार पाने की जंग डिग्रियाँ या अकादमिक उपाधियाँ प्राप्त करने के बाद शुरू होती है। यह जंग कई मामलों में थोड़ा लम्बा भी खींच जाती है अर्थात आयु कई दफा 30 के पार भी पहुँच जाती है। फिर भी घरवाले बेटे को गुजारा भत्ता देना बंद नहीं करते। बस शर्त ये रहती है कि बेटा संस्कारी बना रहे और लड़की के चक्करों से दूर रहे। यानी, समाज के बनाए मापदंड के अनुसार चरित्रवान बना रहे। जबकि कई अन्य देशों, खासकर पश्चिमी देशों  में, ऐसा देखा गया है कि बच्चों को एक तय उम्र या समयसीमा तक ही घरवालों से खर्च मिलता है, जो कि अमूमन स्नातक की पढ़ाई तक होता है। उसके बाद युवा स्वयं अपने गुजारे का साधन तलाशता है। भारत में इस प्रकार की कोई समयसीमा निर्धारित नहीं है।

भारत की इस व्यवस्था से एक तथ्य उभरकर सामने आता है कि घरवालों द्वारा युवाओं को गुजारा भत्ता देना, जब तक की लड़का कोई रोजगार प्राप्त न कर ले (खासकर शिक्षित युवाओं के परिवारों द्वारा), एक तरीके से युवाओं को परिवार/समाज की परम्पराओं/संस्कारों से जोड़े रखने का कार्य करता है। युवाओं को बागी होने से रोकता है। उन्हें शादी पूर्व अपनी यौन इच्छओं को व्यक्त करने से रोकता है। एक बात और, शादी करने के लिए जिस आर्थिक आत्मनिर्भरता या रोजगार पाने कि शर्त युवाओं पर थोपी गयी है, अधिकांश मामलों में उसका मापदंड भी परिवार खुद ही पहले से तय कर रखता है। इसलिए भी वे अपने बच्चों को लम्बे समय तक गुजारा भत्ता देने को तैयार रहते हैं।

देखा जाए तो भारत में एक पीढ़ी पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। पहले, ज्यादातर मामलों में, लड़के की शादी एक तय उम्र खासकर 18 से 21 के बीच कर दी जाती थी। भले ही लड़का नौकरी न प्राप्त किया हो या उसकी पढाई जारी ही क्यों न रहती हो। यह व्यवस्था सही थी या गलत इसके बारे में लेखक का कोई मत नहीं है। लेकिन यह बात तो स्पष्ट ही है कि पहले का युवा आज के युवाओं की भांति यौन कुंठाओ का शिकार तो नहीं ही रहता होगा। उसकी प्राकृतिक यौन इच्छाएं प्राकृतिक एवं स्वास्थ्यवर्धक तरीके से ही पूर्ण होती रही होगी।

वर्तमान समय में, युवाओं की एक बड़ी आबादी यौन कुंठाओं से ग्रसित है। जिसके कारणों के पड़ताल की जरुरत है। ये कुंठाएं ही है जो भारत जैसे संस्कारी और सभ्य देश को पोर्न समाग्री के सबसे बड़े उपभोक्ता देशों में से एक बनाया है। और इसमें युवाओं के योगदान का अध्ययन किया जाना चाहिए।

अपना यह लेख एक संस्मरण का जिक्र कर अंत करूँगा जिसे मेरे एक अज़ीज़ मित्र ने मुझे सुनाया था। जो कुछ ऐसा था कि मेरा मित्र अपनी अकादमिक उपाधियाँ धारण करने के बाद, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए इलाहाबाद गया। उसने इलाहाबाद के बारे में काफी कुछ पहले से ही सुन रखा था। उसमें एक बात यह भी थी कि वहाँ पढ़ने वाले छात्र रात-रात भर या देर रात तक जागकर पढाई करते हैं।  उसने एक लॉज में कमरा लेकर अपनी तैयारी शुरू कर दी। साथ ही, रातजग्गे के प्रयास में भी लग गया। उसके बगल के कमरे में एक बड़े भैया रहते थे, जिनकी उम्र लगभग 30 पार करने को थी। उनकी शादी नहीं हुई थी। वे सिविल सर्विसेज की परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे। वे रात को ग्यारह बजे तक सो जाया करते थे। मेरे मित्र ने एक बार उनसे बातचीत के दौरान इलाहाबाद के छात्रों के रात में जागकर पढ़ने की विशेषता पर भी बात की और उनके द्वारा इसे नहीं फ़ॉलो करने का कारण भी जानना चाहा। उत्तर में उन बड़े भाईसाहब ने कहा कि- वो रात में देर तक जागकर पढ़ाई इसलिए नहीं करते क्योंकि आधी रात के बाद शरीर कुछ और भी माँगने लग जाता है, जिसकी पूर्ति वे फिलहाल नहीं कर सकते।

 

संदीप कुमार

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