#हमारे मुंबई मे नयी साल की शुरुवात एक पिछड़ी सोच के साथ

Posted by Poonam Singh
January 5, 2018

Self-Published

वैसे तो हमारे मुंबई मैं हर त्योहार ऐसे मनाया जाता हैं मानो हर दिन नया हों। नए साल के दूसरे दिन जब सब लोग मौज मस्ती के साथ नए साल की शुरुवात करते हुए अपने अपने दफ्तर, स्कूल और बहोत से काम के लिए गए तो किसको पता था की ऐसी खबर आएगी की जहां जाती और धर्म के नाम पर दंगे फसाद शुरू हो गए होंगे. वैसे  तो हमारे मुंबई मैं जाती और धर्म को लेकर कभी ऐसे घटना नही हुए हैं जहां तक हमने सुना हैं।

साल की शुरुवात जौनवारी महीने मे बहोत ही ठंड के साथ हुई परंतु जहां ठंड भरा दिन था तो वही कुछ लोगो ने जाती धर्म  के नाम पर गरम गर्मी कर दी। पूरा माहौल गरम हो गया। रोज़ के जैसे मैं ऑफिस मैं थी तो अचानक घर से फोन आया और कहा गया ऑफिस  से बाहर नहीं निकालना। पता चला कुछ लोगो ने बहोत  साल पहले हुई घटना को मुद्दा बनाकर पथराओ पर उतर आए . कहीं बस जला दिये गए तो कहीं लोगो को पीटना चालू कर दियाँ गया तो वही कहीं दुकानों को तोड़ दिया गया। गौरतलब  यह हैं की जहां ये घटना हुई वही हमारा ऑफिस हैं॥

मेरे 30 साल के होशो हवाश के सफर मैं ये पहली घटना थी, जहां अंदर से दर  तो बहोत था परंतु ये सोच कर मैं ऑफिस निकाल आई की अब माहौल ठीक हो गया होगा। चेंबूर का इलाका जहां आए दिन गाड़ियों की आवाजाही से और लोगो के भीड़ से आप एक दूसरे का चेहरा नहीं देख पाओगे उस जगह पर ऐसा सानाटा पसरा हुआ था मानो मातम छा गया हो । हर जगह शीशे टूटे हुए सिर्फ पुलिस की गाडियाँ घूम रही है, तो कहीं सिर्फ नारे बाज़ी ।  मुझे घर जाने के लिए तकरीबन 5.00 बजे कोई गाड़ी नहीं मिली, यहाँ तक कोई रिकशा वाले जाने क लिए तयार नहीं। मैं बहोत घबरा गयी थी परंतु ये सोच कर हिम्मत जताई रही की कश्मीर के लोग कैसे हर दिन पथराओ के बीच रहते हैं ।  जैसे तैसे मैं घर पहुंची। परंतु सोचा काश किसी ने मेरे बस पर पथर मारा तो???

दूसरे दिन महाराष्ट्र बंद का ऐलान कर दिया गया परंतु उस बंद के वजह से कितना नुकसान हुआ हमारा कोई सोच नहीं सकता। हमारे जैसे दफ्तर जाने वाले लोगो की महीने के एक दिन का पैसा काट दिया जाता हैं। ये जोब्लेस्स लोग नहीं समाज सकते जिनहोने ये सब दंगा फैलाया। हमारा देश जहां ये जाती वाली बात कभी नही जाती। हम सोचते हैं हम हिन्दुस्तानी हैं परंतु यहा हम पहचाने जाते हैं अपने जाती धर्म से। ये सोच हमे  ही खुद के अंदर बदलना होगा।  देश डिजिटल हो रहा हैं परंतु हमारी सोच अब तक वही हैं। मैं ये नहीं कहती जो हुआ अच हुआ या बुरा हुआ परंतु क्यूँ हुआ?? इसका हल आप शांति से भी निकाल सकते हैं। जब देश के अंदर ये हाल हैं तो हम पड़ोसी देशो को क्यूँ बुरा भला कहते हैं ?

सोचना जरूर…

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