क़ानूनहिंता और पद्मावत

Posted by Anubhav Kumar
January 27, 2018

NOTE: This post has been self-published by the author. Anyone can write on Youth Ki Awaaz.

पिछले कुछ दिनों से सर्दी में कडक गर्मी का एहसास दिलाने वाली पद्मावत कॉन्ट्रोवर्सी को चाय की चुस्की के साथ, जैसे कि आप सब कर रहे है , मैं भी देख रहा हूँ।

पहले सी बी एफ सी ने तारीखों को टाला ,उड़ती हुई खबर आई कि गुजरात चुनाव का असर है । क्षत्रियों का वोट बैंक दांव पे है वगरह जोकि आप सब मुझसे ज़्यादा समझते है क्योंकि व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट तो हम सब हैं ।

यहां बता दूँ की बचपन से ही सिनेमा देखना अच्छा लगता है और बड़े चाव से इस दिसंबर , हर दिसंबर की तरह इंतेज़ार में था साल की एक अच्छी फिल्म देखना का मौका मिलेगा , क्योंकि अच्छी फिल्म तो दिसम्बर में ही आती है ना!

तारीख टली और साहित्य, कला एवं बोलने की आज़ादी के कभी प्रचारक रहे प्रसून जोशी जी के अध्यक्षता में ये सब होता देख मेरा मन खिन हो गया और लगा कि अब भंसाली को करोड़ों का नुकसान, रणवीर को फ़िल्मफ़ेअर और मुझसे क्वालिटी सिनेमा छीन गया !

डूबते को तिनके का सहारा थी 25 जनवरी को इसके आने की खबर पर अब जो शुरू हुआ वो था न्यायपालिका ,कार्यपालिका और कानून का भद्दा मज़ाक जो कार्यपालिका ने खुद अपने हाथों किया। पहले भी फिल्मों का विरोध होता रहा है फिर वो चाहे माई नेम इज खान हो या उड़ता पंजाब पर सरकारों ने अपने हथियार कभी भी किसी गुट या ‘सेना’ के खिलाफ नही डाले थे।

कुछ राज्यो ने प्रतिबंध लगया, पहले भी लगाया था इसपे सर्वोच न्यायालय ने बोलने की आज़ादी का संवैधानिक आधार होने की बात कहते हुए कहा कि फ़िल्म का प्रदर्शन होना चाहिए। ताजुब है कि सरकार और एक गुट विशेष पुनः सर्वोच्च न्यायालय पहुचे इस बार सरकारों ने सुरक्षा व्यवस्था का हवाला दिया जिस पर कोर्ट ने ठीक ठीक साफ शब्दों में बोला फ़िल्म सेंसर बोर्ड पास हो गयी है, हमे मौलिक तौर कोई अधिकार नही इसे प्रतिबंधित करने का और वैसे भी सुरक्षा व्यवस्था मोहिया करना तो राज्य सरकारों का कर्तव्य है। चुस्की और अच्छी लेनी हो तो पता करिये जिन दो राज्यो ने वापस अर्जी की वहाँ सरकार किसकी है औऱ चुनाव कब है, मज़ा आ जाएगा!

इधर बीच एक गुट ने लोगो से अपील करना शुरू किया कि लोग खुद कर्फ़्यू लगाए जैसे कि सरकार इनके हाथ में हो , कुछ राजपूत औरतों को जौहर करने को भी उकसाते रहे। मतलब थोडी बहुत भी कानून की जानकारी रखने वाले भी समझेंगे की इस गुट ने वो सब किया जो कि आई पी सी की धारा 107 और 306 को आकर्षित करता है और तारीख नज़दीक आते हुए सुन ने में आने लगा है कि तोड़ फोड़, बच्चों के बसों में आग वगरह लगने लगी है क्योंकि राजपूतो की इसमे शान है।

मतलब एक संवैधानिक संगठन ने सर्टिफिकेट दे दिया, सर्वोच्च न्यायालय से हरी झंडी मिल गयी , वो सब हो गया जो कि कानूनी तौर पे किया जा सकता था पर फ़िल्म को प्रदर्शित करना अब भी मुश्किल हो रहा है क्योंकि सिनेमा मालिको को इन छोटे मोटे , राजपूतों के ठेकेदार बने फिर रहे गुटो से डर है।

ये एक भयावह मौहाल है और ज़रा सोचिए, कोर्ट की अवमानना हो गई, कानून तोड़े जा लिए , पंचकूला जैसा मौहाल अब लगभग हर शहर में है, कुछ लोग राज्यो के मुख्यमंत्री से मिल के फ़िल्म बंद करने की गुहार भी लगा लिए और तमाम सरकारे चुप है मानो जैसे कुछ हुआ ही नही, मज़ाक बना के रख दिया है सरकारों ने जो एक छोटे से गुट के लोगो या यूं कहें अराजक तत्वों को रोक नही सकती? इसके पीछे राजनैतिक कारण हो या कोई और पर ये जो क़ानूनहिंता दिख रही कतई संवैधानिक तो नही।

फ़िल्म का विरोध करने का हक है और मौलिक अधिकार भी पर अराजकता फैलाना नही। राजपुत के गौरव को सुरक्षित करने के लिए एक संगठन ने पूरे संवैधानिक व्यवस्था को तार तार कर दिया बिना किसी साक्ष्य या यूं कहे फ़िल्म बिना देखे?

फ़िल्म कुछ लोगो को दिखाई गयी और एक सुर में सबने इसके तारीफ की और राजपूत गौरव को और प्रचण्ड करती यह फ़िल्म ऐसा बोला , सुन ने में आ रहा ख़िलजी को हैवान दिखाया है, समाज के लोग तैयार हो जाइए शायद एक और प्रोटेस्ट हो सकता है, अब दूसरे समुदाय से।
खैर मोटा मोटी बात ये की फ़िल्म अच्छी बनी है और देखने वाला क्रांतिकारी कदम उठाने की इच्छा तो है पर सरकार से गुज़ारिश भी की अगर फ़िल्म देखना क्रांति हो जाएगी तो जनाब आपके खिलाफ आवाज़ कैसे उठाएंगे , इसी में रह जाएंगे, क्योंकि बताये थे न कि सिनेमा बहुत देखते है।

आप लोग ये अब सोच रहे होंगे कि मैंने ‘करनी सेना’ का नाम नही लिया, जी हाँ, क्योंकि मेरे अनुसार वो इतनी से भी जगह के हकदार नही जितनी जगह उन्हें इस देश में मिल चुकी है क्योंकि किसी औरत के नाक काटने की बात देश के सामने करने वाले लोग केवल राजपूतों का गौरव गिरा सकते है बढ़ा नही सकते औऱ गौरव बढ़ाने का काम भंसाली ने किया है!

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.