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ग़ज़ल का कारोबार

Posted by Raushan Chauhan
January 14, 2018

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कभी शबनमी सी रात तो कभी भींगी-भींगी सी चाँद
कभी उसपे ग़ज़ल कहता तो कभी उसे ग़ज़ल कहता

मै जिसे ओढ़ता-बिछाता वो ग़ज़ल उसे सुनाता
कभी वो मुस्कुराती तो कभी ग़ज़ल मुस्कुराता

उसके नज़रों को पढ़ मै ग़ज़ल लिखता
कभी नज़र सलाखें बनती तो कभी कैदखाने

अपने धड़कन के धागों से ग़ज़ल गुथता
कभी ख्वाब पढ़ता तो कभी ख्वाब पढ़ाता

उसके चेहरे की चमक पर चाँद लटका था
कभी ग़ज़ल गाता तो कभी ग़ज़ल बनाता

उसकी यादों से ग़ज़ल का कारोबार करता
मुनाफा कम था पर गुज़ारा चल जाता ….रौशन

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