21वीं सदी के दौर में मुद्दों की गारन्टी की इक्छा न करें।

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काये लला, जो का हो रहो ?

पारसमणि अग्रवाल

काये लला जो का हो रहो ये पंक्ति पढ़कर थोड़ा सा अटपटा जरूर लग रहा होगा और संवेदनाओं के बगीचे ऐसे पुष्पों ने स्वंय को पल्लवित करने की प्रक्रिया को तेज कर दिया होगा कि सवाल किस बात को लेकर किया जा रहा है। अच्छा….अच्छा आप भी नहीं समझे कोई बात नहीं, चलो हम समझाते है ।
’’ काये जी, अपने देश को का हो रहो।
अब अपनो लला रात रात भर रो रहो।
नौकरी के लाने अखबारन को घूरके,
फिर फिरके अधिकारियन के पैर धो रहो।
काये जी, अपने देश को का हो रहो। ’’
जी…जी..जी एकदम सही पकड़े है बात वर्तमान परिवेश की ही हो रही, बात हमारे जिम्मेदारों की हो रही बात सरकार की हो रही। सृष्टि का नियम है परिवर्तन। बदलता वक्त हालात भी बदल देता है ये बात आधुनिक सरकारों/जिम्मेदारों पर सौ फीसदी सत्य करार लेती प्रदर्शित हो रही है। वोट बैंक की सियाशी चाल बाजी में आम जनता से जुड़े मुद्दे राजनैतिक गलियारों से लापता हो गये और आधारहीन बहस, गैर जरूरी मुद्दों के श्रीचरणों में भारतीय राजनीति नतमस्तक होकर यह संदेश देती महसूस हो रही है कि 21वीं सदी के दौर में मुद्दों की गारन्टी की इक्छा न करें। बस आप गुमराह होते रहे धर्म-जातिवाद के नाम खाईयों को गहरा करते रहे। चकाचौंध से ओत-प्रोत सपने देखते रहे क्योंकि देश विकास कर रहा है महॅगाई, बेरोजगारी जैसी समस्याओं पर एकदम चुप रहे। अन्नदाता किसान मर रहा है। देश प्रगति कर रहा है।
चलो छोड़ो इन सब बातों को, भारत के युवा प्रधान देश है इसलिये बात युवाओं की करते है और बात युवाओं की हो और जिक्र शिक्षा का न हो तो यह बेईमानी एवं अन्यायसंगत होगा । नहीं मानते तो चलो बात शिक्षा की ही करते है और उदाहरण के तौर पर इंजीनियरिंग छात्रों को लेते है क्योंकि एक समाचार पत्र की रिपोर्ट के मुताबिक विद्यार्थियों के अभाव में देशभर में 62 इंजीनियरिंग कॉलेज बन्द हो चुके है जिसमें हरियाणा के ग्यारह और उत्तरप्रदेश के पॉच कॉलेज में ताले लटक गये है इसको लेकर विगत चार सालों से रूझान कम होना बताया गया है। आप ही अंदाजा लगा सकते है कि एक वक्त वह था कि इंजीनियर, डॉक्टर बनने के लिये विद्यार्थियों की भारी संख्या प्रतिस्पर्धा की दौड़ में खड़ी रहती थी और एक वक्त ये है जहॉ एकदम विपरीत विद्यार्थियों का ही टोटा हो गया इसे भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर एक संकट के रूप में देखा जाये तो कतई अन्यायपूर्ण नहीं होगा । वक्त रहते ऐसी शिक्षा व्यवस्था को बदलना होगा जो एक मालिक बनने के वजह एक नौकर बनने की दिशा में प्रोत्साहन प्रदान करती है।

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