मैनुअल स्कैवेंजर्स की लाशों पर स्वच्छ भारत की इमारत नहीं खड़ी हो सकती

Posted by Gaurav Raj in Hindi, Human Rights, Society
January 11, 2018

साल 2013 में सरकार ने ‘मैनुअल स्कैवेंजिंग’ (यानी कि सर पर मैला या इंसानों का मल ढोना) की ‘जानेलवा और अपमानजनक’ प्रथा को समाप्त करने के लिए एक कानून बनाया, जो ‘प्रोहिबिशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट ऑफ मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड देयर रिहैबिलिटेशन एक्ट 2013’ के नाम से जाना जाता है। बावजूद इसके तमिलनाडु, बिहार, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल और कई दूसरे राज्यों में आज भी ‘मैनुअल स्कैवेंजिंग’ के नाम पर दलितों का दोहन और शोषण लगातार जारी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 2018 के पहले हफ्ते में ही सात ‘मैनुअल स्कैवेंजर्स’ (यानी कि सर पर मैला या इंसानों का मल ढोना) की मौत हुई है। बेंगलूरू के एक अपार्टमेंट में एक जाम ‘मैनहोल’ को साफ करते समय तीन सफाई कर्मचारियों– मद्धे गौड़ा, श्रीनिवास और नारायण स्वामी की मौत हुई।

साल के पहले ही दिन मुंबई में एक सीवर लाइन को साफ करते समय तीन लोगों ने अपनी जानें गवाईं। वो सीवर लाइन ज़मीन से दस मीटर नीचे थी। मज़दूरों को केबल क्रेन के सहारे ऊपर लाया जा रहा था, इसी बीच केबल टूटने के कारण यह दर्दनाक हादसा हुआ। इसके अगले दिन भी एक कर्मचारी की मौत हुई थी और एक को गहरी चोट आयी थी।

एक अंग्रेजी दैनिक में छपे एक लेख के मुताबिक विडंबना यह है कि भारत जिस दिन मंगल ग्रह पर दाखिल हुआ था, उस दिन बेंगलूरू के हेन्नूर में आपूर्ति और सीवरेज बोर्ड (BWSSB) के दो दलित अनुबंध कार्यकर्ता, श्रीधर नागराजप्पा (20) और बन्द्री मारप्पा (22) की एक मैनहोल में घुटन के कारण मौत हो गई थी।

दरअसल मैनुअल स्कैवेंजर्स की मौत की वजहों में ‘घुटन’ एक बहुत बड़ा कारण होता है। किसी सेप्टिक टैंक, पॉटहोल या मैनहोल में जमा हुई गंदगी के कारण कई तरह की जानलेवा रासायनिक गैसें पैदा होती हैं। कई बार ये गैस इतनी ज़हरीली हो जाती हैं कि फेफड़ों में जाने पर घुटन के कारण इंसान की मौत हो जाती है। दुर्घटनाओं की यह लिस्ट इतनी लम्बी है कि आपको पढ़ते-पढ़ते दलितों पर हुए इस अत्याचार पर रोना आए न आए, सरकार के निकम्मेपन पर गुस्सा तो ज़रूर आएगा।

‘प्रोहिबिशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट ऑफ मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड दिअर रिहैबिलिटेशन एक्ट 2013’

आधुनिक भारत में एक तरफ जहां डिजिटल इंडिया बसता है, वहीं दूसरी और हमारे पास ऐसी कोई तकनीक नहीं है जिसके सहारे हम ‘मैनुअल स्कैवेंजिंग’ को ‘ऑटोमैटिक स्कैवेंजिंग’ में बदल सकें। ‘प्रोहिबिशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट ऑफ मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड दिअर रिहैबिलिटेशन एक्ट 2013’ में कई ऐसे प्रस्ताव हैं जो सफाई कर्मचारियों के अधिकारों की बात करते हैं।

इसमें लिखा है, “इंसान के मल को साफ करने के लिए नियोजित उपकरणों और ऐसे सुरक्षात्मक गियर, जिनमें ग्लव्स, मास्क, कपड़े और जूते शामिल हैं का प्रयोग करना अनिवार्य है। उन्हें बुनियादी सुविधाओं के साथ-साथ वो सारे आधुनिक उपकरण मुहैया कराये जाएंगे, जिनसे वो किसी सीवर, सेप्टिक टैंक या नाले को साफ कर सकें। इन लोगों को कॉन्ट्रैक्ट बेसिस (अनुबंध) पर नियुक्त किया जाएगा और इनके हक-हुकूक की रक्षा की जायेगी।”

एक्ट के शुरूआती पैराग्राफ में ये भी लिखा है, “ऐसे मज़दूरों को ‘मैनुअल स्कैवेंजर्स’ नहीं समझा जाएगा।” एक्ट में इन मज़दूरों के बीमा का प्रावधान है। किसी तरह की दुर्घटना होने पर उचित मुआवज़ा भी देना होगा। अगर कोई निजी कांट्रेक्टर इसका अनुबंध लेता है तो उसे एक्ट के तहत मज़दूरों का पंजीकरण करवाना होगा ताकि किसी भी दुर्घटना में उसकी पहचान हो सके और उसे उचित मुआवज़ा मिल सके। लेकिन ऐसे प्राइवेट कॉन्ट्रैक्टर्स और प्रधानों के गैरज़िम्मेदाराना रवैय्ये के चलते मरने के बाद मज़दूरों की पहचान भी नहीं हो पाती और उनके परिवार वालों को मुआवज़े के लिए दर-दर भटकना पड़ता है।

‘सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन’ के बेज़वाड़ा विल्सन ने ऐसे पीड़ितों को उनका हक दिलवाया है। बेज़वाड़ा को उनके काम के लिए रेमन मैगसेसे पुरस्कार भी मिल चुका है। पंद्रह पन्नों के इस एक्ट में प्रावधान तो बहुत से हैं, मगर सिर्फ कागज़ों पर।

कई रिपोर्ट्स ये कहती हैं कि ‘मैनुअल स्कैवेंजर्स’ की मौतों के मामलों में तमिलनाडु सबसे आगे है। तमिलनाडु सरकार और भारत सरकार के आंकड़ों की मानें तो 1993 से अब तक कुल 323 लोग सफाई करते वक्त मारे गए हैं, जिनमें 45% लोग तमिलनाडु में मारे गए हैं। लेकिन बेज़वाडा विल्सन और उनकी संस्था इसे खारिज करती है।

स्वच्छ भारत और मैनुअल स्कैवेंजर्स

स्वच्छ भारत को इस देश में पूरे गाजे-बाजे के साथ लाया गया था। ऐसा लग रहा था मानो देश एक ऐसे मिशन पर निकल रहा है जो वाक़ई में एक बड़ा बदलाव लाएगा। लेकिन वो मिशन भी नेताओं, कलाकारों, फिल्मकारों, उद्योगपतियों और समाज सुधारकों के लिए ‘फोटो-शो’ बनकर रह गया। हर साल 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के दिन लोग झाड़ू लेकर निकल जाते हैं।

नए-नए नारों से देश को ‘स्वच्छ क्रान्ति’ की तरफ अग्रसर करते नेताओं/सरकारों की हकीकत यही है कि वो अपने घर के गुसलखानों को उन्हीं दलितों से साफ़ करवाते आए हैं जिनसे उनके जीने का बुनियादी अधिकार छीन लिया गया। वो ‘देवालय से पहले शौचालय’ की बात तो करते हैं मगर उन्हीं शौचालयों की टट्टी को सर पर ढोने का काम एक खास जाति-वर्ग के लोग ही कर रहे हैं, ये वो भूल जाते हैं। वो हर साल आम्बेडकर की प्रतिमा पर भी माल्यार्पण करते हैं और ‘मैनुअल स्कैवेंजिंग एक्ट’ पर भी, जो होकर भी नहीं है।

हैरानी होती है यह सोचकर कि डिजिटल इंडिया का भारत एक ऐसी कुरीति से ग्रसित है जो इसके विश्व गुरू बनने के सपने पर तमाचा है। हम चांद पर पहुंच गए, मगर नाली साफ करने की आटोमेटिक तकनीक नहीं ढूंढ पाए। 77 मिलियन डॉलर की लागत से हमने मंगल ग्रह पर यान भेज दिया, मगर हमारे पास इतनी क्षमता नहीं हैं जिससे हम आधुनिक उपकरण खरीदकर मैनुअल को ऑटोमैटिक कर सकें। लेकिन ज़रूरत क्या है? फ़ुर्सत किसे है हिन्दू-मुस्लिम डिबेट से?

शाम होते ही न्यूज़ चैनलों की मंडी में हर दिन लोगों की देशभक्ति की बोली लगती है। सवाल मत पूछो, राजद्रोह हो जाएगा। मत कहो कि ऊना में दलित पीटे गए, तुम लेफ्टिस्ट कहलाओगे। मत बोलो कि दिल्ली की सीवरों में लोग गिरकर मर रहे हैं, तुम कॉंग्रेसी कहलाओगे। मत करो ज़िद्द कि उन्हें इन्साफ मिले, तुम अवार्ड वापसी ब्रिगेड कहलाओगे। ये भी मत कहो कि दिल्ली में ठंड से 44 लोग मारे गए, दोषारोपण शुरू हो जाएगा। नौकरी नहीं है तो उद्यमी बनो, 2 करोड़ नौकरी की बात करोगे तो हो सकता है तुमपे राष्ट्रदोह का मुकदमा हो जाए। आधार डेटा लीक जैसी बातें सब बेकार हैं। अगर इसके खिलाफ कुछ लिखोगे तो केस हो जाएगा।

मैनुअल स्कैवेंजिंग पर कितना बजट खर्च कर रही है सरकार?

वित्तीय वर्ष 2013-14 में यूपीए-2 की सरकार ने मैनुअल स्कैवेंजर्स के पुनर्वास के लिए कुल 557 करोड़ का बजट आवंटित किया था। 2016-17 में ये राशि घटकर 5 करोड़ पर आ चुकी है। मतलब पिछले आवंटन का लगभग 1% सफाई कर्मचारियों के हक में खर्च किया जाता है लेकिन सरकार कोई ठोस जवाब नहीं दे पाती है।

2015 में सामाजिक न्याय मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, पुनर्वास की धीमी प्रगति के कारण मैनुअल स्कैवेंजर्स की निरक्षरता, स्वरोज़गार परियोजनाओं को चलाने में विश्वास की कमी और कम वसूली के कारण उन्हें ऋण प्रदान करने में बैंकों में झिझक है। मंत्रालय का कहना है, “कम आत्मविश्वास के स्तर के कारण, पहचाने गए मैनुअल स्कैवेंजर्स ये मांग करते हैं कि उन्हें स्थानीय कार्यालयों में सफारी कर्मचारी (स्वच्छता कर्मचारी) की नौकरी प्रदान की जाए।” 1 फरवरी को वित्त मंत्री आम बजट पेश करेंगे। क्या इस बार सरकार इस दिशा में कुछ अहम बदलाव के पक्ष में है या फिर अगली अंबेडकर जयंती में भी सिर्फ माल्यार्पण ही दिखेगा?

वर्तमान सरकार ने आते ही दलितों के उत्थान की बात की थी। लेकिन पिछले तीन-चार सालों से मैनुअल स्कैवेंजिंग पर खामोशी, इसके बजट में बेतहाशा कटौती और सफाई कर्मियों के बढ़ती मृत्यु दर सरकार की नीयत और इच्छाशक्ति को उजागर करते हैं। अगर ऐसा नहीं है तो सरकार को जवाब देना चाहिए उन परिवारों को जिन्होंने पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने लोगों को मरते देखा है।

उनके घर में भोजन करने से अच्छा होगा कि उन्हें समाज में इज्ज़त से जीने का हक दिलवा दें। एक नयी समिति का गठन हो जो ‘प्रोहिबिशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट ऑफ मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड दिअर रिहैबिलिटेशन एक्ट 2013’ को कारगर ढंग से क्रियान्वित करे। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि सिर्फ जाति के आधार पर ही सफाई के काम निर्धारित न हों।

अगर मैनुअल स्कैवेंजिंग पर सरकार सख्त नहीं होती है और इसे पूर्णतः ऑटोमैटिक नहीं करती है, तो मान के चलिए कि 2022 में मैनुअल स्कैवेंजिंग को पूरी तरह से ख़त्म करने की जो बात प्रधानमंत्री मोदी करते रहते हैं, तब तक शायद जाति के ही नाम पर लोग मरते रहेंगे। कभी सीवर में, कभी सेप्टिक टैंक में, कभी घुटन से या कभी केबल के टूटने से। लोगों को 2022 का सब्ज़बाग दिखाने से अच्छा होगा कि ऐसे मुद्दों पर ध्यान दें।

सर पर मैला ढोने का दर्द शायद हम और आप नहीं समझ सकते। अगर सच में समझना चाहते हैं तो बस दो दिन के लिए गृह-त्याग करें। सिर्फ़ शौच करने के लिए घर आया करें। शौचालय में मल-मूत्र को जस के तस रहने दें, उसमें फिनाइल या हार्पिक न डालें, पानी भी न गिराएं। तीसरे दिन सुबह वापस आएं और घर का दरवाज़ा खोलें। मेरा दावा है कि दरवाज़ा खोलते ही जो बदबू आपकी नाक की नसें फाड़ रही होंगी, वो मद्धे गौड़ा, श्रीनिवास और नारायण स्वामी के द्वारा सीवरों से अनुभव की गई जानलेवा दुर्गन्ध का एक छोटा सा हिस्सा भी नहीं होंगी।

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