मग चुराएंगे, पान-गुटखा, डायपर डालेंगे, तो रेलवे का बायो टॉयलेट कैसे सफल होगा?

Posted by Rachana Priyadarshini in Hindi, Sci-Tech, Society
January 16, 2018

प्रधानमंत्री मोदी ने वर्ष 2014 में सत्ता संभालते ही पर्यावरण की बेहतरी के अपने प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए रेलवे के लिए 2019 तक सभी ट्रेनों में बायो-टॉयलेट लगाने का लक्ष्य तय किया, जिसके लिए गंभीर प्रयास भी किए जा रहे हैं। भारतीय रेलवे की पटरियों को गंदगी से मुक्त करने के लिए सरकार ने 2016-17 वित्त वर्ष में 17 हज़ार बायो टॉयलेट्स लगाने की घोषणा की थी। संसद में रेलवे बजट पेश करने के दौरान रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने डिब्रूगढ़ राजधानी ट्रेन का भी उल्लेख किया था। यह ट्रेन दुनिया की पहली बायो वैक्यूम टॉयलेट युक्त ट्रेन है, जिसे भारतीय रेलवे ने पिछले साल पेश किया था।

हम सभी जानते हैं कि भारतीय रेल नेटवर्क विश्व का सबसे बड़ा रेलवे नेटवर्क है, इसके अंतर्गत प्रतिदिन 13,313 पैसेंजर ट्रेनें चलायी जाती हैं, जिनमें 54,506 कोच होतें हैं और वह 22.21 करोड़ यात्रियों को एक जगह से दूसरी जगह लाने-ले जाने का काम करते हैं।

अब तक इन ट्रेनों में पारंपरिक तरीके के फ्लश टॉयलेट्स यूज़ होते रहे हैं, इन पारंपरिक शौचालयों से मानव मल सीधे पटरियों पर गिरता है। इससे न केवल रेलवे ट्रैक पर गंदगी फैलती है, बल्कि रेल पटरियों की धातु को भी नुकसान पहुंचता है साथ ही पर्यावरण की दृष्टि से भी यह सही नहीं है।

क्या है बायो टॉयलेट

बायो टॉयलेट की नई तकनीक यह भी सुनिश्चित करती है कि यह शौचालय बदबू और गंदगी रहित हो और इनमें कॉकरोच और मच्छर भी न पनपें। बायो टॉयलेट भारतीय रेलवे और डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किए गए हैं। इनमें शौचालय के नीचे बायो डाइजेस्टर कंटेनर में एनेरोबिक बैक्टीरिया होते हैं, जो मानव मल को पानी और गैसों में तब्दील कर देता है। इन गैसों को वातावरण में छोड़ दिया जाता है जबकि दूषित जल को क्लोरिनेशन के बाद पटरियों पर छोड़ दिया जाता है, हालांकि इन टॉयलेट्स का मेंटेनेंस थोड़ा डेलिकेट होता है।

ऐसे टॉयलेट्स के नियमित भौतिक निरीक्षण, ब्लॉक होने पर टॉयलेट शूट की सफाई और क्लोरीनेटर में क्लोरीन गोलियों को चार्ज करने की ज़रूरत होती है। डीआरडीओ के पूर्व वैज्ञानिक डॉक्टर विलियम सिल्वमूर्ति के अनुसार, “यह बेहद नई तरह की तकनीक है। DRDO ने एक ऐसी तकनीक का विकास किया है, जिसमें साइक्रोफिलिक बैक्टीरिया के संकाय (Storage) की व्यवस्था है। इसे अंटार्कटिका से लाया गया और लैब में रखा गया। यह मल को पानी, कार्बन डाई ऑक्साइड और मीथेन में बदल देता है।”

कैग रिपोर्ट 2016-2017 के अनुसार सरकार द्वारा जून 2016 तक रेल विभाग द्वारा विभिन्न रूटों की प्रमुख ट्रेन में करीब 37,000 बायो-टॉयलेट इंस्टॉल किए जा चुके हैं। मार्च (2017-18) तक इस संख्या को बढ़ा कर 40,000 किए जाने का लक्ष्य है। फिर 2018-19 तक 60,000 बायो टॉयलेट्स इंस्टॉल किए जाने हैं।

सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन के तहत अपनी इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए रेल मंत्रालय को करीब 1,155 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया। इसके अंतर्गत कुछ 55,000 रेल कोचेज़ में करीब 1.40 लाख बायो-टॉयलेट्स को इंस्टॉल करने का लक्ष्य रखा गया है। यही नहीं रेलवे ने ट्रेन टॉयलेट्स के मौजूदा रूप-रंग में भी काफी बदलाव किया है। अब ट्रेन के बाथरूम में स्टेनलेस स्टील के मग, डस्टबिन, हैंड वॉश सैनिटाइज़र आदि सुविधाएं देखने को मिलती हैं। साफ-सफाई की स्थिति भी पहले से बेहतर और नियमित है। अगर किसी तरह की कोई शिकायत हो, तो अब आज सीधे रेल मंत्रालय को इसकी शिकायत कर सकते हैं। चंद मिनटों में ही आपकी समस्या सुलझाने का प्रयास किया जाता है। ज़ाहिर सी बात है कि यह सब कुछ यात्रियों की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए किया जा रहा है।

रेलवे की चुनौतियां

इस बात का आकलन भी हम कैग रिपोर्ट 2016-2017 से बखूबी लगा सकते हैं। आए दिन रेल मंत्रालय को इन टॉयलेट्स के जाम होने, इनकी कार्यप्रणाली ठप्प पड़ने या फिर इनसे दुर्गंध आने की शिकायतें मिलती रहती हैं। लगभग एक-तिहाई सुपरवाइज़री स्टाफ अभी भी बायो टॉयलेट्स को मेंटेन करने के बारे में नहीं जान रहे हैं। यहां तक कि ट्रेन यात्री भी बॉयो टॉयलेट्स के उपयोग और इसके रख-रखाव में बरती जाने वाली सावधानियों से पूरी तरह परिचित नहीं हैं।

कैग रिपोर्ट की मानें तो जो बायो टॉयलेट्स अब तक इंस्टॉल किये गये हैं, पिछले वित्त वर्ष में उनके ही औसतन चार-पांच बार जाम होने की शिकायतें मिल चुकी हैं और बजाय इन शिकायतों के कम होने के, यह दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही हैं। अकेले बेंगलुरु कोचिंग डिपो में ही पिछले वित्तीय वर्ष में औसतन हर पांचवे दिन में जाम की शिकायत आई। इसी वजह से रेलवे वर्ष 2016-17 में बायो टॉयलेट्स के फिटमेंट और रेट्रो फिटमेंट के लिए आवंटित आधी राशि का भी उपयोग नहीं कर पाया। आखिर करता भी कैसे? पहले मौजूदा समस्या से निपटता या आगामी योजनाओं को अमल में लाता।

रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले एक साल में कुल प्राप्त 1,99,689 शिकायतों में से पैसेंजर्स की ओर से टॉयलेट जाम की सबसे ज़्यादा शिकायतें (1,02,792) प्राप्त हुईं। इसके बाद बदबू की शिकायतें (16,375), टॉयलेट्स के सही परिचालन में बाधा संबंधी शिकायतें (11,462), डस्टबिन के अनुपलब्धता संबंधी शिकायतें (21,181), मग नहीं होने की शिकायतें (22,899) तथा अन्य शिकायतें जैसे कि बॉल वॉल्व का फेल होना या वायर रोप का गायब होना संबंधी शिकायतें (24,980) प्राप्त हुईं।

सियालदह, बिलासपुर और पोरबंदर कोचिंग डिपो से डस्टबिन चोरी की अब तक सबसे ज़्यादा शिकायतें आई हैं। बिलासपुर कोचिंग डिपो से एक साल में 817 बायो टॉयलेट्स लगाये गए, जिनमें 3,601 डस्टबिन चोरी की शिकायतें मिलीं। सियालदह कोचिंग डिपो की 26 ट्रेनों में 1,304 ऐसे टॉयलेट्स लगाये गये, जिनमें डस्टबिन चोरी की 3,536 शिकायतें प्राप्त हुईं। वही पोरबंदर डिपो में जहां कुल 14 ट्रेनों में 846 बायो टॉयलेट्स लगाये गए, उनमें से डस्टबिन चोरी की 2,933 शिकायतें मिलीं। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर डिपो से सबसे ज़्यादा मग चोरी (ऐसे 2200 टॉयलेट्स से करीब 16000 मगों की चोरी) की शिकायतें मिलीं। कुल सबसे ज़्यादा शिकायतें बेंगलुरु डिपो से प्राप्त हुई, हालांकि उनमें चोरी की शिकायत एक भी नहीं थी बल्कि सारी शिकायतें मेंटेनेंस को लेकर की गयी थीं।

जानकारी के अभाव में नहीं सफल हो पा रही योजनाएं

इसमें कोई दो राय नहीं है कि बायो टॉयलेट का कॉन्सेप्ट अपने आप में एक आइडियल कॉन्सेप्ट है, जो कि प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत मिशन का समर्थन करता है। लेकिन अगर ज़मीनी स्तर पर देखें, तो योजनाएं उस तरह में सफल नहीं हो पा रही हैं, जितनी सरकार इनके होने की अपेक्षा रखती है। अन्य तकनीकी समस्याओं के साथ-साथ एक बड़ी समस्या लोगों के इसके इस्तेमाल को लेकर जानकारी का अभाव होना भी है।

जिस देश में लोगों को शौचालय के तरीकों के बारे में बताने की ज़रूरत पड़ती हो, जहां आबादी का एक बड़ा हिस्सा अब तक वेस्टर्न टॉयलेट को भी यूज़ करना नहीं जानता हो, वहां बायो टॉयलेट्स के कॉन्सेप्ट को इतनी आसानी से अपनाना थोड़ा मुश्किल है। हालांकि इनके उपयोग में ऐसा कुछ अनोखा नहीं है, जिसे स्पेशल क्लास में सीखने की ज़रूरत पड़े, फिर भी इनके मेंटेनेंस की जानकारी तो होनी ही चाहिए।

अगर हम सरकार से सुविधाएं चाहते हैं तो हमें भी एक अच्छे रेल यात्री के तौर पर अपनी ज़िम्मेदारियां निभानी होंगी।

यात्रियों को ध्यान रखना होगा कि वह इन शौचालयों में प्लास्टिक बोतल, चाय का कप, कपड़े, सैनेटरी नैपकिन, नैपी, प्लास्टिक की थैलियां, गुटखा पाउच समेत अन्य वस्तुएं न डालें। इन चीजों को शौचालय नहीं बल्कि कूड़ेदान में डालने की ज़रूरत होती है। हम भारतवासी शिकायतें करने में तो माहिर हैं, लेकिन उन शिकायतों का समाधान कैसे हो, इस पर शायद ही कभी गंभीरता से विचार करते हैं। ”रेल आपकी संपत्ति है”, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हम इस संपत्ति को नुकसान पहुंचाएं या इसकी चीज़ें चुराएं।

फोटो आभार: फेसबुक पेज Travel Trends

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