न्यायपालिका में आरक्षण के पीछे क्या है भाजपा की राजनीति

भारतीय समाज और राजनीति में आरक्षण एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। हमेशा से ही इस बात पर राजनीति की गई है और होती रहती है ऐसे में केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद की बात कोई नई नहीं है। इसके ज़रिए वह 2019 की राह आसान बनाना चाहते हैं।

देश की आज़ादी से लेकर अब तक कभी भी न्यायपालिका में आरक्षण नहीं मिला है, या यूं कहें न्यायपालिका को आरक्षण के बाहर रखा गया है। रविशंकर प्रसाद न्यायपालिका में आरक्षण की बात को लेकर कहीं ना कहीं वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं, इसलिए हमें वर्तमान परिस्थितियों को समझना होगा।

1) पांच राज्यों के चुनाव नतीजे बीजेपी के लिए ठीक नहीं रहें, 3 हिंदी भाषी राज्यों में सत्ता से हाथ धोना पड़ा।

2) गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र में पाटीदार, जाट और मराठा समुदाय के लोग आरक्षण के मुद्दे पर सरकार के खिलाफ हैं। मराठाओं को आरक्षण मिला है लेकिन न्यायालय में लड़ाई चल रही है। मराठा अपने आरक्षण को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हैं।

3) दक्षिण भारत में बीजेपी के लिए कोई राजनीतिक ज़मीन नज़र नहीं आती है। सबरीमाला विवाद का कितना फायदा मिलेगा अभी कहा नहीं जा सकता। अन्य राज्यों के मुकाबले बीजेपी दक्षिण भारत में संगठन के तौर पर भी कमज़ोर नज़र आती है।

इसपर बीजेपी की रणनीति यही होनी चाहिए कि सवर्ण ओबीसी और दलित मतदाताओं को अपने साथ जोड़ा जाए और 2019 का चुनाव लड़ा जाए। हमें यह समझना होगा कि बीजेपी का समर्थन करने वाला वर्ग RSS से जुड़ा है और एक विशेष विचारधारा के साथ वह बीजेपी का समर्थन करते हैं। उनपर न्यायालय में आरक्षण जैसे मुद्दों का कोई ज़्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा। अच्छा होता कि 4 साल पहले केंद्र सरकार यह सुनिश्चित करती कि राजनेताओं पर लगे मुकदमे फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाए जाते।

ऐसा नहीं है कि रविशंकर प्रसाद ने जो कहा है वह गलत है लेकिन टाइमिंग की वजह से रविशंकर प्रसाद पर सवाल खड़े होते हैं। लोकसभा चुनाव के काफी नज़दीक रविशंकर प्रसाद ने यह बात कही है अच्छा होता यही बात रविशंकर प्रसाद 4 साल पहले कहते तो कुछ कदम इस दिशा में डाले जाते।

वर्तमान परिस्थितियों में इस विषय पर कदम उठाना मुश्किल है। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन के 11 मई 2010 को रिटायर होने के बाद अनुसूचित जाति के किसी भी न्यायाधीश को सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नहीं बनाया गया है। अनुसूचित जनजाति का भी यही हाल है। इस परिस्थिति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि न्याय व्यवस्था में भी कहीं ना कहीं आरक्षण की ज़रूरत है लेकिन 2019 के चुनाव में बीजेपी इस मुद्दे का राजनीतिक इस्तेमाल करती है, तो सत्ता में आने पर यह महज़ चुनावी जुमला ना हो जाए, क्योंकि आजकल चुनाव मुद्दों पर कम और जुमलों पर ज़्यादा लड़े जा रहे हैं।

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