मैं कूड़ेदान बोल रहा हूं, प्लीज़ मुझे काम पर रख लो

Posted by Sandeep Suman in Hindi, Society
January 6, 2018

नमस्ते, पहचाना मैं कूड़ेदान! देखा होगा आपने मुझे अपने गली या मोहल्ले में, अरे भाई डस्टबिन! अब तो जान ही गए होंगे? वो क्या है न कि आज-कल मुझे कूड़ेदान के नाम से लोग कम ही जानते हैं। वैसे नाम में क्या रखा है, हमारा इतिहास तो तब का है जब लोग ठीक से नाम लिखना भी नहीं जानते थे, 4500 साल पुराना इतिहास है हमारा।

हमारे परदादा ‘चेम्बर’ सिंधु घाटी सभ्यता के घरों में रहा करते थे, उस वक्त वो काफी प्रसिद्ध हुआ करते थे। घर के ठोस कचरे का निस्तारण तो करते ही थे, भूलवश अगर कोई कीमती चीज़ नाले में गिर जाए तो लोग हमारे परदादा को ही याद किया करते थे। हमारे इस पूर्वज ने तो दयाराम साहनी और कई अंग्रेज़ खोजकर्ताओं को भी हैरत में डाल दिया था कि मानवीय सभ्यता की शुरुआत में ही कचरे का इतना बेहतरीन प्रबंधन! हड़प्पा हो या मोहनजोदाड़ो, उनकी सुंदरता में हमारे पूर्वजों ‘चेम्बर’ और ‘नाले’ का बड़ा योगदान था। हमारे ये पूर्वज उस वक्त की अन्य सभ्यताओं में पूरे विश्व में कहीं नहीं दिखते। ये तो बस भारतीयों की ही खूबी थी, जिसने स्वच्छता को सभ्यता की शुरुआत में ही आत्मसात कर लिया था।

लेकिन फिर समय बदला, लोग बदले और उसके साथ उनकी सोच भी बदलती चली गई। ये देश जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया हमारी महत्ता क्षीण होती गई, लेकिन हमारे पतन का असर इंसानों पर भी पड़ा। सड़कें गंदी होती गई, इधर-उधर हर जगह कचरे के अंबार लगते गए और उससे फैली बीमारियां, जिन्होंने इंसानी विकास को धीमा कर दिया। ये बीमारियां, महामारियों में भी बदली। कई लोगों ने इनके कारण जान भी गंवाई, लेकिन फिर भी लोगों ने हमे आत्मसात करने और बीमारी को फैलने से रोकने की जगह दवाईयां बनाने में ज़्यादा भरोसा दिखाया। वहीं इन लोगों के पूर्वज बचाव को ज़्यादा प्राथमिकता देते थे। हमारी उपेक्षा से हम तो पीड़ित थे ही, लेकिन हमसे ज़्यादा आम लोग पीड़ित थे जो बीमारियों के कारण बेवजह काल के गाल में समाते जा रहे थे।

एक दिन अचानक देश के माननीय प्रधानमंत्री जी ने स्वच्छता के लिए एक मुहिम का ऐलान किया और लोगों से इससे जुड़ने का अह्वान किया। हम भी खुशी से झूम उठे, देर ही सही लेकिन अब हमारे भी ‘अच्छे दिन’ आने वाले थे। अब हम भी दिखेगे फिर से गलियों, मोहल्लों और सड़कों के किनारे, पब्लिक पार्कों में। फिर वो दिन आया भी, हम न सिर्फ शहरों में बल्कि गांवो तक जा पहुंचे एक सपना लिए कि अब फिर से लोग हमारी महत्ता को जानेंगे, हमें सम्मान देंगे। बच्चे अपने प्रिय प्रधानमंत्री की बातों से प्रेरणा लेकर हमसे प्यार करेंगे, हमारा सही इस्तेमाल करेंगे। हम भी लोगों के साथ मिलकर देश को स्वच्छ बनाने में मदद करेंगे और सही मायने में इसका सारा दारोमदार तो हम पर ही है ना! अगर हम नहीं रहेंगे तो लोग गंदगी कहां फेकेंगे, कचरे का सही निस्तारण कैसे होगा?

लेकिन मेरा ये भ्रम कुछ दिनों में ही टूट गया। पहले-पहल तो लोगों ने उत्साह के साथ मुझमें कचरा डाला और सफाईकर्मी ने सही वक्त पर आकर मुझे साफ भी किया। फिर एक दिन मेरा दिल डर से कांप गया जब अपने ही पड़ोस के मोड़ वाले भाई को यूं सुबह सड़कों पर पाया। उस पर मेरी ही तरह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी की ऐनक बनी थी और स्वच्छता अभियान का स्लोगन लिखा था। वो दर्द से कराहता दर-दर की ठोकरे खा रहा था शायद किसी असामाजिक व्यक्ति ने उसे उसकी जगह से निकल दिया था और वो सड़कों पर लुढ़कता हुआ आ गया था। कोई भी उसे उसकी सही जगह नहीं पंहुचा रहा था, शाम होते-होते बच्चों ने उसे फुटबॉल बना लिया था।

जब अगले सवेरे मेरी नींद खुली तो उसके परखच्चे उड़ चुके थे। रात को किसी ने उस पर अपनी गाड़ी चढ़ा दी थी। मेरे सारे सपने एक ही झटके में उजड़ गए, जिन लोगों की सेवा करने जिनके मोहल्ले को साफ सुथरा रखने के लिए, जिन्हें बीमारियों से बचाने को हम आए थे आज उन्हीं लोगों ने हमें ठोकर मार दी थी, वे हमारी मौत का कारण बन बैठे थे।

चंद महीनों में ही सारे आस-पड़ोस के कूड़ेदानों का स्वर्गवास हो गया था। कल रात एक भूखी गौ माता ने अपनी भूख शांत करने के लिए लोगों के फेंके कचरे को खाने के प्रयास में मुझे मेरे स्थान से गिरा दिया है। शायद मेरा भी वही हाल हो जो मेरे भाइयों का हुआ है, लेकिन इसमें गौ माता का कोई कसूर नहीं, वो भी हमारी ही तरह अभागी हैं। उनके लिए भी लोग हो हल्ला मचाते है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उन्हें भी कोई देखने वाला नहीं है। शायद मैं कल ना रहूं, आपके मोहल्ले या शहर में दिखूं या न दिखूं लेकिन एक बात कहकर जाना चाहता हूं, “उस समाज और उस देश के विकसित या विकासशील होने का कोई अर्थ नहीं होता जो स्वच्छता और अपनी राष्ट्रीय संपत्ति का सम्मान नहीं करते।”

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