‘सर्वाइवर लिखें विक्टिम नहीं’, ऐसे ही 8 नियम जो यौन हिंसा पर लिखते समय याद रखने चाहिए

हममें से जो भी इसे पढ़ रहे हैं, वो एक चीज़ तो मानेंगे कि अब विचार करने का वक्त आ गया है कि यौन हिंसा पर कैसे बात की जानी चाहिए।

एक राइटर के तौर पर यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि यौन हिंसा की घटनाओं पर हम समाज का ध्यान खीचे। लेकिन ऐसा करते हुए हमें अक्सर इसका ध्यान नहीं रहता कि हमारे लिखने का तरीका भी कई बार परेशानियों को घटाने के बजाए और बढ़ा देता है।

टेक्सस असोसिएशन अगेन्स्ट सेक्शुअल असॉल्ट (TAASA) के लिए तैयार किए गए अपने एक प्रेज़ेंटेशन में टोनिया कनिंघम और हाले कोचरन ने लिखा है “भाषा उत्पीड़न का सबसे बड़ा पोषक है।” मतलब यह कि किसी घटना पर किस तरह से लिखा और पढ़ा जा रहा है उससे भी प्रभावित वर्ग का उत्पीड़न होता है। इसी समस्या को सुलझाने के लिए हमने उन चीज़ों की एक लिस्ट बनाई है जिन्हें इस मुद्दे पर लिखते वक्त ध्यान में रखा जाना चाहिए।

1. पीड़ित नहीं, सर्वाइवर।

किसी इंसान के साथ पीड़ित शब्द जोड़कर हम उसकी पूरी पहचान को एक घटना तक सीमित कर देते हैं। ऐसा करके हम उन्हें हिम्मत देने के बजाए असहाय बना रहे होते हैं। और इन सबका नतीजा होता है एक सदमा, मानसिक स्वास्थ्य पर असर, आत्मविश्वास में कमी और कानून व्यवस्था से भरोसा उठना। तो अागे से पीड़ित शब्द को सर्वाइवर से बदल दें।

2. हमेशा एक्टिव वॉय्स का इस्तेमाल करें।

“उस लड़की पर हमला किया गया।”

अमेरिकी विचारक जैकसन काट्ज़ ने इसकी व्याख्या की है कि उपर दिए गए उदाहरण की तरह पैसिव वॉय्स में लिखते हुए हमेशा सिर्फ एक इंसान की पहचान ही ज़ाहिर की जाती है, जिसे महज़ बेचारे और पीड़ित की तरह पेश किया जाता है और कहीं से भी हमलावर या किसी घटना को अंजाम देने वालों का कोई ज़िक्र नहीं होता। इससे बचने के लिए ऐसे वाक्यों का प्रयोग किया जा सकता है जिसमें हमलावर का भी ज़िक्र हो। “जैसे उस लड़की पर उस लड़के ने हमला किया।”

इसी तरह TAASA के प्रेज़ेंटेशन में यह बात कही गई है कि ‘उस लड़के ने जबरन उस लड़की के चेहरे को छुआ’ लिखना ‘उस लड़के ने उस लड़की को किस किया’ लिखने से काफी बेहतर और प्रभाव डालने वाला है। इस तरह से लिखना हमलावर के हिंसक चरित्र को भी दर्शाता है।

पैसिव वॉय्स का इस्तेमाल करने से ऐसा लगता है कि अपराध में सर्वाइवर ने भी साथ दिया है, मतलब ताली एक हाथ से नहीं बजती वाली थ्योरी। लेकिन जैसा कि हम सभी जानते हैं कि यौन हिंसा वाले अपराधों में ऐसा बिल्कुल नहीं होता।

3. ‘ये तो होना ही था’

आपकी रिपोर्ट में कहीं से भी ऐसा नहीं लिखा होना चाहिए कि सर्वाइवर के साथ ऐसा होना तो तय ही था या उसने जानबूझकर मुसीबत मोल ली। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वक्त क्या था, सर्वाइवर ने कैसे कपड़े पहने थे, क्या खाया या पीया गया था या सर्वाइवर की सेक्शुअल हिस्ट्री क्या है। भारत में 90%  ऐसे अपराध को सर्वाइवर के जान पहचान वाले ही अंजाम देते हैं, लेकिन ध्यान रखिए कि उनके रिश्ते की घनिष्ठता से कोई फर्क नहीं पड़ता। जो बात मायने रखती है वो यह है कि वो घटना सर्वाइवर की सहमती से हुई या नहीं।

4. सर्वाइवर की पहचान की सुरक्षा

कभी भी सर्वाइवर के नाम, पता या वर्तमान पते का ज़िक्र ना करें। Do not reveal the survivor’s name, address, or current whereabouts. सुज़ेट जॉर्डन ने खुलकर अपने अनुभव साझा किए थे, लेकिन इसका चुनाव उनके हाथ में है, हमारे या आपके नहीं। आपकी रिपोर्ट में जिन लोगों के बारे में लिखा जा रहा है उनकी सुरक्षा और निजता का पूरा सम्मान होना चाहिए।

5. ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’

दिसंबर 2012 दिल्ली गैंगरेप मामले को बहुत लोगों ने ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ मानते हुए मौत की सज़ा को जायज़ ठहराया। ध्यान रहे, यौन हिंसा की किसी भी घटना में इस तरह की हायरैरकी बनाने से बचें। याद रहे कि सभी तरह की यौन हिंसा की घटनाएं एक समान निंदनीय है और सभी मामलो में तुरंत न्याय होना चाहिए।

6. लोगों के बयान लिखते हुए सावधानी बरतें

घटना का निष्पक्ष नज़रिया बताने के लिए चश्मदीदों, परिवारजनों, पुलिस वालों और अन्य लोगों के बयानों के ज़रिए स्टोरी में बहुत सारे एंगल को जगह देना अच्छी बात है, लेकिन TAASA के प्रेंज़ेंटेशन के हिसाब से ये बहुत संभलकर और  शिष्टाचार से करना चाहिए।

“वो हमेशा लड़के लेकर आती थी।” ”उसने बहुत छोटे और भड़काऊ कपड़े पहने थे।” ” वो अक्सर शराब पीती थी।” “वो अपराधी के साथ रिलेशनशिप में थी।” ऐसे बयान या ऐसी बातें चरित्र हनन और विक्टिम ब्लेमिंग के अलावा और कुछ नहीं है। हमें अक्सर रिपोर्टिंग के दौरान ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं। फरवरी 2017 में एक नागालैंड की महिला के ऊपर रिपोर्ट करते हुए टाइम्स ऑफ इंडिया ने बहुत बड़ी चूक की थी।

7. रिपोर्ट लिखते हुए जेंडर का रखे खयाल

यौन हिंसा किसे कहते हैं? इस सवाल का जवाब ढूंढने में कानून और मीडिया का रोल एक दूसरे के पूरक का ही रहा है।उदाहरण के तौर पर IPC की धारा 375 व्याख्या करती है कि एक पुरुष को किन-किन आधारों पर बलात्कार का दोषी माना जा सकता है। और 6 अलग अलग आधार दिए गए हैं और हर जगह लिखा गया है कि पुरुष कब-कब बलात्कारी कहलाता है। यौन हिंसा पर जेंडर न्यूट्रल कानूनों के अभाव में मीडिया भी सिर्फ और सिर्फ इसी आइडिया के साथ काम करता है कि पुरुष दोषी हैं और महिलाएं पीड़ित। हो सकता है कि यह अधिकतर मामलों में सही हो लेकिन सभी मामलों में सही हो ऐसा नहीं है। स्त्री और बाल कल्याण मंत्रालय की 2007 की एक रिपोर्ट के अनुसार 52.94% (प्रयास और सेव द चिल्ड्रेन संस्था के द्वारा किया गया सर्वे) नाबालिग पुरुषों का यौन हिंसा का निजी अनुभव रहा है।

वक्त आ चुका है कि अब इस सोच को तोड़ा जाए और लिखते हुए ट्रांस, गे पुरुष या खुद को पुरुष की तरह पहचानने वाले लोगों को बराबर का महत्व दिया जाए। शायद यही एक बड़ी वजह है कि ट्रांस लोगों के साथ होने वाली हिंसा या समान लिंग में होने वाली हिंसा की घटनाएं इतनी कम रिपोर्ट की जाती हैं।

8. ‘पुरुषों का भी होता है बलात्कार’

पुरुषों के साथ होने वाली हिंसा पर रिपोर्ट करें। लेकिन ‘भी होता’ है लिखना बंद करिए। अक्सर ऐसे मुहावरे का इस्तेमाल महिलाओं के दमन को गलत बताने के लिए किया जाता है। ये कहना कि “पुरुषों के साथ भी इतना ही बुरा होता है” पूरी तरह से पितृसत्ता और पुरुषों को मिलने वाली सहूलियतों को नज़रअंदाज़ करने जैसा है।

अगली बारी जब आप लिखने बैठें तो इन 8 प्वाइंट्स को याद रखें। और ऐसा करने से आपकी रिपोर्ट संवेदनशील और भेदभाव रहित बनेगी। तो आज से खयाल रखें कि हमारे लेख बस पुराने स्टिरियोटाइप्स को बढ़ावा देने या यौन हिंसा के सर्वाइवर्स को कमज़ोर करने के लिए ना हो।


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