मेंटल हेल्थ पर लिखते हुए इन 6 चीज़ों का ज़रूर रखें खयाल

Posted by Arunima Gururani in Hindi, Writer Resource Centre
January 24, 2018

मानसिक स्वास्थ्य पर लिखना आसान नहीं होता। इतनी सारी भावनाएं जुड़ी होती हैं कि कभी-कभी पता ही नहीं चलता कि कहां से शुरू करें, क्या लिखें या कितना लिखें। लेकिन शायद अंदर से कभी-कभी बड़ी तेज़ इच्छा होती है कि सब कुछ लिख दें, सब बाहर निकाल दें, और शायद इतनी वजह काफी है कि इस बारे में लिख दिया जाए।

मानसिक स्वास्थ्य के बारे में अक्सर लोगों को गलतफहमियां होती हैं और इसलिए ज़रूरी है कि इसके बारे में अधिक से अधिक बात की जाए। लेकिन मेंटल हेल्थ पर बात करना बेहद ही ज़िम्मेदारी का काम है, क्योंकि इस मुद्दे पर लिखना महज़ खुद की बातों को सामने रखने तक ही सीमित नहीं है बल्कि रीडर्स को आपकी स्टोरी के माध्यम से एक नई जानकारी मिल रही होती है और मेंटल हेल्थ के मुद्दे पर उन्हें एक नया नज़रिया मिलता है।

मेंटल हेल्थ पर लिखने का हमारा मकसद सिर्फ लोगों के बीच जानकारी पहुंचाना नहीं होना चाहिए बल्कि यह लेख उन लोगों के लिए मददगार होना चाहिए जो ऐसी किसी परिस्थिति से गुज़र रहे हैं।

अगर ऐसा लिखना आपको मुश्किल लग रहा है तो हम हैं ना आपकी मदद करने के लिए

अगर आप अपनी कहानी बताना चाहें

1.ज़रूरी नहीं कि आप एक प्रोफेशनल या सबसे बेहतर राइटर ही हों

आपकी भावनाएं और अनुभव महत्वपूर्ण है और ज़रूरी है कि वो लोगों तक पहुंचाई जाए। और अपनी कहानी बताने के लिए ज़रूरी नहीं कि आप सबसे बेहतर राइटर हों। एक मुश्किल अनुभव को बताना आसान नहीं है। हो सकता है आपकी निजी कहानी पढ़कर किसी और को भी हिम्मत मिले मुश्किल हालातों से निकलने में या अपने अनुभव साझा करने कि लिए। और यही एक तरीका है जिससे हम मेंटल हेल्थ के बारे में फैली गलत अवधारणाओं को खत्म कर सकते हैं। और यह बेहद ज़रूरी है।

2. तो शुरुआत कैसे करें?

जब आपबीति लिखने की बात आती है तो हर इंसान का अनुभव अपने आप में अलग होता है। इसलिए वो एक सोचें जिसने उस पूरे अनुभव में आपको सबसे ज़्यादा प्रभावित किया और उसे सबसे पहले लिखें।

3. अपने अनुभवों को कितना और किस हद तक साझा करें?

इसका जवाब बेहद आसान है और आपको खुद से पूछना होगा, आप जितना बताने में सहज हों बस उतना ही लिखें। ज़रूरी नहीं है कि हर वो बात लिखी जाए जो आपने अनुभव किया या जो आपको असहज कर दे आखिरकार यह आपकी कहानी है।

लिखने के बाद उसे ज़रूर दुहराएं ताकि यह सुनिश्चित किया जाए:

  1. कि घटनाक्रम सही तरीके से लिखा गया है, और इसे पढ़ते हुए आपसे अंजान एक रीडर भी काफी आसानी से बातें समझ पाए।
  2. कि आपने वही जानकारियां साझा की है जो बताने में आप सहज हैं।
  3. कि आपने बेहद ही साफ तरीके से अपनी मानसिक अस्वस्थता और उसके लक्षण का ज़िक्र किया है।

4. स्टोरी को कैसे खत्म करें?

आपने इस पूरे अनुभव से क्या सीखा, इसका ज़िक्र करते हुए कहानी को खत्म किया जा सकता है। इन हालातों से उबरने में किन चीज़ों ने आपकी मदद की या फिर कोई मैसेज जो आप रीडर को या उन लोगों को देना चाहें जो अभी उन्हीं हालातों से गुज़र रहे हैं कहानी को खत्म करने का अच्छा तरीका हो सकता है।

अगर आप मेंटल हेल्थ पर रिपोर्ट कर रहे हैं

1. संवेदनशील बनें

ऐसा करने में शब्दों का चयन सबसे ज़्यादा ज़रूरी होता है। पहले से इस मुद्दे को लेकर इतनी ज़्यादा भ्रांतियां फैली हैं कि एक गलत शब्द का इस्तेमाल काफी बुरा परिणाम ला सकता है। पागल, अजीब-ओ-गरीब हरकत, सनकी इन शब्दों का इस्तेमाल करने से बचें। इन शब्दों का इस्तेमाल करके हम पहले से मौजूद गलतफहमियों को बस बढ़ावा देंगे और कुछ नहीं।

आम बातचीत में भी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बिमारियों का इस्तेमाल करना अच्छी आदत नहीं है। ध्यान रखिए कि ये सब बीमारी हैं जिससे बहुत से लोग ग्रस्त हैं। और आम बोलचाल में लापरवाही के साथ इन शब्दों का इस्तेमाल करने से इन बीमारियों से जुड़ी गंभीरता का पता नहीं चलता। जैसे- ‘मैं आज बहुत डिप्रेस्ड हूं’, ‘एगदम पागल हो गए हो क्या?’  ये बातें बेहद ही संवेदनहीन हैं, और हमें इनके इस्तेमाल से बचना चाहिए। इसके बदले हमें बेहतर विकल्पों को तलाशना चाहिए जैसे ‘आज मेरा मूड ठीक नहीं है’, ‘ऐसे बिहेव ना करो।’

हां एक चीज़ का खयाल रखें, मानसिक बीमारी से किसी शख्स की पहचान नहीं होनी चाहिए। जैसे अगर आप कहें कि ‘वो बहुत डिप्रेस्ड इंसान है’ इसका मतलब है कि हम उस इंसान का अस्तित्व डिप्रेस्ड रहने में ही बता रहे हैं। इसे कहने का एक बेहतर तरीका हो सकता है जैसे- वह अभी डिप्रेशन के फेज़ से गुज़र रहा है। ऐसा लिखने से यह साफ हो जाता है कि डिप्रेशन उस व्यक्ति के जीवन का एक दौर है, ना कि डिप्रेशन ही उसकी पहचान है।

2. आत्महत्या पर रिपोर्टिंग करते हुए, बारीकियां और आत्महत्या के तरीके बताने से बचें।

ध्यान रखें कि हम जैसे खबर की रिपोर्टिंग करते हैं उसका बहुत असर पड़ता है, खासकर उन लोगों पर जो शायद कमोबेश उसी स्थिति में हों। इस अनुशंसा के मुताबिक 50 से ज़्यादा शोधों में यह पाया गया है कि असंवेदनहीन और बुरे तरीके से कवर की गई आत्महत्या की खबरें उन लोगों को आत्महत्या के लिए उकसाती हैं जो पहले से परेशान हैं।

3. क्वियर होना कोई मानसिक बीमारी नहीं है

किसी इंसान के लैंगिक पहचान को मानसिक बीमारी से जोड़ना, मूर्खता के अलावा कुछ नहीं है। ये सरासर असहिष्णुता और भेदभाव है और ऐसा करना LGBTQ+समुदाय के लोगों पर काफी बुरा प्रभाव डाल सकती है।

4. रिसर्च ज़रूर करें

अक्सर ऐसा होता है कि मानसिक स्वास्थ्य पर लिखते हुए हम दो अलग-अलग बीमारियों को एक समझ लेते हैं। ऐसा करना ना सिर्फ गलत है बल्कि नासमझी भी है क्योंकि हर बीमारी से अलग-अलग परेशानी होती है। जैसे बायपोलर डिसऑर्डर और बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी डिसऑर्डर को एक मान लेना बहुत कॉमन गलती  है। इसलिए रिसर्च करना बहुत ज़रूरी है। हां ये बात सही है कि हममें से हर कोई मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक विशेषज्ञ नहीं है लेकिन थोड़ी सी रिसर्च से ऐसी गलतियों से बचा जा सकता है।

5. अगर आप विशेषज्ञ नहीं हैं तो मुफ्त का ज्ञान ना बांटे

बिना विशेषज्ञ बने लोगों को मुफ्त में सलाह बांटना बंद करें। लड़ते रहो, अच्छी बातें सोचो जैसी बातें कहना बंद करें। आपकी मंशा भले ही अच्छी हो लेकिन यकीन मानिए यह बिल्कुल भी फायदेमंद नहीं है। अन्य किसी बीमारी की तरह ही मानसिक बीमारी के लिए भी एक्सपर्ट की सलाह और उपचार की ज़रूरत होती है। फर्ज़ करिए किसी के पेशाब से खून आ रहा हो तो क्या उसे आपके सलाह की ज़रूरत है या डॉक्टर की?

हमेशा विशेषज्ञों से सलाह लेने के लिए प्रेरित करें। इसके साथ-साथ यह भी बताएं कि इन मुद्दों पर मदद लेना एकदम सही और ज़रूरी है। ज़्यादातर यही होता है कि लोग मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी भ्रांतियों की वजह से ही डॉक्टरी सलाह नहीं लेते हैं।

6. प्रोफेशनल सलाह कहां ली जा सकती है यह भी बताएं

मानसिक स्वास्थ्य पर लिखते हुए हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि हो सकता है कि यह मानसिक बीमारियों से जूझ रहे लोगों द्वारा भी पढ़ा जा रहा होगा। और इसलिए यह ज़रूरी हो जाता है कि हम उन्हें हेल्पलाइन्स की भी जानकारी दें।

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