पत्रकारों को धमकाना ना पत्रकारिता के लिए अच्छा है और ना लोकतंत्र के लिए

पहले भी कई बार लिख चुका हूँ आज पुनः उसे दोहराना चाहता हूं कि मरना केवल श्मशान में जलना या कब्र में दफन होना नहीं होता है, बल्कि मरना वो क्रिया भी है जिस क्षण आप डर से लिखना, बोलना और सोचना छोड़ देते हैं। द ट्रिब्यून नाम के एक अंग्रेज़ी अखबार की रिपोर्टर एक खबर में लिखती हैं कि देश के नागरिकों का आधार डाटा 500 रुपये में बेचा जा रहा है। इस पर UIDAI नाम की सरकारी संस्था ने उस रिपोर्टर के अलावा तीन और लोगों पर एफआईआर दर्ज करवा दी है। कुछ विशेष विचारधारा के बौद्धिक गुलाम उस रिपोर्टर पर एजेंडा पत्रकारिता का आरोप भी लगा रहे हैं।

किसी पर भी आरोप-प्रत्यारोप लगाना लोकतांत्रिक देश में अनैतिक नहीं है, लेकिन विषय को विषयांतर करना निश्चित रूप से एक अनैतिक साज़िश है।

खैर, अब मुख्य विषय पर आता हूं। पत्रकारों पर केस दर्ज़ करने का मामला यह नया नहीं है, आधार से ही जुड़े मामले में इस संस्था ने मार्च 2017 में CNN-NEWS18 के एक पत्रकार पर केस दर्ज किया। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या किसी रिपोर्ट का खुलासा करने पर पत्रकारों पर केस करना न्यायसंगत है? क्या किसी सरकारी संस्था अथवा सत्तारूढ़ लोगों की पारदर्शिता पर सवाल उठाना ईशनिंदा से भी अधिक गंभीर और संवेदनशील विषय है? फिर अगर पत्रकार संस्थानों की स्वायत्तता और पारदर्शिता पर सवाल नहीं उठाएगा तो क्या पत्रकारिता का बुनियादी अस्तित्व भी बचेगा?

जब हुकूमत अपने अनुयाई संस्थानों से पत्रकारिता को नष्ट करने या अपने आगे नतमस्तक होने का ही विकल्प रखे तो देश का लोकतंत्र किसके भरोसे जीवित रहेगा? पत्रकारों के पास कोई विशेष अधिकार नहीं होता है। पत्रकार भी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1) ए के तहत ही सवाल करते है और संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के उपखंड क और ख उनकी भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं।

संविधान निर्माण के समय सेंट्रल हॉल में पत्रकारों को विशेषाधिकार देने की बात कही गयी थी। तब की प्रारूप समिति के अध्यक्ष बाबा साहब भीम राव आंबेडकर ने स्पष्ट कहा था कि पत्रकारों को विशेष अधिकार देना नुकसानदेह होगा, क्योंकि हमारे संविधान में अनुच्छेद 19 (1) ए में दर्ज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर नागरिक को यह लोकतांत्रिक अधिकार देती है। लेकिन जिस तरह से पत्रकारिता के आवाज़ को दबाया जा रहा है और पत्रकारों को एफआईआर के ज़रिये डराया जा रहा है, वह देश के नागरिकों के लिए दुर्भाग्यपूर्ण क्षण की शुरुआत है। इसे निश्चित रूप से फासीवाद का आहट माना जा सकता है।

मेरी उन सामाजिक चिंतकों, लेखकों, साहित्यकारों, कलाकारों और पत्रकारों से गुज़ारिश है कि हुकूमत की इन प्रवृत्तियों का विरोध करें जो सत्ता के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले को कुचलने की कोशिश करती हैं। कुछ बौद्धिक गुलाम आपको यह भी तर्क देंगे कि सरकार अथवा उनके संस्थान आप पर झूठा केस दर्ज कर रहे हैं तो कोर्ट में आप अपना सही पक्ष रखिये, इसमें इतना चिल्लम-चोट क्यों किया जा रहा है? तो ऐसे लोगों को मेरा यही जवाब है कि क्या एक अदने से पत्रकार अथवा लेखक की यह हैसियत है कि वह अपने ऊपर लगाए गए झूठे आरोपों का जवाब देने के लिए किसी वकील अथवा न्यायिक प्रक्रिया के खर्च का आर्थिक बोझ उठा सके?

पत्रकार न्यायालय में ही अपना वक्त और पैसा खर्च करता रहेगा तो अपने घर-परिवार का खर्च कब और कैसे उठाएगा? सरकार के पास तो सरकारी खजाना, वकील और अटॉर्नी जनरल भी हैं, लेकिन एक पत्रकार के पास क्या है?

इसलिए जो वर्ग साहित्यिक लेखन, सामाजिक चिंतन अथवा पत्रकारिता करने आए हैं, वो इस अभिव्यक्ति के कुचलने की प्रवृत्ति के खिलाफ आवाज़ उठाएं और जो केवल ग्लैमर या चकाचौंध से आकर्षित होकर आए हैं, उनसे क्या अपेक्षा करना। वो तो चकाचौंध की तलब में सत्ता के आगे बिछने को तैयार बैठे ही होंगे। लेकिन देश के नागरिकों के लिए सोचने का वक्त आ गया है, वह इस फासीवादी आहट को सुनने की कोशिश करें। क्योंकि फासीवाद कभी ढ़ोल-नगाड़े बजा कर नहीं आता है बल्कि इन्हीं दमनकारी प्रवृत्तियों के ज़रिये मुल्क में प्रवेश करता है और फासीवादी विचारधाराओं का विस्तारीकरण करता है।

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