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ब्रेकअप के बाद उसे ऑनलाइन स्टॉक करना मेरी सबसे बड़ी गलती थी

Posted by AgentsofIshq in Hindi, Society
January 10, 2018

“हम सिर्फ एक बार जीते हैं, एक बार मरते हैं, प्यार भी एक बार करते हैं और फिर छुपकर…पीछे लगे रहते हैं।”

जब भी मेरे जीवन में कुछ महत्वपूर्ण घटता है, तो शाहरुख खान का कोई डायलॉग मेरे दिमाग के किसी कोने में गूंजने लगता है। शाहरुख खान ने मुझे सिखाया कि प्यार करना, उसे खोना और उसके लिए तड़पना ठीक था (मैं शाहरुख खान की कही हर बात मानती हूं)। वह अपनी पारो को परछाईयों में छुपा हुआ दूर से देखता था– ज़िंदा था पर सिर्फ नाम के वास्ते। अपनी मोहब्बत के लिए उसकी ज़हरीली तृष्णा को मैं बहुत खूब समझती थी।

2012 में मुझे एक ऐसा व्यक्ति मिला जिसे देखकर मेरे दिल की धड़कनें तेज़ हो जाती थीं। मुझे उससे प्यार हो गया और मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि इस सोने मुंडे को भी मुझसे प्यार था।

मम्मी ने भी काफी बार हमें चाय पर बुलाया। सब ठीक चल रहा था, फिर एक दिन हमारी प्रेम कहानी में प्रियंका की एंट्री हो गई, वह मेरी कॉलेज की सहपाठी थी। मुझे मालूम था कि वह अक्षय पर फिदा थी, लेकिन अक्षय और मैं उस समय डेट नहीं कर रहे थे, इसलिए मुझे अपनी जलन को छुपाना पड़ा।

जब अक्षय और मैं डेट करने लगे तो उसका प्रियंका से बात करना मुझे ठीक नहीं लगता, लेकिन मैं उस पर भरोसा करती थी और हर दिन उसकी संगत की मदहोशी में बिताती थी। एक दिन, उसने मुझसे कहा कि वह प्रियंका से प्यार करता है, मैं बस भौचक्की सी उसे ताकती रही।मैं क्या कहती? जब आप के जीवन का सच्चा प्यार ही आपसे कह दे कि वह आपसे प्यार नहीं करता, तो आप बोल भी क्या सकते हैं? मुझे पता था कि उसे खुश रखने के लिए मेरा उसके साथ ब्रेकअप करना ज़रूरी था।

“जा सिमरन, जी ले अपनी ज़िंदगी।”

मगर मेरी ज़िंदगी का क्या? उसके ना होने ने मेरे जीवन में एक खालीपन पैदा कर दिया था। ब्रेकअप करना तो एक बात थी, लेकिन उसको जाने देना? वह तो एक अलग ही जंग थी। मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती कि मुझे उसकी कितनी याद आती थी। उसके जाने के बाद मैंने उसकी मौजूदगी उसकी फेसबुक प्रोफाइल में ढूंढी।

हर रोज़ सुबह उठते ही, मैं सबसे पहले उसे स्टॉक (इंटरनेट पर किसी पर निगरानी रखना, उनकी हरकतों को ट्रैक करना) करती, उसकी प्रोफाइल चेक करती। उसकी फेसबुक की तस्वीरों के द्वारा मैं उसकी मौजूदगी के एहसास को ज़िंदा रखने की कोशिश करती।

पर अब वह भूत भी मेरी आंखों के सामने अपने रंग बदल रहा था। अक्षय को पहले कभी सोशल मीडिया के कीड़े ने नहीं काटा था। लेकिन प्रियंका के साथ यह सब बदल गया। हमारे ब्रेकअप के कुछ हफ्तों बाद ही उसने प्रियंका के साथ फेसबुक पर अपनी सेल्फीज़ डाली और उनमें से #प्यार और #खुशी के हैशटैग उभरकर मेरी तरफ आ रहे थे, यह देखकर मैं बिल्कुल टूट गई। उसने मेरे साथ तो कभी तस्वीरें इंटरनेट पर नहीं डाली थी ना? क्या उसने मुझसे कभी #प्यार नहीं किया था? क्या मैंने कभी उसे #खुशी नहीं दी थी? क्या उसने मेरे साथ कभी #खुशी अनुभव नहीं की थी? आखिर मैं इस दर्दनाक नतीजे पर पहुंची– मैं इतनी खास थी ही नहीं।

“उड़ने की बात परिंदे करते हैं, उसके टूटे हुए पर नहीं।”

पर किसी वजह से इस बात ने उसके लिए मेरी तड़प को और हवा दे दी। इस टूटे हुए रिश्ते से आगे बढ़ना है नहीं आसान। मैं एक पोस्ट से दूसरी पोस्ट पर स्क्रोल करती, उस खोए हुए प्यार की झलक की तलाश में। ऐसे, जैसे कि स्क्रोल डाउन करके हमारे साथ बिताए हुए वक्त को फिर से जीकर मैं सचमुच समय की सुई को पीछे कर सकती थी। जैसे कि ऐसा करने से मेरा अकेलापन कम हो जाता। मैंने उसके सोशल फीड में पनाह ले ली थी, मेरे लिए यह सच्चाई से बचने का एक तरीका था। लेकिन मेरा दिल अब भी तन्हा था।

एक दिन उसकी इंस्टाग्राम फीड पर मेरी स्क्रोलिंग मैराथन के दौरान मैंने गलती से उसकी और प्रियंका की तस्वीर को लाइक कर दिया। मैं इतनी घबरा गई कि मैंने अपना फोन ही फेंक दिया और उस चक्कर में वह टूट गया। मुझे इस बात की कम चिंता थी कि मैंने अपना फोन तोड़ दिया था, लेकिन टूटे हुए फोन का मतलब था कि अब मैं उस तस्वीर को अनलाइक नहीं कर सकती थी और वह मेरे लाइक को देख सकता था।

उस हादसे के बाद दो दिनों के लिए मैं उसकी प्रोफाइल से दूर रही। मैंने अपना फ़ोन भी वापस स्विच ऑन नहीं किया। मैं इतनी शर्मिंदा थी कि मैंने उन दो दिनों में किसी से फोन पर बात भी नहीं की, मैं बस बिस्तर में पड़ी रोती रही। इस बारे में सोचने से बचने के लिए, मैं टीवी से चिपकी रही। यह बात क्या कम बुरी थी कि उसने मुझे किसी दूसरी औरत के लिए छोड़ दिया था, अब ऊपर से उसे यह भी मालूम हो गया था कि मैं उसके जीवन पर नज़र रख रही थी और उसका सोशल मीडिया पर पीछा कर रही थी।

काश मैं वहीं रुक गई होती? अपनी भावनाओं से बचने के लिए अब मुझ पर एक नया जुनून सवार हो गया था– प्रियंका। उसकी प्रोफाइल पर मैंने अपना नया डेरा जमा दिया। प-प-प-प्रियंका मेरी क-क-क-किरन बन गई थी। जब उसकी तस्वीरों पर बस चंद लाइक आते तो मुझे बहुत खुशी होती। उसकी अनाकर्षक तस्वीरों को देख मैं बेरहमी से हंसती।

वह जो भी करती मैं उसकी तुलना खुद से करने लगती। उसे समुद्र तट पसंद थे तो मुझे उनसे नफ़रत थी। उसे अच्छे से तैयार होने का शौक था तो मुझे नफरत। मैं सोचने लगी क्या अक्षय ने मुझे इसी वजह से छोड़ा था? क्योंकि उसे कोई ऐसी लड़की पसंद थी, जो उसके लिए तैयार होती, मेकअप लगाना जानती और फैशन को समझती। शायद उसकी आंखों में मुझमें लड़कीपन की कमी थी। प्रियंका को स्टॉक करते हुए मेरे आत्मविश्वास ने बहुत बुरी चोट खाई।

उसको स्टॉक करने के बाद मैंने अपनी ज़िंदगी में पहली बार मेकअप लगाया। नतीजा काफी हद तक ‘कुछ कुछ होता है’ में अंजली के मेकअप करने की अजीब और असफल कोशिश की तरह था। आखिर मैं बार्बी डॉल जैसी टीना के साथ मुकाबला कैसे कर सकती थी?

महीने बीत गए। जैसे ही मैं अपने आप को दर्द की यह दैनिक खुराक देते हुए थकने लगती, इंटरनेट दौड़ता हुआ मेरे पास आता मुझे उसकी मौजूदगी की याद दिलाने के लिए। हमारे आपसी दोस्त हमें पोस्ट्स में टैग करते, कुछ दोस्त मज़ाक-मज़ाक में पुरानी तस्वीरें ढूंढ निकालते। लेकिन सबसे ज़्यादा खुश जोड़ों के द्वारा पोस्ट की हुई तस्वीरें, मुझमें अक्षय की प्रोफाइल फिर से देखने की चिंगारी भड़काती। लगता तो यूं था कि कायनात मुझे उसकी ऑनलाइन मौजूदगी की तरफ बार-बार भागने के लिए बढ़ावा दे रही थी, जबकि वह मेरे अंदर ज़हर भर रही थी।

“किसी चीज़ को अगर पूरे दिल से चाहो तो सारी कायनात तुम्हें उससे मिलाने की कोशिश में लग जाती है।”

शुक्रिया कायनात, लेकिन मुझे इसकी बिल्कुल ज़रूरत नहीं थी। हर बार जब मैं उसे ऑनलाइन स्टॉक करती तो बहुत रोती, दर्द बर्दाश्त के बाहर था। इससे मेरे काम पर भी असर हुआ, क्योंकि मैं काम के दौरान भी उसे बैठ कर गूगल करती और उसके बाद मैं काम कर ही नहीं पाती।

यह सब एक साल तक चला। यह एक ऐसी जगह पहुंच गया, जहां मेरे पास इस बर्ताव को धीरे-धीरे रोकने के अलावा कोई उपाय नहीं बचा था। मैं उसकी खुशनुमा जीवन से अपने दु:खी जीवन की तुलना करते-करते थक चुकी थी। उस शारीरिक हानि से थक चुकी थी जो मुझे मेरे इस बर्ताव से पहुंच रही थी। मेरी आंखों के नीचे काले घेरे थे और मेरा चेहरा मुंहासों से भर गया था। मैं थककर चूर हो गई थी। मुझे पता है कि यह सब सिर्फ मेरी अंतहीन इंटरनेट की स्क्रोलिंग की वजह से नहीं हुआ था, मेरा दिल का टूटना इसकी मुख्य वजह थी। लेकिन स्क्रोलिंग एक नशे की तरह थी, जिसके दुष्प्रभाव मेरे पूरे जीवन पर होने लगे थे। अंत में बेइन्तहा थकान मेरे रुकने की वजह बनी।

जैसे-जैसे मैंने स्टॉकिंग से नाता तोड़ा, वैसे-वैसे मेरा आत्मविश्वास बढ़ता गया। मैं कसरत करने लगी और नए दोस्तों से मिलने लगी। माना कि एक लड़के ने मुझे डेट ना करने का फ़ैसला किया था लेकिन  इसका मतलब यह नहीं था कि मुझमें कोई कमी थी।

मेरी मां और बहन और उनके लगातार स्नेह ने भी मेरी सहायता की। मां की नज़रों से यह बात छुपी नहीं थी कि मैं दु:खी थी, लेकिन हमारा रिश्ता कभी इतना खुला नहीं था। वह जानती थी, जैसे मांओं को हमेशा पता होता है कि मैं एक बुरे और कठिन वक्त से गुज़र रही थी। मेरे ब्रेकअप के पहले कुछ महीनों में, मां ने मेरा पसंदीदा खाना बनाया- कचौड़ी, कांदा-पोहा, फिश करी और रसमलाई। यही एक तरीका था जिससे मैं ठीक तरह से, पेटभर के खाना खाने को राज़ी होती।

उन्होंने मेरा शारीरिक रूप से ध्यान रखा ताकि मैं मानसिक रूप से बेहतर होने पर अपना ध्यान केंद्रित कर पाऊं। दीदी को पूरी कहानी मालूम थी, क्योंकि वह मेरी सबसे अच्छी सहेली है। वह मेरे साथ समय बिताने के लिए काम से घर जल्दी आ जाती। जिन दिनों मैं हौसला खोकर रोने लगती, वह मुझे अपनी बाहों में समेट लेती। वह मुझे फिल्मों के लिए बाहर ले जाती। जब मां के धैर्य का बांध टूटने लगता, तब दीदी सुलह करने के लिए खुद ही हमारे बीच आ जाती।

आखिर में मैं अक्षय के लिए कम बेचैन रहने लगी, उसकी तलाश भी कम करने लगी। मैं समझ गई कि मैंने अक्षय को तो खोया था, लेकिन उससे ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह थी कि मैंने अपने आत्मविश्वास को खो दिया था। मेरी उसके लिए तड़प अपने आप ही कम होने लगी। मेरी सर्च हिस्टरी में आखिर अक्षय का नाम दिखाना बंद हो गया।

जब मैं पीछे मुड़ कर देखती हूं तो मुझे लगता है कि मैं इस परिस्थिति को थोड़े अलग तरीके से संभाल सकती थी। लेकिन यह तो मैं आज एक स्वस्थचित्त होने की वजह से कह पा रही हूं। उस समय तो पागलपन सवार था। कभी-कभी जब मैं इस बारे में अकेले बैठकर सोचती, तो मुझे अजीब लगता कि मैंने यह सब इतनी बेशर्मी से किया था। असल में यह सब अब विचित्र लगता है, मैं अब बिल्कुल बदल चुकी हूं लेकिन मुझे लगता है कि जब मेरा मानसिक स्वास्थ खतरे में था तब आत्मसम्मान का कुछ महत्व नहीं था।

मैं वापस यह गूगल वाला पागलपन नहीं करूंगी क्योंकि अब मैं समझदार हो गई हूं। लेकिन मैंने जो भी किया, मैं उसके लिए शर्मिंदगी महसूस करने से इंकार करती हूं।

मेरी ज़हरीली गूगलिंग ने मुझे यह समझने में मदद की कि हां मैंने एक ऐसे व्यक्ति को खो दिया था जिससे मैं प्यार करती थी, लेकिन बदले में मैंने खुद को भी तो पा लिया था। “कभी-कभी जीतने के लिए कुछ हारना भी पड़ता है…और हार कर जीतने वाले को बाज़ीगर कहते हैं।”

अनुराधा डि.सूज़ा (अनुराधा एक शेफ और बेकर हैं। उनको बड़े बन पसंद हैं और वो झूठ नहीं बोल सकतीं।)

चित्रण: देबस्मिता दास 

अनुवाद तन्वी मिश्रा 

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