मुसलमान समाज की अमानवीय प्रथा हलाला का सच दिखाती फिल्म, ‘मियां कल आना’

अगर आप लघु फिल्म ‘मियां कल आना’ को देखने से पहले इस बात से अंजान हैं कि फिल्म की विषय वस्तु क्या है, तो निश्चय ही फिल्म में शुरुआत के दो-तीन सीन आपको हैरान कर देंगे। ताश के पत्तों के खेल में एक मज़ाकिया बात के बाद संवाद “अबे इम्तियाज़! तेरी रानी को कौन मारेगा?” से ही कहानी आपको रोक लेती है।

दरअसल इम्तियाज़ (जयहिंद कुमार) अपनी ही गलती के चलते गुस्से में आकर अपनी बीवी- शागुफ्ता (मनीषा मरज़ारा) को तलाक दे चुका है। अब वह “निकाह हलाला” को लेकर परेशान हैं। मां भी ताने के बहाने गंभीर बात बोलती है, “कुर्ता-पजामा पहन के सोचता है कि ‘मुसलमान’ बन गया, अरे ‘इमान’ का क्या?” निकाह हलाला के लिए इम्तियाज़ ‘एक रात के शौहर’ बनने वाले मौलवी जी के पास पहुंचता है तो बात 25 हज़ार में तय हो जाती है।

शागुफ्ता एक रात के लिए मौलवी के पास गयी, इम्तियाज़ द्वारा अगली सुबह अपनी बीवी को वापस ले जाने की बात को शागुफ्ता के अभी “महीना” चलने की बात का हवाला देकर मौलवी पूरे एक महीने का शौहर बना रहा। पंचायत के फैसले पर मौलवी तलाक देता है, इन सब दृश्यों के बीच शागुफ्ता का एक भी संवाद नहीं है। यह इस बात को बयां करता है कि इन कुरीतियों के बीच महिलाएं कितनी मजबूर हैं।
तलाक, निकाह हलाला (एक रात के लिए किसी और के साथ रहना) और फिर अपने शौहर से फिर से शादी कर पाने के बीच एक औरत ‘क्या’ है? एक औरत का अस्तित्व क्या है? इसका जवाब यह फिल्म बखूबी देती है।

यह कहानी से अधिक मुस्लिम समाज में विद्यमान इस कुरीति पर एक ज़ोरदार तमाचा है। आज यह कितनी प्रासंगिक है आप भी सोचें।
नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी (प्रोड्यूसर) के छोटे भाई शमास नवाब सिद्दीकी फिल्म के लेखक और निर्देशक हैं। जिस मुखरता से फिल्म को आपके सामने रखा गया है, उसकी जितनी भी तारीफ की जाए कम है। यह फिल्म ज़रूर देखें-

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