पटना में मेरा हर हमउम्र मुक्काबाज़ होना चाहता था

Posted by Prashant Jha in Culture-Vulture, Hindi, Media
January 15, 2018

रिव्यू पढ़कर फिल्म देखना और फिल्म देखकर रिव्यू लिखना, मुझसे दोनों ही काम एक अरसे से नहीं हो पाया है। लेकिन अगर मुक्काबाज़ का रिव्यू नहीं लिखता तो सैटरडे नाइट 9.30 बजे के शो में पूरे हॉल में मौजूद उन 40-45 लोगों का इमोशन आपतक नहीं पहुंचा पाता।

मेरी एक अपनी डेफिनिशन है कि अगर इंटरवल ब्रेक में ऑडियंस पेशाब करने से लेकर हाथ धोने तक फिल्म की बात करें तो मैं उस दुविधा से निकल जाता हूं कि क्या यह फिल्म सिर्फ मुझे अच्छी लग रही है या मैं सिनेमा समझने में अभी एमेच्योर हूं। और इस बार बाथरूम के हैंडड्रायर तक पहुंचते-पहुंचते बात अनुराग कश्यप की भी हो रही थी, लोग कह रहे थे ”अनुरगवा अपने भी बहुत स्ट्रगल किया है।”

ये बातें तो सिनेमाहॉल का मूड समझने के लिए थी। मुझे यह फिल्म और इसके गाने दो पैरलल सफर पर ले गईं। एक श्रवण के और एक इस देश के कॉमन जन के। फिल्म की शुरुआत में ही जब श्रवण कोच सर को मुक्का मारता है और सुखविंदर गले की नस फुलाकर गाते हैं कि हम पहिला मुक्का नहीं मारे, ठीक उसी प्वाइंट पर जिस बात पर आप बरसों पहले बर्फ जमा चुके हैं वो आपके ज़ुबां तक आती है और आप कह जाते हैं साला सही किया, हम भी थोड़ा करेजा जुटा लिए होते तब…

खैर ट्रेलर में आप जो भी देख चुके हैं वो फिल्म में तुरंत आपके सामने होता है और एकबार को आपको लगता है कि जा फिल्म तो पूरा प्रिडिक्ट कर लिए हैं। लेकिन फिर फिल्म के मज़बूत डॉयलॉग्स आपको ज़्यादा सोचने का वक्त नहीं देते। डायलॉग बोलते हुए जब किसी का एक्सेंट फेक नहींं लगता तो आप कैरेक्टर्स के साथ सहज हो जाते हैं और आपको कहानी वाकई अपने आस-पास की कोई घटना लगने लगती है।

शुरुआत में भगवान दास मिश्रा जब ज़िले के बडिंग बॉक्सर्स से मालिश करवा रहे होते हैं तो शायद अर्बन परिवेश वाले मेरे हमउम्र उसे काल्पनिक मान लें लेकिन हमें हमारे स्कूल के कोच सर याद आ गए जो हर रोज़ बच्चों की डाईट के लिए तय की गई फंड से डायटिंग किया करते थे। संस्कृत पढ़ाने वाले द्विवेदी सर भी याद आएं जो अक्सर बच्चों से स्कूल में अपनी उंगलियां खिचवाते थे।

यह फिल्म आपको एकसाथ कई ऐसी हकीकतों के सामने खड़ा कर देती है जिसे आपने कभी नकारा नहीं है लेकिन यह कहने लगे हैं कि अब कहां ये सब होता है पहिले होता था। अपने आप को प्रिविलेज्ड मानिए कि आप ऐसा सोच पाने की सहूलियत रखते हैं। हम पटना में दबंगों को देखे हैं और मधुबनी में जात का अलग पांत देखे हैं। श्रवण के कोच रवि किशन, भगवान दास को जब कहते हैं कि वो उसी चौथी जाति से हैं जिनका नाम उनसे कभी नहीं लिया जाता तब मधुबनी का जातिवाद और पटना का दबंगई सब याद आ गया। याद आ गया कि गांव में डोम से सट जाने पर कितना बार गंगाजल छिड़का गया है हमपर।

सौ इगो मर जाए लेकिन जात वाला इगो बायो डिग्रेडेबल नहीं होता है। जब ठाकुर श्रवण से रेलवे वाले उसके यादव बॉस निजी काम करवाते हैं और वीडियो रिकॉर्ड करते हैं तो ये बात आपको समझ आती है।

आप सोच रहे होंगे कि मैंने इतना समा बांध दिया लेकिन अभी ट्रेलर में च्यूंइगम फुलाने वाली लड़की कहां है? तो वो इसलिए कि उसके इश्क का बयां लिखना आसान है जिसने ताजमहल बनवाया हो लेकिन जो मुहल्ला में ताका-झांकी करके खुद महल हो जाए उस प्यार का हिसाब तो चित्रगुप्त की डायरी में भी नहीं समाएगा। दोनों एकदम डेयरिंग वाला आशिक जो रात में पाइप चढ़कर घर में आने से नहीं डरता है और छाती ठोक कर बोलता है कि हम तुमसे प्यार करते हैं और तुम्हारे बाप से भी नहीं डरते हैं।

मुक्काबाज़ मेरे लिए एक कम्पलीट लव स्टोरी है, और मुझे याद आता है कि पटना वुमेंस कॉलेज का चक्कर काटता हर लड़का हमारे टाइम में मुहब्बत में ऐसे ही मुक्काबाज़ हो जाना चाहता था। हां हर लड़की सुनैना ज़रूर होती थी जो या तो बुरके में या दुपट्टे से अपना चेहरा ढककर लड़कों से मिलने आती ही थी। अपने दौर में तो प्यार की एक ही भाषा है वो है रणवीर सिंह और दीपीका पादुकोण की भाषा, हालांकि ये बातें तबतक बकवास, काल्पनिक और बेहुदा लगती है जबतक कोई एकबार ऐसे ना देख ले कि मन करे कि बस आप वहीं एक मूरत हो जाएं और हर रोज़ इतने ही फासले से वो आपको निहारता रहे।

फिल्म में मुहब्बत और जीवन को इतना सहज दिखाया गया है कि कुछ भी नकली नहीं लगता। फिल्म शादी के बाद हैप्पी एंडिंग मोड में नहीं जाती बल्कि वहां से शुरू होती है। मुक्केबाज़ बनने की लड़ाई धीरे-धीरे मुहब्बत को पाने और शादी बचाने की लड़ाई हो जाती है। ये वो प्वाइंट है जब एक दर्शक और एक समाज के रूप में आपको थोड़ा बुरा लगता है कि प्यार-मुहब्बत के चक्कर में क्या एक और बेहतरीन खिलाड़ी देश को मिलते-मिलते रह गया?

लेकिन फिर आप रियलाइज़ करते हैं कि इस सिस्टम और देश में श्रवण को तो मुक्काबाज़ बनना ही नहीं था क्योंकि उसके हाथ ज़्यादा चलते थे और जीभ कम चाटती थी और ऐसे तो बस मुक्काबाज़ बनते हैं मुक्केबाज़ नहीं।

इस देश का सिस्टम ना खिलाड़ी बना पाया है और ना लक्षण दिख रहे हैं अच्छे। बस अगर कोई एक्सेप्शनल टैलेंट है तो उसपर अपने नाम का जैकेट या टीशर्ट लाद देने तक की ही कुव्वत है यहां के स्पोर्ट्स अधिकारियों की। फिल्म में ये सब अच्छे से दिखाया गया है, हालांकि मुझे लगा कि बॉक्सिंग मैच थोड़े और हो सकते थे, या थोड़े बेहतर तरीके से दिखाए जा सकते थे। बेहतर दिखाने से मेरा मतलब ये कतई नहीं था कि महबूब के आते ही गिरा हुआ योद्धा उठ जाए और फिजिक्स को बोले ”बहुत हुआ सम्मान तुम्हारी ऐसी-तैसी।”

फिल्म में सभी एक्टर्स हैं तो एक्टिंग पर कमेंट करना हर रिव्यू में बस एक रिवायत भर ही है, बाकी तारीफ पहुंचे ज़ोया तक, एकदम दमदार। सभी अपने-अपने कैरेक्टर्स में इतने सहज थें कि आप भी कहानी का हिस्सा हो जाते हैं और साथ-साथ चलते हैं। जैसे-जैसे कहानी बढ़ती है श्रवण के साथ आपका भी गुस्सा बढ़ता है और उसके हर पंच पर अपने सीट के आर्म रेस्ट पर आपके हाथों में भी हरकत हो रही होती है। और आप भी सुनैना से लिपटना चाहते हैं।

फिल्म एकतरफ है और इसके गाने एकतरफ। गाने के बोल आपको अंदर तक खुरच देते हैं, जिसका दर्द दो दिन तो रहेगा कम से कम। गानों का ज़ख्म ऐसा है जिसे जीवन का मरहम और कुरेदता है। गाना लिखने वालों को आप गले लगाकर कहना चाहते हैं कि इतना सच कैसे लिख दिया।

मेरे लिए फिल्म का सबसे डार्क पंच था जब श्रवण अपने पिता जी को समझाता है कि उसे दूसरा कुछ नहीं आता, मुक्केबाज़ी ही उसका पैशन है, और उसके पिताजी कहते हैं कि बाप के पैसा पर ही फैशन करेगा। मैं फिर से दुहराउंगा कि मेरे दिल्ली-मुंबई-बेंगलुरू में पले बढ़े दोस्तों को ये एक हास्यासपद इंग्लिश की कमी लग सकती है लेकिन जो उसी वक्त किसी पटना-भोपाल-जयपुर-रांची जैसे शहर में बड़े हो रहे होंगे वो इस बात को जानते हैं कि हमारे यहां अपना पैशन समाज के लिए फैशन हो जाता है। सब तय रहता है कि क्या करना है आगे चलकर और उससे भी ज़रूरी कि क्या नहीं करना है इस रूल से थोड़ा भी इधर-उधर हुए तो आप फैशन कर रहे हैं।

जब श्रवण अपने पिता को अपने पैशन के बारे में खिसिया के बता रहा होता है तो 15-16 साल में पिताओं के हाथ कत्ल हुए देश के कितने क्रिकेटर, पेंटर, सिंगर, के दिल से हाय निकलती है कि काश…

हां फिल्म के अंत को लेकर मेरी समझ थोड़ी कमज़ोर है, और शायद यही खूबसूरती भी है ऐसे अंत की कि सभी 40-45 लोग अपने तरह से कहानी को खत्म करना चाहते थे। बाकी कोई कन्वेंशनल रिव्यू लिखने वाला नहीं हूं कि सबको सिलसिलेवार तरीके से लिख पाउं जो जैसे बांध सकता था वो लिख दिया, फिल्म देख आइये बहुत अच्छे से बांधा हुआ है। अच्छा हां- भारत माता की जय

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