मुंबई बंद में मैं लोकल में फंसी थी और ये मेरे लिए सबसे खौफनाक दिन था

Posted by Shalu Awasthi in Caste, Hindi, My Story, Politics, Society, Staff Picks
January 4, 2018

इंसान मुसीबत में जब अकेला होता है, तो उसे सिर्फ खुद की चिंता होती है, लेकिन अगर किसी हादसे और परेशानी में आपके परिवार का कोई सदस्य हो तो आपकी चिंता और बढ़ जाती है। खास तौर से तब जब आप हेल्पलेस होते हैं और कुछ कर नहीं सकते।

कुछ ऐसा ही हुआ मेरे साथ। लखनऊ से मुंबई आए एक महीना भी नहीं हुआ था कि यहां की बारिश के मंज़र से सामना हुआ, फिल्मों और किस्सों के बाद मुंबई की बारिश से पहली व्यक्तिगत मुलाकात थी। खैर वक्त बीता और बारिश भी, फिर एलफिंस्टन हादसा, इसे भी बहुत ही करीब से देखा, लोगों को ज़िंदगी की जंग लड़ते देखा, फिर कमला मिल्स हादसा, ये वही इलाका है, जहां से होते हुए हर रोज़ ऑफिस से घर जाती हूं। ये भी बीता, इतनी चिंता नहीं थी, लेकिन आज का दिन यादगार रहेगा, शायद एक बुरे सपने की तरह।

मुंबई बंद… वैसे तो मैं ऑफिस के पीछे वरली में ही रहती हूं, लेकिन इन दिनों लखनऊ से परिवार आया है, तो कल्याण से अप डाउन कर रही हूं। दिन बुधवार, समय 11:30 बजे दोपहर, सड़क पर सन्नाटा, ट्रेने खाली, खुशी थी कि आज सीट मिल गई, साथ में डैडी भी थे। लगा फालतू में ही तो अफवाहें फैली, सब कुछ तो ठीक है, लेकिन ठाणे आते ही अचानक ट्रेन रुकती है और ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ें आती हैं, जय भीम जय भीम!हज़ारों की संख्या में लोग ट्रेन के आगे खड़े होते हैं, मन में डर बैठ गया कि अब क्या! खैर 10 मिनट ही हुए होंगे कि पुलिस ने लोगों को हटाया और ट्रेन चल दी।

समय 12:30 हुआ था, फिर घाटकोपर और विक्रोली के बीच अचानक से ट्रेन रुक गई और कुछ समझ आता उससे पहले भारी संख्या में लोग डंडे और हाथ में झंडे लेकर ट्रेन में चढ़ने की कोशिश करने लगे, ट्रेन में बैठे लोग हड़बड़ाने लगे और फटाफट खिड़कियां और दरवाज़े बंद करने लगे, मंज़र देखकर तो मैं दंग रह गई, लगा अब क्या, स्थिति का अंदाज़ा लोगों की धड़कनों से लगाया जा सकता था।

1 बजा, 2 बजा, ट्रेन की उस बोगी में 56 लोग कैद से हो गए थे, दो घंटे बाद जब खिड़की से देखा तो एक ही पटरी पर 5-5 ट्रेनें लगी थी, मतलब साफ था, आने वाले कुछ देर तक तो ट्रेन के चलने का सवाल ही नहीं था। फिर सभी ट्रेनों से लोग उतरने लगे और देखते ही देखते पटरियां प्लैटफॉर्म में तब्दील हो गई, फिर लाख सोचने के बाद ट्रेन से हमने भी उतरने का फैसला लिया और फिर दूर-दूर तक सिर्फ पटरियां और यात्री, गला सूख रहा था लेकिन वहां दूर-दूर तक कुछ नहीं था।

2 किलोमीटर पैदल चलने के बाद वहां के लोकल लोग ड्रम में लोगों को पानी पिलाने के लिए खड़े होने लगे, प्यास बुझी लेकिन। डर दहशत बरकरार थी।

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