पद्मावती जैसे विवाद खड़े हो जाना अब बहुत आम हो गया है

Posted by Syedstauheed in Culture-Vulture, Hindi, Society
January 30, 2018

संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावत’ पर चिंतित हूं। एक फिल्म ने देश को विवाद की प्रयोगशाला सा बना दिया है, ऐसे में यह फिल्म क्यों देखी जानी चाहिए? फिल्म से अधिक महत्वपूर्ण कई और काम हैं।

यह कीमती वक्त क्यों न किसी अच्छी किताब में लगाया जाए, बेसहारा लोगों के बारे में सोचा जाए। क्यों न आत्महत्या को मजबूर हो रहे किसानों को यह कीमती वक्त दिया जाए। गरीबी व भ्रष्टाचार जैसी विकराल समस्याओं का समाधान तलाशा जाए, अस्पतालों की बदहाली पर ध्यान दिया जाए। बहुत से काम उम्मीदें बांधे खड़े हुए हैं, राह देख रहें। यही उचित समय है कि कल्याणकारी कामों की ओर स्वयं को मोड़ दें, लेकिन क्या उससे यह विवाद खत्म हो जाएंगे? आज विवाद खड़े हो जाना बहुत आम सा हो गया है न!

सोचता हूं कि भंसाली ने फिल्म बनाई ही क्यों, ऐसा विषय क्यों चुना। लेकिन यह पहली बार नहीं कि रानी पद्मावती पर कोई फिल्म बनी हो। साउथ व बॉलीवुड में रानी पद्मावति पर पहले भी फिल्में बन चुकी हैं। इसकी पहल ली सबसे पहले तीस दशक में फिल्मकार देबकी बोस ने। इसके बाद अगले तीस बरसों तक कोई और कोशिश नहीं हुई। साठ के दशक के शुरुआती सालों में अगली फिल्म दक्षिण की ओर से आई। वैजयंतीमाला अभिनीत ‘चित्तूर रानी पद्मिनी’ बनी।

इसके कुछ सालों बाद बॉलीवुड में जसंवत झवेरी ने अनिता गुहा को लेकर ‘रानी पद्मिनी’ बनाई, तत्कालीन राजस्थान सरकार ने इस फिल्म को बनाने में हर संभव सहयोग दिया था। अस्सी के दशक में जाने-माने फिल्मकार श्याम बेनेगल ने बहुचर्चित टीवी सीरियल ‘भारत एक खोज’ में रानी पद्मावति पर एपिसोड बनाया। सबसे ताज़ा पहल सोनी टेलीविजन के धारावाहिक ‘चित्तौड़ की रानी पद्मिनी’ में हुई थी, इसे नितिन देसाई ने बनाया था लेकिन पद्मावत की तरह का हंगामा पहले कभी नहीं हुआ था।

राजनीतिक समीकरणों ने दरअसल ‘पद्मावत’ को यह दिन दिखाया है। फिल्म में राजपूतों की गौरवगाथा है, फिर यह हंगामा किसलिए हो रहा है?

यह समझने के लिए फिल्म को स्वयं देखना होगा। सती व जौहर के सदियों पुराने इतिहास को 21वीं सदी में देखना क्या अनुभव लेकर आएगा, यह देखना होगा। लेकिन इस प्रथा को भव्यता के साथ इस तरह पेश नहीं किया जाना चाहिए था। संत खुसरो का चित्रण भी फिल्म को कमज़ोर करता है, न्यायसंगत नहीं ठहराता।

बहरहाल फिल्म से अधिक महत्वपूर्ण मेरे लिए ध्रुवीकरण की राजनीति का बढ़ता दायरा है, सामाजिक सुरक्षा का विषय है। फिल्म एक रचनात्मक विषय है और इतिहास का भी विषय है लेकिन इतिहास में जीना अच्छा नहीं, विशेषकर यदि उस इतिहास से देश बंटने लगे।

फिल्मों को कई बार बस ‘मनोरंजन’ का साधन मानकर नकार दिया जाता है। उनसे सामाजिक ज़िम्मेदारी की उम्मीद करना बेमानी करार दिया जाता है, ऐसे में फिर यकायक कोई फिल्म तमाम चीज़ों से ऊपर क्यों हो जाती है? क्यों उसको लेकर विवाद और हंगामा खड़ा होता है? लेकिन इतिहास हमसे इजाज़त लेकर नहीं याद किया जाएगा या दोहराया जाएगा, वो तो एक विषय मात्र है जिसे हमें समझना होगा, उसकी हकीकत जांचनी-परखनी होगी। उसे इतिहास से अधिक महत्व नहीं देना होगा, यह ज़रूरी बात हम सभी को माननी होगी।

संवेदनशील विषयों पर बनी फिल्मों पर विवाद होना आम है। फिल्मों को ढाल बनाकर दबदबा बनाया जाता है, फिल्म पर आपत्ति जताने वाले संगठनों को फिल्म से पहले लोग शायद ही जानते हैं।

हमें विवाद के पैटर्न पर विचार करना चाहिए कि क्या यह मार्केटिंग का एक तरीका है? यदि ऐसा नहीं है तो रचनात्मक कलाओं के लिए अच्छा है। बहरहाल मौजूदा विवाद का इकोनॉमिक फायदा भंसाली को मिलता नज़र आ रहा है, इतनी रोक के बावजूद पद्मावत अच्छी कमाई कर रही है।

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