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नेत्रहीनता और नेत्रदान पर बनी खूबसूरत फिल्म है शक्ति सामंत की ‘अनुराग’

Posted by Syedstauheed in Art, Hindi
January 19, 2018

हिन्दी सिनेमा में समर्पण व त्याग भाव की कहानियां कम नहीं बनी हैं, लेकिन शक्ति सामंत की फिल्म ‘अनुराग’ एक अलग किस्म की कहानी थी। फिल्म नेत्रहीनता का सामना कर रहे लोगों के जीवन में ‘नेत्रदान’ का महत्व व्यक्त करने में काफी कारगर थी। अंधकार से रोशनी का सफर नए जीवन का सफर होता है। किसी की आंख जब बिल्कुल भी काम के लायक नहीं रहें, उस हालत में किसी दानवीर से मिले दो नयन के अतिरिक्त कोई और इलाज नहीं रहता। नेत्रपटल का अंधेरा दूसरे से मिली आंखों से दूर हो पाता है। आंखें परमेश्वर का बेशकीमती तोहफा होती हैं। यदि यह आंखें किसी और का भी जीवन रोशन कर सकें तो वो एक महान दान बन जाता है, जीवन का अनुराग बन जाता है।

एक नेत्रहीन युवती के अंधकार से प्रकाश की ओर आने की कहानी इस फिल्म में नज़र आती है। समाज में सभी तरह से योग्य या ‘सर्वगुण संपन्न’ युवतियों को अपनाने का चलन रहा है। फिल्म में इसी क्रम में मुख्य किरदार शिवानी (मौसमी चैटर्जी) की ज़िंदगी को दिखाया गया।

नेत्रहीनता का सामना कर रही युवतियों की कहानी का एक अलग ही पहलु फिल्म ‘अनुराग’ में नज़र आया। शिवानी जैसी युवतियां समाज से एक अनुराग की आस रखती हैं, लेकिन क्या समाज इन आशाओं पर खरा उतरता है?

शिल्पकारी व गायन कलाओं को शख्सियत बना लेनी वाली शिवानी आंखों से मजबूर है। अनाथ होने कारण एक आश्रम रहकर अपने दिन गुज़ार रही है। उसका ज़्यादातर समय बच्चों को पढ़ाने में गुज़रता है। शिवानी के सेवाभाव के कारण बहुत बच्चों से उसका घर-परिवार का नाता बन जाता है। उसके काम की वजह से आश्रम के लोग उसे काफी पसंद करते हैं। एक कमी ने जीवन के प्रति उसके अनुराग को कम होने नहीं दिया। उसकी शख्सियत में जीवन का एक मुश्किल किंतु मर्मस्पर्शी पहलू कहानी को दिशा देता है।

नेत्रहीन युवती के किरदार में मौसमी चैटर्जी काफी विश्वसनीय हैं। उनके किरदार में एक आकर्षण का तत्व नैसर्गिक देन की तरह कहानी में रूचि बनाता है। एक कहानी जिसमें प्रेम, अनुराग और त्याग का एक उदाहरण रखा गया। जीवन से अनुराग रखना क्या होता है, यह इस फिल्म में देखें। शिवानी की शख्सियत, राजेश (विनोद मेहरा) को उसकी दुनिया से जोड़ती है। शहर में रहने वाले इस युवक में नैसर्गिक तत्वों को लेकर शायद अनुराग है। शिवानी की नेत्रहीनता उसे उसकी ओर आने से रोक नहीं सकी। कह सकते हैं कि उसे मन से मुहब्बत है।

शिवानी के प्रति उसका समर्पण दो सामानांतर शख्सियतों को पास ले आया। यह दोनों बाहर से अलग दुनिया के भले दिखाई दे रहे हों लेकिन उनमें मन की समानता है। शिवानी के बेहतर कल को लेकर राजेश में एक ज़िम्मेदारी का भाव जी रहा है। वह उसकी ज़िंदगी में रोशनी लाने को मानो ज़िंदगी का मकसद मान चुका है। वहीं शिवानी भी राजेश को लेकर एक अनुराग भाव बना बैठी है, लेकिन वो इस रिश्ते को लेकर थोड़ा असुरक्षित भी है। वो इस एहसास में जी रही है कि राजेश के धनवान पिता उन दोनों की मुहब्बत को स्वीकार नहीं करेंगे।

कहीं ना कहीं शिवानी का डर वाजिब था, क्योंकि अमीरचंद (मदन पुरी) संतान की रूचि को महत्व नहीं देते। वो नहीं चाहते कि राजेश किसी नेत्रहीन युवती को अपना हमसफर बनाए। शिवानी में अपनी ज़िंदगी देखने वाला राजेश पिता की तरह नहीं सोचता, वो मां को शिवानी के लिए मना भी लेता है। लेकिन पिता अब भी राज़ी नहीं। मन से जुड़े दो लोगों को एक साथ लाने की एक पहल अमीरचंद के मित्र मिस्टर राय (अशोक कुमार) की भलमनसाहत में देखी जा सकती है। वो शिवानी के इलाज का खर्च उठाने को राज़ी हैं। लेकिन किसी से मिला नेत्रदान ही अब उसकी आंखों में रोशनी ला सकता है।

आश्रम में रहने वाला एक बालक शिवानी दीदी के इलाज का एक मर्मस्पर्शी सूत्र बनता है। चंदन (मास्टर सत्यजित) कैंसर की जानलेवा बीमारी से जूझ रहा है। शिवानी और चंदन की ज़िंदगियां एक दूसरे के मर्म में करीब हो जाती हैं। चंदन की दुनिया में शिवानी की तरह फिक्र करने वाले कम लोग हैं। वहीं शिवानी को चंदन,राजेश और मिस्टर राय के रूप में भला समाज मिला हुआ है। लेकिन वो चंदन की तरह देख नहीं सकती।

राजेश-शिवानी को साथ लाने के लिए एक त्याग-समर्पण की ज़रूरत थी। इलाज ना हो पाने कारण चंदन अल्पायु में ही दुनिया से चला जाता है लेकिन जाते-जाते शिवानी को अपनी आंखें दे जाता है। मर कर भी किसी अपने में जिंदा रहना इसी को कहते हैं।

फिल्म का यह भावुक मोड़ था, दो ज़िंदगियां बिछड़कर भी एक दूसरे के साथ थी। जीवित ना होकर भी चंदन शिवानी की आंखों में ज़िंदा था। लेकिन एक रोशनी ने दूसरी को उससे ले लिया था। अब शिवानी चिर-परिचित सभी को देख सकती थी, गुज़रे दिनों की ओर मुड़कर वह प्यारे चंदन की खोज में आश्रम आई, लेकिन अब वो यहां नहीं रहता था। शिवानी को जल्द ही मालूम हो गया कि उसे रोशनी देने वाला चंदन ही था। किसी के त्याग से किसी को ज़िंदगी मिली थी। जीवन का अनुराग शायद इसी को कहते हैं।

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