इतने क्रूर क्यों होते जा रहे हैं आजकल के बच्चे

अभी प्रद्युमन की हत्या के मामले से लोग उबरे भी नहीं थे कि यूपी के एक स्कूल में एक छात्रा द्वारा अपने एक जूनियर छात्र पर हमले की खबर पढ़ने को मिल गई। जिस तरह प्रद्युमन की हत्या की शुरुआती जांच में यह पता चला कि उसकी हत्या उसके ही स्कूल के एक सीनियर छात्र द्वारा केवल इसीलिए कर दी गई थी, क्योंकि वह तैयारी सही से न होने की वजह से उस वक्त स्कूल की परीक्षा देने की स्थिति में नहीं था (हालांकि बाद में वह हमले की बात से मुकर गया) और चाहता था कि किसी तरह स्कूल कुछ दिनों के लिए बंद हो जाये। ठीक इसी तरह यूपी के ब्राइटलैंड स्कूल मामले में भी आरंभिक जांच में यह बात सामने आ रही है कि छठी क्लास में पढ़नेवाली एक लड़की ने भी इसी वजह से क्लास-1 में पढने वाले एक बच्चे की हत्या करने की साजिश की। वो तो शुक्र है कि वह बच्चा बच गया और फिलहाल उसका इलाज चल रहा है। उसने अपने साथ हुई वारदात के बारे में बताया है, हालांकि यहां भी उक्त छात्रा इससे इंकार कर रही है।

क्या हमारे बच्चे पैदाइशी इतने क्रूर थे?

ऐसे नृशंस अपराधों को अंजाम देने वाले इन बच्चों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। कुछ सालों पहले निर्भया मामले में शामिल छह लोगों में से 16 वर्षीय किशोर द्वारा सबसे ज़्यादा क्रूरता बरतने की बात सामने आई थी। उसके बाद से लगातार ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जिनमें किशोर-किशोरियों द्वारा नृशंसता की हदें पार की जा रही हैं। कभी कोई अपनी सोती हुई मां-बहन को चाकू से गोद डालता है, तो कभी कोई पिता पर जानलेवा हमला करता है। निश्चित रूप से यह बेहद गंभीर चिंता का विषय है।

आखिर इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है? इस बारे में क्या कभी गंभीरता से सोचा है आपने? हमारे बच्चे पैदाइशी तो इतने क्रूर या शैतानी दिमाग वाले नहीं थे न! ज़रा सोचिए क्या इसके लिए अकेले हमारे बच्चे ही ज़िम्मेदार हैं? क्या हमारा कोई दोष नहीं है उन्हें ऐसी दुनिया, ऐसा माहौल देने में? क्या हमने कभी यह जानने की कोशिश की है कि हमारे बच्चे किस तरह के मानसिक द्वंद से जूझ रहे हैं? क्या आपने कभी उनके मामूली से दिखने वाले व्यवहारों में होने वाले बदलावों को नोटिस किया है? क्या आपने कभी यह जानने की कोशिश की है कि आपके बच्चे कैसी संगति में रहते हैं? कैसे प्रोग्राम्स और वीडियो देखते हैं? कौन-सी चीज़ उन्हें परेशान कर रही है? ऐसे ना जाने कितने सवाल हैं, जिनके बारे में अगर आप गौर करें और उनके जबाव पाने की दिशा में प्रयास करें, तो आपके बच्चे अपराध के ऐसे खौफनाक रास्तों पर आगे न बढ़ें।

कमज़ोर हो रहे हैं हमारे सामाजिक मापदंड

जब संयुक्त परिवार या मुहल्ले का ज़्यादा प्रचलन हुआ करता था तब, कभी मां-पापा या टीचर ने डांट दिया, तो दादा-दादी होते थे उनके मासूम मन पर प्यार का मलहम लगाने के लिए, पर आज… आज अधिकांश बच्चों के पास इनमें से कोई नहीं। आज बच्चों के पास उनका कोई साथी अगर है, तो वह है टीवी, मोबाइल फोन या फिर वीडियो गेम्स। ऐसे में बच्चे क्या करें? किससे कहें अपनी बात? वे समझ नहीं पाते, ऐसे में जो उन्हें सही लगता है, वे कर डालते हैं। नतीजा दिल्ली, यूपी या गुरुग्राम जैसी घटनाएं।

स्कूल भी है काफी हद तक ज़िम्मेदार

वर्तमान समय में ज़्यादातर स्कूल शिक्षा का केंद्र न होकर बिज़नेस सेंटर बन गये हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य मोटी-से-मोटी कमाई करना है। ऐसे किसी भी मामले में स्कूलों पर कभी शायद ही कोई आंच आती हो। वे पैसे और पहुंच के बल पर अक्सर खुद को इन पचड़ों से निकाल लेते हैं। जहां तक नियमों-कानूनों को फॉलो करने की बात है, तो वह भी मात्र औपचारिकता बन कर ही रह गयी है। ज़्यादातर शिक्षक या स्कूल, छात्रों को औपचारिक शिक्षा देकर ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं। पैरेंट-टीचर मीटिंग में भी उनके एकेडमिक परफॉरर्मेंस पर ही ज़ोर दिया जाता है। उनके मॉरल अचीवमेंट्स पर शायद ही कभी चर्चा होती है, जो कि उनके व्यक्तित्व विकास का एक अहम पहलू है।

मीडिया को भी लेनी होगी इसकी ज़िम्मेदारी

आज घटित होने वाली ऐसी कोई भी घटना या दुर्घटना ऊंगलियों की एक क्लिक पर हमारी आंखों के सामने है और सबसे खतरनाक बात यह है कि मीडिया के ज़रिये ये सारी चीज़ें हमारे सामने बगैर फिल्ट्रेशन के आ रही हैं। टीआरपी और पॉपुलैरिटी के चक्कर में चाहे अखबार हो या इलेक्ट्रॉनिक चैनल या फिर सोशल मीडिया- सब जितना हो सके सच्चाई दिखाने के नाम पर इस तरह की घटनाओं की नंगी तस्वीर दिखा रहे हैं। ऐसे में यह कैसे संभव है कि उन्हें हम देखें और हमारे बच्चे नहीं? इस स्थिति में मीडिया को भी इस बात को समझना होगा कि वह इस तरह की घटनाओं की संवेदनशील रिपोर्टिंग करे। कोई घटना घटित होने के बाद हाय-हाय करना, दोषारोपण करना या उस संदर्भ में चिंता व्यक्त करना बहुत आसान है, पर उसकी ज़िम्मेदारी लेते हुए आत्मसुधार की दिशा में कार्य करना ज़्यादा ज़रूरी है।

मानसिक स्वास्थ विशेषज्ञों का अभाव

विश्व स्वास्थ संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में प्रत्येक 10 लाख की आबादी पर महज तीन मनोचिकित्सक ही हैं। भारतीय स्वास्थ एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा वर्ष 2015 में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, हमारे देश में कुल 3800 मनोचिकित्सक हैं, जबकि कॉमनवेल्थ देशों के नॉर्म्स के मुताबिक प्रत्येक दस लाख की आबादी पर 56 मनोचिकित्सक होने चाहिए। इस लिहाज़ से देखें, तो भारत में 66,000 से अधिक मनोचिकित्सकों का अभाव है।

इसके अलावा, हमारे देश में मानसिक स्वास्थ को लेकर लोगों में जागरूकता का भी घोर अभाव है। आज भी अगर किसी को डिप्रेशन या एंक्ज़ाइटी की शिकायत हो और वह अगर किसी मनोचिकित्सक को संपर्क करें, तो उसके आसपास के लोग उसे ‘मेंटली डिफेक्टिव’ समझ लेते हैं। उनके लिए किसी साइकॉलोजिस्ट या साइकियाक्ट्रिस्ट के पास जाने का मतलब ही है कि ‘इंसान पागल हो गया’। ऐसी स्थिति में मानसिक द्वंद से जूझते बच्चे हो या बड़े उनके लिए सिवाय घुटने और ऐसे विनाशकारी कदम उठाने के शायद कोई और चारा भी नहीं बच पाता।
कहने को ये सारी बहुत छोटी-छोटी बातें हैं, पर इन पर ध्यान देकर ही हम अपनी आने वाली पीढ़ी को गंभीर अपराधों के दलदल में फंसने से काफी हद तक रोक सकते हैं।

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