रोहित वेमुला जैसों की सबसे बड़ी लड़ाई तो नफरती पहचान से है

Posted by Nasiruddin haider Khan in Caste, Hindi, Society
January 17, 2018

 

‘किसी शख्स की कीमत महज़ उसकी पैदाइशी पहचान में समेट कर रख दी गई है। उसकी कीमत महज़ उसके ज़रिए लिये जाने वाले फायदे तक सिमट गई है। वह सिर्फ एक वोट बन कर रह गया है, उसे सिर्फ आंकड़ा बना दिया गया है। कभी किसी शख्स की हैसियत उसकी दिमागी काबिलियत से नहीं आंकी गई… कुछ लोगों के लिए उनकी ज़िंदगी ही लानत और बद्दुआ है। मेरी पैदाइश, मेरा जानलेवा हादसा है।’

रोहित वेमुला की मौत के बाद एक और साल गुज़र गया। रोहित को मौत की तरफ ढकेलने के ज़िम्मेदार लोगों पर इन दो सालों में आंच तक नहीं आई। बल्कि कुछ उलटा ही हुआ। मौत के बाद भी उसे अपनी ‘जन्मजात पहचान’ से जूझना पड़ा। रोहित जिस ‘पहचान’ के साथ और जिसकी वजह से समाज के साथ जद्दोजहद करता रहा, मौत के बाद वह ‘पहचान’ भी उससे छीनने की पुरज़ोर कोशि‍श की गई।

सबसे ऊपर की सात लाइने रोहित की लिखी आखिरी चंद लाइनों का हिस्सा हैं। वह जिस पहचान की बात कर रहा है, वह खास किस्म की है। वह स्टूडेंट, रिसर्च स्कॉलर, विद्वान, लेखक, वैज्ञानिक, खि‍लाड़ी जैसी पहचान तो कतई नहीं है।

वह अकेली ‘पहचान’ ही, हमारे समाज की अनेक पहचानों पर भारी है । इसका कमाल ज़बरदस्त है, किसी शख्स के जनमते ही यह पहचान- गाँव, टोला, मोहल्ला, शहर, स्कूल, कॉलेज, नातेदारी, प्राकृतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थ‍िक संसाधन- सबके साथ रिश्ता तय कर देती है। यह जाति की सामाजिक पहचान है, हाँ, यह पहचान कुछ समूह को बहुत ताकत देती और उनके फायदे की है। वे इसके साथ बखूबी जीते हैं, इसका लुत्फ उठाते हैं, इसलिए वे इस पहचान से परेशान नहीं होते हैं।

मगर यह पहचान, बड़े सामाजिक समूह के लिए ज़िंदगी के हर मामले में अछूतपन, गैरबराबरी, भेदभाव, नफरत, हिंसा, शोषण और नुकसान की वजह है।

रोहित इसी दूसरे वाले बड़े सामाजिक समूह से वास्ता रखता था। इन्हें हम आज दलित के नाम से पहचानते हैं। हममें से बहुतों को लगता है कि आज़ादी के सत्तर साल बाद अछूतपन, गैरबराबरी या भेदभाव की बातें अब कोरी गप हैं, है न? क्योंकि हम में से ज़्यादातर की ज़िंदगी फायदे वाले समूह से वाबस्ता रही है। उस फायदे वाले समूह में हम कितना भी वंचित क्यों न हों, अछूतपन और भेदभाव हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का वैसा हिस्सा नहीं है, जैसा यह दलितों की ज़िंदगी से चस्पा है। यह वह चीज़ है, जो इंसान को, इंसान मानने से इनकार करती है।

करीब सवा सौ साल पहले रत्नागिरी के स्कूल में बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर की ज़िंदगी से अछूतपन चिपका था। जब वह लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़कर आए तब भी वैसा ही अछूतपन, उनको हर जगह घेरे था। उसे अपने साथ चिपकाकर रखना, अम्बेडकर की ख्वाहिश नहीं थी। उसे तो हटाने से भी हटने नहीं दिया जा रहा था, इसीलिए अम्बेडकर का मानना था कि ‘जातियों के विनाश के बिना, अछूतों की मुक्ति नहीं हो सकती है।’

कायदे से तो आज़ादी मिलने और संविधान बनने के साथ इसका लोप हो जाना चाहिए था। मगर बाबा साहब अम्बेडकर को पता था कि यह इतना आसान नहीं है। याद करें, 25 नवम्‍बर 1949 को संविधान प्रारूप समिति के अध्‍यक्ष के रूप में उन्होंने क्या कहा था। अम्बेडकर ने कहा था-

26 जनवरी 1950 को हम विरोधाभास से भरी जिंदगी के उस दौर में प्रवेश करने जा रहे हैं, जहां राजनीतिक दृष्टि से हम सब बराबर होंगे, लेकिन सामाजिक और आर्थिक मामलों में गैर बराबरी झेलते रहेंगे। सामाजिक और आर्थिक मामलों में हम कितने दिनों तक लोगों को बराबरी के अधिकार से वंचित रखेंगे। ज़्यादा दिनों तक गैर बराबरी को बरकरार रखने का मतलब लोकतंत्र को खतरे में डालना होगा।

मगर न जाति का विनाश हुआ और ना अछूतपन का… और हमारे वक्त में रोहित जैसों लाखों की ज़िंदगी से भी जुड़ा है। अभी हाल ही में एक सर्वे ने यह बताने की कोशि‍श की है कि हमारे मौजूदा भारतीय समाज में जातीय भेदभाव और पूर्वाग्रह कितना मज़बूत है। इस अछूतपन को जहां टूट जाना चाहिए था, वहां वह तोड़ने की ख्वाहिश करने वालों को तोड़ने में जुट जाती है। बल्कि शि‍द्दत के साथ वह उन्हें बार-बार याद‍ दिलाती है कि वे इसके ‘लायक’ नहीं हैं। वे अलग हैं और समाज की सीढ़ी पर सबसे नीचे हैं। स्कूल-कॉलेज-विश्वविद्यालय वह जगह हैं, जहां सामाजिक गैरबराबरियों को खत्म हो जाना चाहिए। मगर ऐसा कहां हुआ?

आंगनबाड़ी केन्द्र हों या प्राथमिक स्कूल, आज भी छुटपन से ही दलित बच्चे-बच्च‍ियों को इस अछूतपन से गुज़रना पड़ता है।

ज़्यादातर दलित बच्चे-बच्चि‍यों को ‘पैदाइशी पहचान’ से जुड़े कड़वे अनुभव से गुज़रना पड़ता है। अगर हमें यकीन ना आ रहा हो और हम खुद देखना/ समझना चाहते हैं तो किसी भी मिली-जुली बस्ती या दलित टोला में चलने वाले स्कूलों में इस पहचान के असर को आसानी से देख और समझ सकते हैं।

इस पहचान के ज़रिए उन्हें खौफज़दा किया जाता है ताकि उन्हें तालीम से ही डर लगने लगे। मगर कुछ लोग सब झेलते हुए बाहर निकल ही आते हैं और अब ऐसे लोगों की तादाद अच्छी खासी होती जा रही है।

वे बाबासाहेब भीमराव अम्‍बेडकर की इस सलाह पर अमल करने लगे हैं- ”आप सबके लिए मेरी आखिरी सलाह है- पढ़ें, संघर्ष करें, संगठित हों। खुद पर यकीन करें। इंसाफ हमारे साथ है। मुझे पक्‍का भरोसा है, जीत हमारी होगी।”

ऐसे ही माहौल में बढ़े और पढ़े लड़के-लड़कियां बड़ी तादाद में अब देश के बड़े नामी कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों में पहुंच गए हैं। यह नई पीढ़ी चुपचाप सब बर्दाश्त करने को राज़ी नहीं है। वह सब कुछ ‘भाग्य भरोसे’ मानने को तैयार नहीं है। अब तक जो उन्हें बताया/ समझाया गया, वे उसे आसानी से मानने को भी राज़ी नहीं हैं। वे ‘स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की भावना पर आधारित’ अम्बेडकर का ‘आदर्श समाज’ बनाने का ख्वाब देखते हैं।

रोहित वेमुला और उनके दोस्तों का भी ख्वाब ऐसा ही है। वे अम्बेडकर के सपनों का समाज बनाने के लिए महज़ अपनी पैदाइशी पहचान तक सिमटे रहने को तैयार नहीं हैं। मगर यह इतना आसान होता तो क्या बात थी। जैसा कि अम्बेडकर बहुत साफ-साफ कहते हैं-

‘अस्‍पृश्‍यता की समस्‍या वर्ग संघर्ष का मामला है, यह सवर्ण हिन्‍दुओं और अछूतों के बीच का संघर्ष है, यह किसी एक शख्‍य के साथ नाइंसाफी का मामला नहीं है। यह एक वर्ग का दूसरे वर्ग के साथ की जाने वाली इंसाफी है। जैसे ही कोई बराबरी का दावा करता है, यह संघर्ष उसी वक्‍त शुरू हो जाता है।’

रोहित जैसों को आज इस संघर्ष से गुज़रना पड़ रहा है। इसलिए अम्बेडकर की सलाह पर चलते हुए वे संघर्ष कर रहे हैं और पढ़ रहे हैं। संगठित हो रहे हैं। संगठित होकर संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे ही संघर्ष का अक्स हमें आईआईटी-मद्रास, फिल्म एंड टेलिविज़न संस्थान (एफटीआईआई)- पुणे, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), दिल्ली विश्वविद्यालय (डियू), बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर यूनिवर्सिटी जैसे कैम्पस में या गुजरात, मुंबई, सहारनपुर, मुज़फ्फरनगर, सीतापुर, अररिया की सड़कों पर दिखाई देता है।

वैसे रोहित या उन जैसे अपनी ‘पैदाइशी पहचान’ से इतर क्या चाह रहे/रही हैं…

वे बतौर भारतीय नागरिक अपनी बराबरी की पहचान की मांग करते हैं। वे अपने इंसान होने का, इंसानी हक मांग रही/रहे हैं। इंसान जैसे सुलूक के लिए मज़बूती से खड़ी हो रही/रहे हैं। इंसानी वक्त का दावा कर रही/रहे हैं। उनकी ख्वाहिश है कि दुनिया, उन्हें उनकी मेहनत, उनकी कला, दिमागी ताकत, सोचने-समझने की स‍लाहियत और वैज्ञानिक कल्पना की उड़ान से पहचानें न कि उनकी ‘पैदाइशी पहचान’ से।

अब इस चाह को कुछ लोग राष्ट्रद्रोह, जातिवादी ज़हर, साज़िश कहने से गुरेज़ नहीं कर रहे हैं। वे ऐसी चाह रखने वाले सभी पर हमलावर हैं।

क्या ऐसी चाह रखने वाले रोहित वेमुला हों, डोंथा प्रशांत हों, चंद्रशेखर हों या फिर राधि‍का वेमुला या ग्रेस बानो … राष्ट्रद्रोही हो गईं/गए? तब तो इन्हें संगठित हो संघर्ष की सलाह देने वाले अम्बेडकर के बारे में भी तय करना होगा न? क्यों?

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