मोदी सरकार व्हिसलब्लोअर्स को जेल भेजने वाला कानून क्यों लाना चाहती है

Posted by preeti parivartan in Hindi, Politics, Society
January 9, 2018

ब्रिटिश पुलिस अधिकारी अपने कार्य के दौरान अगर किसी अपराध को होते हुए देखते थे तो सीटी बजाने लगते थे। व्हिसलब्लोअर शब्द की उत्पत्ति वहीं से हुई है। सीटी बजाने से आस-पास मौजूद अन्य अधिकारी और आम जनता खतरे से सतर्क हो जाते हैं। लेकिन व्यवस्था की पोल खोलने वाली “सिटी बजाना” आसान नहीं। विश्व के अधिकांश देशों में व्हिसलब्लोअर्स की स्थिति चिंताजनक है, कई मुल्कों की स्थिति तो ‘शूट द मैसेंजर’ वाली है।

अपने देश की बात करें तो व्हिसलब्लोअर बिल की ऐसी दुर्गति है कि इस स्थिति में व्हिसलब्लोअर की जान बच जाए वही बहुत है। साल 2010 में जब यूपीए-2 भ्रष्टाचार में गर्दन डूबा हुआ था तब ‘लोकहित प्रकटन’ करने वाले व्यक्तियों यानि कि व्हिसलब्लोअर्स को, संरक्षण प्रदान करने वाले बिल-2010 के प्रारूप को लोकसभा में पेश किया गया। (Public Interest Disclosure and Protection to persons making the Disclosure Bill.)

यह विधेयक पहले से मौजूद Public interest and Protection of informer की जगह पर लाया गया। इसमें एक बदलाव किया गया कि पहले के प्रस्ताव के नाम में उल्लेखित ‘Informer’ शब्द के स्थान पर ‘Persons making the Disclosure’ रखा गया।

अब इतने के बाद फ्लैश बैक में चलिए

भारत में व्हिसलब्लोअर्स की सुरक्षा का प्रश्न राष्ट्रीय स्तर पर तब आया जब राष्ट्रीय राजमार्ग के इंजीनियर सत्येंद्र दुबे, स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना के अंतर्गत बिहार में तैनात थे। सत्येंद्र दुबे ने परियोजना से जुड़े भ्रष्टाचार के बारे में तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी के कार्यालय में चिट्ठी लिखकर जानकारी दी और अपना नाम उजागर न करने का अनुरोध किया था, यह बात साल 2003 की है। चिट्ठी भेजने के कुछ समय बाद उनकी हत्या हो गई, जांच हमेशा की तरह यहां भी सीबीआई को दी गई। साल 2010 में किसी को सज़ा ज़रूर हुई लेकिन सीबीआई यह साबित नहीं कर पाई कि उनकी हत्या किसी षड्यंत्र के तहत हुई थी या किसी भ्रष्टाचारी का इस हत्याकांड के पीछे हाथ था।

इसके बाद देशभर में व्हिसलब्लोअर्स की सुरक्षा को लेकर खूब बहस हुई। साल 2004 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई। न्यायाधीशों ने यह माना कि व्हिसलब्लोअर्स की कानूनी सुरक्षा की मांग जायज़ है। इसी बीच साल 2005 में लखीमरपुरखीरी में पेट्रोलियम अधिकारी शणमुघम मंजुनाथ की हत्या कर दी गई। कारण ये था कि उन्होंने पेट्रोलियम पदार्थों में हो रही मिलावटखोरी के खिलाफ विरोध करना शुरू किया था।

चौतरफा दबाव के बाद वाजपेयी सरकार ने PIDPI मतलब (Public interest disclosure and Protection of informers) प्रस्ताव को अधिसूचित कर दिया और व्सिलब्लोअर्स की शिकायत की ज़िम्मेदारी केन्द्रीय सतर्कता आयोग (Central Vigilance Commission या CVC) को सौंप दी गई। अब ऊपर जो आपने पढ़ा था कि Informers की जगह पर Persons making the Disclosure किया गया, उसके पीछे की कहानी यही थी।

अब वापस से साल 2010 पर आ जाइए

2011 में यह विधेयक (Public Interest Disclosure and Protection to persons making the Disclosure Bill) लोकसभा से पारित हो गया। लोकसभा से पास होने के बाद फिर यह बिल लटकता रहा। आखिरकार, चला-चली की बेला में 2014 में यूपीए-2 ने राज्यसभा में इस विधेयक को पेश किया, विपक्ष ने कुछ संशोधन पेश किए, पहला, प्रकटीकरण (disclosure) की परिभाषा को संशोधित कर उसमें सत्ता का जानबूझकर दुरुपयोग या अधिकारों का जानबूझकर दुरुपयोग जिसकी वजह से सरकार या लोक सेवकों या किसी तीसरे पक्ष का प्रत्यक्ष नुकसान होता है, को शामिल किया गया है। दूसरा, जिस अधिकारी के पास शिकायत करनी है उसकी परिभाषा में भी विस्तार किया गया।

विधेयक के मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं:

  • भ्रष्टाचार की शिकायत करने वाले कर्मियों की पहचान गुप्त रहेगी।
  • ज़रूरत पड़ने पर ऐसे लोगों की सुरक्षा प्रदान की जाएगी।
  • भ्रष्टाचार की झूठी शिकायत करने वाले के खिलाफ होगी कार्रवाई और सज़ा का भी प्रावधान।
  • न्यायपालिका, एसपीजी (स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप) को छोड़कर सेना एवं खुफिया एजेंसियां और पुलिस भी दायरे में।

सरकार ने इन्हें मान लिया और विपक्ष से अनुरोध किया कि इसे वापस लोकसभा में न भेजें। (क्योंकि नियम के मुताबिक अगर राज्यसभा में संशोधन होता है तो फिर वो विधेयक लोकसभा में भेजना होगा) संसद ने इस बिल को फरवरी 2014 में पारित कर दिया। 9 मई 2014 को राष्ट्रपति द्वारा विधेयक पर हस्ताक्षर किए गए और यह कानून बन गया।

लेकिन यह कानून लागू नहीं हुआ! अब छाती ‘बज्र’ करके बैठिए, साल 2015 में मोदी सरकार इस बिल में संशोधन लेकर आई।

संशोधन (संक्षिप्त में)

आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम (Official secret Act) के प्रावधानों के उल्लंघन के तहत जानकारी उजागर करने वाले अधिकारी को जेल जाना पड़ सकता है। मतलब यदि कोई सरकारी अधिकारी अपने विभागीय भ्रष्टाचार को उजागर करता है तो वो जेल जा सकता है। राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों को व्हिसलब्लोवर्स प्रोटेक्टशन एक्ट के दायरे से बाहर रखना अर्थात सरकार कानून में संशोधन कर देश की संप्रभुता और अखंडता से संबंधित जानकारियों को इसके दायरे से बाहर करना चाहती है।

अब सवाल यह है कि भ्रष्टाचार के मामले उजागर होने से राष्ट्र की अखंडता और सुरक्षा को कैैसे खतरा होगा? रही बात राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे की तो डिफेंस सेक्टर से भ्रष्ट क्षेत्र और कौन सा है? रही बात आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम 1923 की तो यह ब्रिटिश शासन काल का है, जिसका उद्देश्य ही जानकारी को लोगों की पहुंच से दूर रखना था।

खैर, बिल को एकमुश्त बहुमत मिला था तो साल 2015 में लोकसभा से यह संशोधित बिल पास हो गया। (यहीं राज्यसभा की ज़रूरत महसूस होती है, हर किसी का प्रतिनिधित्व हो, नहीं तो अंधेर है।) पिछले साल जब मानसून सत्र में राज्यसभा में यह बिल आने वाला था तो कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने राज्यसभा सासंदो से निवेदन किया था कि व्हिसलब्लोअर्स को संरक्षणहीन करने वाले इस बिल के साथ न जाएं और इस तरह राज्यसभा में यह बिल आज भी अटका हुआ है। इसलिए जब किसी पत्रकार पर FIR हो या किसी कार्यकर्ता को जेल हो तो दु:ख न करिए जान तो बची है न!

जानकारी के लिए बता दूं कि पश्चिम के देशों में कई निजी संगठनों ने व्हिसलब्लोअर्स के समर्थन के लिए कानूनी बचाव निधि या सहायता समूहों का गठन किया है, अमेरिका में ‘नेशनल व्हिसलब्लोअर सेंटर’ और यूके में ‘पब्लिक कंसर्न एट वर्क’ ऐसे ही समूह है।

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