गांधी से सहमत या असहमत होने से पहले ज़रूरी है गांधी को जानना

Posted by Prashant Pratyush in Hindi, History, Society
January 30, 2018

बचपन में महात्मा गांधी से मेरी पहली मुलाकात रिचर्ड एटेनबरो की फिल्म ‘गांधी’ के ज़रिए हुई थी। रेलगाड़ी में सवार मोहनदास को बलपूर्वक बाहर फेंक दिए जाने वाले सीन के बाद फिल्म ‘गांधी’ के कैनवास को समझने के लिए मेरी बुद्धि और विवेक का सामर्थ्य उस वक्त काफी कम था। गोया इतना ज़रूर याद रहा कि हर नेशनल हॉली-डे के दिन रिचर्ड एटेनबरो की फिल्म ‘गांधी’ दूरदर्शन पर ज़रूर दिखाई जाएगी।

महात्मा गांधी से दूसरी मुलाकात स्कूली किताब में गांधी जी के बचपन में चोरी करने के किस्से से हुई। धीरे-धीरे गांधी जी को जानते-समझते हुए इस बात का एहसास हो गया कि महात्मा गांधी वो हस्ती हैं जिनसे आप सहमत-असहमत हो सकते हैं, पर जीवन में उनके होने से इनकार नहीं कर सकते हैं।

भारतीय जनमानस में शायद ही कोई हो जो गांधी से होकर न गुज़रा हो, भले ही हर व्यक्ति के अपने अलग-अलग गांधी हो।

मेरे ज़ेहन में महात्मा गांधी, आज़ादी की लड़ाई के कई नायकों में से एक थे जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए लंबा संघर्ष किया, लेकिन खुदमुख्तार मुल्क में केवल 168 दिन ही सांस ले सके।

बालपन के शुरूआती दिनों में गांधी जी स्कूली किताबों के चैप्टर और डाक टिकट में ही दिखते थे, सामान्य जीवन में वो साबरमती के संत के रूप में छोटी-मोटी सामान्य जानकारी से साथ पैबंद रहे। 90 के दशक में नोटों पर उनकी तस्वीर के चलन ने गांधी जी को बाल स्मृतियों से निकालकर सामान्य जीवन में जेबों और बटुओं के साथ चस्पा कर दिया। धीरे-धीरे गांधी जी कभी किसी फिल्म के छोटे से अंश में गांधीगिरी के रूप में, कभी अखबारों के किसी लेख में छोटे से संदर्भ के रूप में, कमोबेश हर शहर के किसी चौक पर पुतले के रूप में और एनसीआरटी के किताबों के फ्लैप में जंतर देते हुए दिखते।

“तुम्हें एक जंतर देता हूं। जब भी तुम्हें संदेह हो या तुम्हारा अहम तुम पर हावी होने लगे, तब यह कसौटी आज़माओ। जो सबसे गरीब और कमज़ोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा? क्‍या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा? क्‍या उससे वह अपने ही जीवन और भाग्य पर कुछ काबू पा सकेगा? यानि क्‍या उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज्य मिल सकेगा, जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है? तब तुम देखोगे कि तुम्हारा संदेह मिट रहा है और अहम समाप्त होता जा रहा है।”

शब्दों के माध्यम से गांधी के साथ हुआ यह साक्षात्कार ज़्यादा करीब महसूस हुआ।

इन तमाम उदाहरणों से गांधी जी के बारे बनती-बिगड़ती समझ अधिक विकसित होती है। आज के सोशल मीडिया के दौर में एडिट की हुई तस्वीरों ने गांधी जी के बारे विकृत समझ अधिक बनाई है। जिसने अल्बर्ट आइन्स्टीन के कथन को गलत साबित किया जिसमें आइन्स्टीन ने कहा था, “आने वाली पीढ़ियां शायद ही इस बात पर विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस का बना हुआ यह आदमी सचमुच कभी धरती पर था।”

ज़ाहिर है कि गांधी हमारी स्मृतियों और जीवन में अच्छे-बुरे दोनों ही संदर्भों में जीवित हैं। कहीं वो आज़ादी के नायक हैं, साबरमती के संत हैं, तो कहीं वो आज़ादी के साथ मिले विभाजन के खलनायक भी हैं।

गांधी के बारे में ठोस समझ बनाने के लिए ज़रूरी है कि गांधी से संवाद की स्थिति को बनाया जाए उनके लेखों, उनकी किताबों और उनके विचारों के माध्यम से। उनकी लिखी किताबें या उन पर लिखी गई किताबें, उनके दौर में समकालीन विषयों पर उनके लेख और पत्र जो गांधी जी से असहमतियों के बाद भी निरतंर संवाद की स्थिति को बनाए रखते हैं। गांधी जी से बेहतर संवाद की स्थिति एम.ए. के दिनों की क्लासों, सेवाग्राम आश्रम में उनको महसूस करते हुए, गांधी को पढ़ते-समझते और बहसों के बाद ही बन पाई।

उनके दौर में हर समकालीन व्यक्तित्व- नेताजी सुभाषचंद्र बोस, डॉ. अंबेडकर, जिन्ना, राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और यहां तक कि सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू तक उनसे कई विषयों पर घोर असहमति रखते हुए भी संवाद की स्थिति को समाप्त नहीं कर पाते थे। इन सभी को यह पता था कि मज़बूत लोकतंत्र के लिए वैचारिक असहमति का होना ज़रूरी है।

महात्मा गांधी से इन वैचारिक असहमतियों ने उनके विचारों को इतना प्रभावशाली बनाया कि कई प्रभावशाली लोगों मसलन नेल्सन मंडेला, दलाई लामा, मिखाइल गोर्बाचोव, अल्बर्ट श्वाइत्ज़र, मदर टेरेसा, मार्टिन लूथर किंग (जू.), आंग सान सू की, पोलैंड के लेख वालेसा आदि लोगों ने अपने-अपने देशों में गांधी की विचारधारा का उपयोग किया और सफलतापूर्वक अपने देशों में परिवर्तन लाए।

महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता के सवाल पर उनके विचार बंद कमरे के अंधेरे में रोशनी की बाट जोहते हुए ही लगते हैं। महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता, पर्दा प्रथा और वैश्यावृत्ति पर महात्मा गांधी के विचार परंपरा और आधुनिकता के दायरे में बंधे हुए से ही दिखते हैं। जाहिर है कि महिलाओं के सवालों पर महात्मा गांधी के अपने सामाजिक पूर्वाग्रह थे, जिनसे मुक्त होने की कोशिश करने के बाद भी वो उसे मुक्त नहीं हो सके। महिलाओं की मुक्ति पर उनके प्रयास समानता की बजाय सुधारवादी दिखते हैं। बाद के दिनों में महिलाओं की भागीदारी के सवाल पर उनकी राय बदली भी, शुरूआत में वो इसके हिमायती नहीं थे।

गांधी के साथ निरंतर संवाद की मज़ेदार बात यह है कि वह आपको हमेशा गतिशील बनाए रखते हैं, ज़रूरी नहीं कि इसका एक सुखद अंत मिले। गांधी ‘मेरे सपनों का भारत’ में लिखते हैं, “भारत की हर चीज़ मुझे आकर्षित करती है। सर्वोच्च आकांक्षाएं रखने वाले किसी व्यक्ति को अपने विकास के लिए जो कुछ चाहिए, वह सब उसे भारत में मिल सकता है।” यह कथन आपको एक बार फिर से गतिशील बना देता है। गांधी जी को पसंद-नापसंद करने के लिए ज़रूरी है कि उनसे संवाद को कायम किया जाए, उनके विचारों से वार्तालाप किया जाए, एकालाप नहीं।

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