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जब लगे कि जीवन क्या है तो हिंदी सिनेमा के ये गाने सुनिए

Posted by Syedstauheed in Art, Hindi
January 16, 2018

 

सिनेमा में ‘भाग्य की अवधारणा’ कहानी, पात्र, हालात एवं गीतों के माध्यम से प्रस्तुत हुई। 70 के दशक में बड़े बजट की फिल्मों के सामानांतर कम लागत वाली फिल्मों का चलन बढ़ा।

बासु चटर्जी की ‘रजनीगंधा’ और ‘छोटी सी बात’ ऐसी ही फिल्में थी। अमोल पालेकर, विद्या सिन्हा, सलिल चौधरी और योगेश की समानताओं और अन्य एकरुपताओं के साथ दोनों फिल्में एक दूसरे के ‘विस्तार’ सी हैं। बासु चटर्जी की ‘छोटी सी बात’ में नायिका का प्यार शर्मीले नायक के लिए है, उसका भाग्य इस दृष्टि से ठीक नहीं कहा जा सकता कि इज़हार करने में नायक का चरित्र ही बड़ी बाधा है।

फिल्म ‘छोटी सी बात’ में योगेश ने अभिनेत्री विद्या सिन्हा के उलझन भरे किरदार के लिए एक गीत ‘न जाने क्यूं होता है यह ज़िंदगी के साथ…’ लिखा। महानगर में काम करने वाली महिला की उलझन को इसमें देखा जा सकता है।

फिल्म में विद्या का निभाया किरदार दीपा उलझन में है कि प्यार के रुप में वह बदलाव का स्वागत कैसे करे? प्यार को लेकर उसे जल्द ही कोई फैसला लेना होगा अन्यथा यह बहार गुम हो जाएगी। वह अनचाही नियति की परीक्षा में घेर ली जाएगी। यहां अमोल पालेकर का अंदाज़ दीपा (विद्या सिन्हा) के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है। अब दीपा किस तरह अपनी चाहत को अभिव्यक्त करे?

जवाब योगेश के शब्दों के माध्यम से मिल जाता है। इस तरह एक गीत के माध्यम से किरदार की किस्मत को पूरे प्रकाश में रख दिया जाता है। अमोल पालेकर जैसे किरदार को प्यार व्यक्त करने में उलझन रही, ऐसे हालात से निपटने के लिए ड्रीम सीक्वेन्स का प्रयोग हुआ। गीत ‘जानेमन-जानेमन…’ में स्वप्न को माध्यम बनाकर विद्या सिन्हा और अमोल पालेकर का रोमांस रचा गया।

राजेश खन्ना अभिनीत ‘सफर’ में भी ज़िंदगी के दोहरे और उलझन भरे पक्ष को बताने का प्रयास किया गया। फिल्म में जीवन पर प्रकाश डालने वाले कुछ सुंदर गीत दर्ज हैं। गीतकार इंदीवर के गीत ‘नदिया चले रे धारा…’ और साहिर का ‘ज़िंदगी का सफर है यह कैसा सफर…’ जैसे गीत यादगार गीतों में शुमार हैं। गीत ‘नदिया…’ में जहां एक ओर जीवन को प्रवाहमय बताया है, वहीं ‘ज़िंदगी का सफर’ में जीवन के उलझन भरे पक्ष का अन्वेषण किया है। इस तरह एक गीत में कर्म को ‘सर्वोपरि’ तो दूसरे गीत में ‘नियति’ को बलवान कहा गया है। दोनो गीत अपने-अपने स्थान पर जीवन के दो पहलुओं को समझने में सार्थक और उपयोगी कहे जा सकते हैं।

हिन्दी सिनेमा में 70 के उत्तरार्ध तथा 80 के आरंभिक समय को अभिनेत्री रीना राय के उदयीमान समय के रूप में भी देखा जाता है। इस दौरान रीना राय ने अपनापन, धनवान और अर्पण जैसी उल्लेखनीय फिल्में की। रीना राय पर फिल्माए कुछ स्मरणीय गीत उस वक्त के हस्ताक्षर के रूप में उपस्थित हैं। जीवन और नियति को समझने में यह गीत उपयोगी हो सकते हैं। आनंद बक्षी का लिखा गीत ‘आदमी मुसाफिर है…’ जीवन का एक मार्मिक पक्ष बताता है। सफर कभी जीवन की एक सहज प्रक्रिया है तो कभी हमारी नियति का ही प्रतिरूप है। ‘आदमी मुसाफिर’ में सफर को एक ओर सहज गतिविधि की नज़र से रखा गया तो दूसरी तरफ इससे सामान्य सी प्रतीत होने वाली दिनचर्या का मार्मिक पक्ष भी समझ में आता है।

बस में यात्रा कर रहे अभिनेता सुधीर दल्वी और निवेदिता श्राफ पर विशेष तौर पर फिल्माए इस गीत में जितेन्द्र और सुलक्षणा पंडित को भी दिखाया गया है। गीत को फिल्म में थीम की तरह प्रयोग में लाने का सफल प्रयास हुआ। इसे कहानी के बीच-बीच में पार्श्व गीत के रूप में भी सुना जा सकता है। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, आनंद बक्षी, मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर ने ‘आदमी मुसाफिर है’ को स्मरणीय बना दिया।

फिल्मकार ह्रषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी ‘आनंद’ (1971) के बाद, गीतकार योगेश को सिने जगत में उचित सम्मान मिला। फिल्म के कभी ना भुलाए जा सकने वाले गीत आज भी लोकप्रिय बने हुए हैं। कहा जाता है कि ह्रषिकेश जी को ‘आनंद’ बनाने की प्रेरणा मूलत: एक जापानी फ़िल्म से मिली थी। ह्रषिकेश दा कर्म और भाग्य के परस्पर विरोधी स्वर से इस कदर प्रोत्साहित हुए कि कहानी के केन्द्र में महिला को रखकर उन्होंने ‘मिली’ भी बनाई।

आनंद मौत से जूझते पुरूष पात्र की कहानी है। ज़िंदगी के महत्वपूर्ण पहलुओं को बताने वाले कुछ बेहतरीन गीत ह्रषिकेश मुखर्जी की ‘आनंद’ में दर्ज हैं। ‘ज़िंदगी कैसी है पहेली…’, ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाए…’ को सुनकर कर्म और नियति के संघर्ष की संवेदना को सहज ही स्पर्श किया जा सकता है। इन गीतों में ‘कहीं दूर जब दिन…’, ज़िंदादिल आनंद की ज़िंदगी के दर्दनाक पहलू को बताकर दर्शकों को सीधे उसकी मौत की याद दिलाता है। जबकि ‘ज़िंदगी कैसी है पहेली…’ में जीवन को एक उलझन के रुप में प्रस्तुत किया गया।

योगेश के गीतों के माध्यम से आनंद जीवन की असमानता को व्यक्त करता है। जब आनंद का दु:ख शब्दों में बयान हुआ तो जीवन की एक नई अवधारणा सामने आई। जीवन में ‘कर्म उत्साह’ और ‘भाग्य पीड़ा’ के दो पाटों को इस गीत से समझा जा सकता है।

ह्रषिकेश मुखर्जी की प्रस्तुति ‘गोलमाल’ में ज़िंदगी को एक अलग अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया। फिल्म के गीत ‘आने वाला पल जाने वाला है…’ में राहुल देव बर्मन, गुलज़ार और किशोर कुमार की टीम ने एक सहज प्रस्तुति दी। सरल तौर पर देखें तो यह एक ‘हल्का-फ़ुल्का’ गीत प्रतीत होता है। थोड़ा गौर करें तो ‘आने वाला पल…’ की सहजता में भी कर्म और नियति के संघर्ष को अनुभव किया जा सकता है। गुलज़ार ने एक ओर ज़िंदगी को उत्साह के साथ भरपूर जीने का नुस्खा दिया, तो दूसरी तरफ जीवन-मृत्यु के पाटों का उल्लेख करने से भी नहीं चूके।

गीत ‘यह जीवन है…’ (फिल्म- पिया का घर) गीतकार आनंद बक्षी की एक सरल और उत्तम रचना है। गीत में ज़िंदगी के स्वरूप को बताकर इसे सहजता से स्वीकार करने को कहा गया। हज़ारो लोग बेहतर भविष्य की खोज में मुंबई का रुख करते हैं, पर क्या हर कोई इस प्रक्रिया में सफल होता है? मुंबई ही क्या बल्कि किसी भी महानगर में संघर्ष एक कड़वा सच है।

दरअसल ‘किस्मत’ का फॉर्मूला महानगरीय जीवन की उपज है। कठिन संघर्ष में ‘तकदीर’ की खोज को स्वाभाविक अभिलाषा का प्रतिरूप कहा जा सकता है।

सीमित अवसर भाग्यवादी मान्यता को मजबूत करते हैं। पिया का घर के ‘यह जीवन…’ गीत में भीड़ और जगह की कमी को बताते हुए इसे मिले रूप में ‘स्वीकार’ करने को कहा गया। महानगर के आस-पास आबाद स्लम बस्तियां, अमीर-गरीब खाई का प्रतिबिम्ब हैं। स्लम बस्तियों के बसने में ‘किस्मत का फॉर्मूला’ ही काम करता है, छोटे शहरों से महानगर पहुंची आबादी का एक बड़ा हिस्सा दरअसल अपने भाग्य को आज़माने ही तो यहां पहुंचता है।

इसी तरह ‘मैं पल दो पल का शायर हूं…’ (साहिर), ‘संसार की हरेक शै का बस इतना फसाना…’ (साहिर), ‘कोई लाख करे चतुराई…’, ‘करम के लिखे मिटे न भाई…’ (कवि प्रदीप) और ‘सजन रे झूठ मत बोलो…’ (शैलेन्द्र) जैसे बहुत से गीत जीवन को समझने में कारगर हो सकते हैं।

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