कला और साहित्य के दुश्मन हैं फिल्म पद्मावत के नाम पर आगजनी करने वाले

Posted by Amritanshu Yadav in Hindi, Society
January 27, 2018

‘पद्मावती’ के नाम पर करणी सेना और स्वघोषित राष्ट्रवादियों के रगों में जो भी उबल रहा है वह साहित्य में कल्पना को मारना चाहता है। वह साहित्य के केंद्रीय एवं मूल भाव को मारना चाहते हैं, एक तरह से कहा जा सकता है कि वह साहित्य को ही धराशायी करना चाहते हैं।

पद्मावती की कहानी का जो रूप हमें पता है, साहित्य के लोगों को पता है, संजय लीला भंसाली को पता है, वो कल्पना के सिवाय कुछ नहीं है। मलिक मोहम्मद जायसी ने 1540 ईसा के इर्दगिर्द कल्पनाओं के लब्बोलुआब को चढ़ाते हुए 13वीं सदी की प्रेम और वियोग की एक बहुप्रशंसित कृति ‘पद्मावत’ की रचना की थी। पद्मावत पढ़ने वाले जानते हैं कि इस कृति का सबसे रोचक अध्याय राजा रतन सिंह और उनकी पहली पत्नी नागमती के वियोग और पद्मनी के आने में मिलता है ना कि खिलजी के युद्ध से।

जायसी ने प्रेम में लीन होकर जिस प्रकार की सामाजिक सौहार्द की कृतियों का निर्माण किया, वो स्वयं में एक दर्शन हैं।

पद्मावत के इतर भी उन्होंने कल्पनाओं के आधार पर ‘चित्ररेखा’ का निर्माण किया, जो यह बताने के लिए पर्याप्त है कि जायसी कल्पनाओं पर आधारित ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाली रचनाएं करने के उस्ताद थे। एक इस्लामिक सूफी होने के बावजूद जायसी ने सदैव उदारवादी हिन्दू भावनाओं का खयाल रखा। उन्होंने कुरान को केवल कुरान नहीं कहा है, उसे पुराण कहकर भी संबोधित किया है। उन्होंने स्वर्ग या बिहिश्त के लिये सदैव ‘सर्वत्र कैलाश’ का इस्तेमाल किया है। पद्मावत के आरंभ में ही उन्होंने लिखा है कि यह सुनी-सुनाई कथाओं में नया रस लगाकर प्रस्तुत की जा रही है। पद्मावत का एक आरंभिक श्लोक है –

“कवि वियास कंवला रसपूरी। दूरि सो निया नियर सो दूरी।।
नियरे दूर फूल जस कांटा। दूरि सो नियारे जस गुरु चांटा।।
भंवर आई बन खण्ड सन लई कंवल के बास। दादूर बास न पावई भलहि जो आछै पास।।”

इसका भावार्थ है कि संसार मे बहुत कवि हुए हैं जिन्होंने रस से परिपूर्ण कविताएं लिखी हैं और इस कविता को भी रसपूर्ण समझा जाना चाहिए। आज जिस प्रकार पद्मावत को प्रस्तुत किया जा रहा है, उसे देख कर जायसी अपना सिर पीट लेते।

इतिहास में कल्पना के संयोग से न जाने कितनी महान रचनाओं का निर्माण किया गया है। प्रेमचंद के आरंभिक साहित्य में ऐतिहासिक घटनाओं को रस के साथ प्रस्तुत करने को प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। हिंदू कायस्थ होने के बावजूद प्रेमचंद ने ‘कर्बला’ जैसे महान नाटक को रचा, जो इस्लाम के आरंभकाल के कर्बला युद्ध पर ही आधारित था। आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने कुल 30 वर्षों की मेहनत से ‘वैशाली की नगरवधू’ की रचना की। आम्रपाली की कहानी लिखने में उन्होंने कल्पनाओं के नए क्षितिज को भेदा है, किंतु बड़े अफसोस से कहना पड़ रहा है कि साहित्य में कल्पना करना अब रोक दिया गया है। नंगी हकीकत भी लिख देने पर ‘बैन’ हो जाने का खतरा होने लगा है, जैसा कि हांसदा सौवेंद्र शेखर की कृति ‘आदिवासी नहीं नाचेंगे’ के साथ हुआ।

सबसे ज़्यादा दुःख की बात ये है कि हमारे राजनेताओं का एक धड़ा ध्रुवीकरण के नाम पर कुछ भी बोलता जा रहा है। ध्रुवीकरण के नाम पर पद्मावती की अस्मिता को फिल्म में देखने वाले लोगों को उस वक्त हिन्दू महिला अस्मिता की बात समझ नहीं आई जब 1994 में आई शेखर कपूर की फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ में दस्यु सुंदरी फूलन देवी के किरदार में सीमा बिस्वास नंगी कुएं में पानी भरने जाती है। अजीब बात है कि नंगी सच्चाई पर उफ्फ न करने वाले आज कल्पनाओं के आधार पर तोड़फोड़, हिंसा और आगजनी करते फिर रहे हैं।

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