मेरे हरियाणा के लोग इतिहास की कथित तौहीन से गुस्सा हैं, रेप कल्चर से नहीं!

Posted by Roki Kumar in Hindi, Society
January 25, 2018

फिल्म पद्मावत को लेकर चल रहा विवाद रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है। देश के बहुत से हिस्सों में फिल्म को रिलीज़ ही नहीं होने दिया जा रहा है। इस विवादित फिल्म के खिलाफ बहुत से शहरों में प्रदर्शन किया जा रहा है। इस माहौल को देखते हुए बहुत से सिनेमाघरों के मालिकों ने फिल्म लगाने से ही मना कर दिया। अगर हरियाणा की बात करे तो गुरुग्राम में प्रदर्शनकारियों ने स्कूल बस पर हमला बोल दिया जिसके अंदर मासूम स्कूली बच्चे और टीचर थे।

हरियाणा के कई शहरों में इस फिल्म का इतना विरोध हुआ कि उन शहरों में फिल्म को ही बैन कर दिया गया। फिल्म के विरोध के लिए हरियाणा में भी दूसरे राज्यों की तरह हिंसा का रास्ता अपनाया गया। एक फिल्म से मेरे हरियाणा वासियों का खून इतना खौल रहा है कि वो किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हो गए हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि किसी बात से किसी समुदाय या व्यक्ति की भावनाएं आहत हो सकती हैं, लेकिन क्या विरोध करने के लिए हिंसा ही बस एक रास्ता है? क्या अहिंसात्मक तरीके से अपना विरोध ज़ाहिर नहीं किया जा सकता? हर बात पर सड़कों पर उतरकर तोड़फोड़ करना और आग लगा देना ही क्यों ज़रूरी है?

हाल ही में हरियाणा के अलग-अलग ज़िलों में गैंग रेप और हत्या के एक के बाद एक मामले सामने आए हैं, इन सभी घटनाओं में ज़्यादातर केस ऐसे हैं जिनमें अपराध का सामना करने वाली लड़कियों की उम्र 18 साल से कम थी। महिलाओं और बच्चियों के साथ गैंग रेप और हत्या करना, हत्या करके लाश के साथ रेप करना या फिर उनके प्राइवेट पार्ट में किसी वस्तु को डाल दिया जाना मानो आम बात सी हो गई है! लेकिन पता नहीं क्यों ऐसी घटनाओं से लोगों की भावनाएं आहत नहीं होती। कुछ मुठ्ठी भर लोगों और संस्थाओं को छोड़कर किसी ने भी इनका विरोध नहीं किया।

आश्चर्य की बात यह है कि इतनी अमानवीय घटनाओं के चक्रव्यूह से हरियाणा और देश के लोगों की भावनाओं को आंच तक नहीं आई। इतिहास और संस्कृति के नाम पर बच्चों से भरी बस पर पत्थर फेंकने से क्या दिखाने की कोशिश की जा रही है?

जो आज हो रहा है उसके लिए क्यों इनकी भावनाओं पर असर नहीं पड़ता? ऐसे बहुत से सवाल है जो मुझे बार-बार सोचने पर मजबूर करते हैं कि हम किस समाज और कैसी संस्कृति का हिस्सा बन चुके हैं जहां युवा बिना सोचे-समझे हिंसा पर उतारू हो रहे हैं।

एक तरफ विश्व स्तर पर सतत विकास के लक्ष्यों में लैंगिक समानता पर ज़ोर दिया जा रहा हैं, वही दूसरी तरफ 3 साल की बच्चियों के साथ गैंग रेप जैसे अपराध रोज़मर्रा की बात हो गई है। उससे भी शर्म की बात यह है कि इन अमानवीय घटनाओं पर प्रदर्शन करने का समय किसी के पास नहीं है। ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि लोगों को लगता है कि यह घटना उनसे जुड़ी हुई नहीं है। लेकिन समाज में जिस तरह रेप कल्चर की आग लगी है, उसमें अपना-अपना घर बचाना बहुत मुश्किल है।

फिल्मों का विरोध करने वाले इस रेप कल्चर पर क्यूं चुप्पी साधे हुए हैं? आज लोक गीतों और फिल्मों में यौनिक हिंसा को एक मनोरंजन की तरह परोसा जाता है। फिल्मों और गानों में महिलाओं को एक वस्तु की तरह पेश किया जाता है। ऐसे गानों का विरोध करने के लिए कोई सड़कों पर नहीं उतरता, बल्कि हम उनका लुत्फ ही उठाते हैं।

हमारा युवा वर्ग सही मुद्दों से भटककर बेतुकी बातों के लिए हिंसा का रास्ता इख्तियार कर रहा है। हिंसात्मक अपराध तो जैसे युवाओं के लिए खेल व मज़ाक की बात हो गई है। यदि हमारे देश का युवा वर्ग सही मुद्दों पर चुप्पी तोड़कर अपनी आवाज़ उठाए तो हम रेप कल्चर को रोक ही नहीं बल्कि उसे जड़ से खत्म भी कर सकते हैं।

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