अपराध पर लगाम लगाने में बन सकता है यह कारगर उपाय

Posted by Rachana Priyadarshini
February 10, 2018

NOTE: This post has been self-published by the author. Anyone can write on Youth Ki Awaaz.

यह खबर हालांकि बहुत छोटी-सी है, लेकिन बड़े काम की हो सकती है। बिहार की राजधानी पटना से सटे बख्तियारपुर ज़िले में 9 फरवरी को पुलिस ने एक स्थानीय कॉन्ट्रैक्ट किलर को गिरफ्तार किया। गिरफ्तारी के बाद उसके गले में ‘मैं अपराधी हूं’ लिखी तख्ती लटका कर पूरे शहर में चक्कर लगाया गया। उसके पास से बरामद पिस्तौल व गोलियों की उसे माला भी पहना दी गयी थी। उसे देखने के लिए सड़कों पर लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी।

आज-कल जिस तरीके से अपराध और अपराधियों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है, उस पर लगाम लगाने में स्वयं पुलिस और प्रशासन के भी पसीने छूट रहे हैं। एक ओर अपराधियों को पकड़ने और अपराध पर लगाम लगाने के लिए सरकार और पुलिस विभाग नये-नये नियम बना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ‘तू डाल-डाल, मैं पात-पात’ की तर्ज पर अपराधी इसका तोड़ ढूंढने में लगे हैं।

इसके बावजूद एक चीज़ ऐसी है, जो किसी इंसान को गलत रास्ते पर जाने से रोक सकती है और वह है, उसकी सामाजिक और व्यक्तिगत छवि। ऐसे में अपराधियों को सरेआम इस तरह बेपर्दा करने से उनकी सामाजिक छवि धूमिल होती है साथ ही, लोगों को उसकी करतूतों के बारे में भी पता चलता है। इस तरह की सरेआम बेपर्दगी लोगों को उनके कुकर्मों से परिचित भी करवाएगी। उन्हें सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ सकता है और निश्चित रूप से कोई भी इंसान ऐसा नहीं चाहेगा।

मैं अपने बचपन की बात बताऊं, तो हमारे घर के ठीक पीछे एक कुख्यात अपराधी रहा करता था। हमने कभी उसे मुहल्ले में कोई दंगा-फसाद करते या किसी से किसी तरह की अभद्रता करते नहीं देखा था। किसी की भी मदद के लिए वह हमेशा आगे रहता था। इस कारण हम उसे एक सभ्य इंसान के तौर पर जानते थे, लेकिन एक रात जब उसके घर पर पुलिस आयी और उसे गिरफ्तार करके ले गयी, तो पता चला कि वह तो लूटपाट, डकैती और मर्डर जैसे न जाने कितने तरह के अपराध में संलग्न था।

दरअसल कोई इंसान कितना भी बड़ा अपराधी क्यों न हो, वह अपने घर-परिवार और समाज में अपनी पैठ बना कर रखना चाहता है। डराकर या फिर प्यार से वह लोगों को अपने पक्ष में रखना चाहता है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक मैस्लो के अनुसार सामाजिक पद-प्रतिष्ठा की चाहत इंसान की प्राथमिक ज़रूरतों का एक अहम हिस्सा है, जिसे कोई भी इंसान किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता है। अक्सर ऐसे लोग बड़े शातिर होते हैं, वे दुनिया भर में तो आतंक तचाते फिरते हैं, लेकिन अपने आस-पास के लोगों से बना कर चलते हैं। इसके पीछे भी वजह वही होती है- सामाजिक पद-प्रतिष्ठा की चाहत।

हालांकि इस संबंध में पटना हाइकोर्ट के वरीय अधिवक्ता अखिलेश्वर प्रसाद सिंह का कहना है, “पुलिस की नज़र में भले कोई व्यक्ति अपराधी हो सकता है, लेकिन जब तक अदालत में उसका दोष साबित न हो, तब तक उसे अपराधी कहना सही नहीं है।” उनकी बात सही है, लेकिन क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि इस तरह की पहल सही है। हां, इसमें इस बात का ध्यान रखा जाना बेहद जरूरी है कि किसी बेगुनाह इंसान के साथ ऐसा न किया जाए, इस लिहाज से अखिलेश्वर प्रसाद सिंह का कहना सही माना जा सकता है।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.