आज के मुसलमानों के प्रति शंका

Posted by Mudassir Ali
February 9, 2018

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सत्ता के लोभियों ने जंग-ए-आज़ादी के दौर से ही मुसलामानों के साथ खेलना शुरू कर दिया था. कभी मज़हबी हिंसा में झोंक कर तो कभी भेदभाव करके, मुस्लिम कौम का महज़ वोट की राजनीति करने वालों नें भरपूर दोहन किया है. नेहरु और जिन्ना ने तो अपने स्वार्थ के कारण मुल्क को दो टुकड़ों में बाँट दिया लेकिन भारतीय मुसलामानों को अपनी मिट्टी जुदा न कर सके. जिस देश में अशफाकुल्लाह जैसे शहीद रत्न ने भारत माँ के दामन को दागदार होने से बचाने के लिए अपने जान की कुर्बानी दे दी, उस देश का मुसलमान जिन्ना के बहकावे में भला कैसे आ सकता था? मुल्क का बंटवारा होना जब लगभग तय हो गया था, उसी समय लाहौर ला कॉलेज में एक दिन मोहम्मद अली जिन्ना का भाषण हुआ. कुलदीप नैय्यर (वरिष्‍ठ पत्रकार) उस समय वहां पढ़ाई कर रहे थे, जब जिन्ना का भाषण ख़त्म हुआ तो नैय्यर साहब ने उनसे पूछा कि जब देश बाँट दिया जायेगा और उसके बाद कभी अगर भारत पर कोई आंच आती है तो पाकिस्तान का क्या रुख होगा?

इस सवाल पर जिन्ना ने कहा था, “जेंटलमैन, ब्लड ईज थिकर दैन वाटर.” मतलब साफ़ था कि भारत और पाकिस्तान का खून का नाता है और खून हमेशा पानी से गाढ़ा होता है. बहरहाल, पचास फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले इलाकों को चिन्हित करके भारत के सीने पर स्वार्थ के खंजर से लकीर खींच कर पाकिस्तान बना दिया गया. आज लगभग 70 दशक हो गए लेकिन इस देश में मुसलमान बेख़ौफ़ नहीं है. सहमा है, संदिग्ध है और भेदभाव का शिकार है. लम्बी दाढ़ी और सफ़ेद टोपी वाले ये कौन लोग हैं, जिन्हें संदिग्ध निगाहों से देखने की मुहीम कुछ अलगाववादी-कट्टरपंथी संगठन चला रहे हैं?

आखिर अपने ही घर में शक के दायरों में कैद होते जा रहे बहन-भाइयों को नजदीक से कोई देखने की कोशिश क्यों नहीं कर रहा है? ये लोग जो अपने-अपने तरीकों से राष्ट्र की तरक्की में योगदान दे रहे हैं, आखिर पिछड़े और वंचित क्यूँ हैं? भारत में मुसलमान खुद को ठगा हुआ और बेबस महसूस करने लगे हैं. यहाँ मुसलमान घोषित रूप से काफ़िर तो नहीं कहे जाते हैं लेकिन भेदभाव के शिकार जरूर हैं. आखिर क्या कारण है कि चाहे शिक्षा की बात हो, रोजगार की, स्वास्थ्य की या राजनैतिक भागीदारी की, मुसलमान पिछड़ा हुआ नज़र आता है? इस सवाल का जवाब-ढूंढने के लिए इसके राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक पहलुओं पर विचार करना होगा.

भारतीय समाज में धर्म की दखलअन्दाजी जबरदस्‍त है और जनमानस में इसकी पैठ गहरी है. धर्म के ठेकेदारों को इस बात का इल्म है और वे धर्म की आड़ में अनेक मकसद पूरा कर जाते हैं. यहाँ धर्म में कब राजनीति और राजनति में कब धर्म का घालमेल हो जाए पता ही नहीं चलता. चाहे कोई भी पंथ या कौम हो, धर्म के नाम पर लोगों की जनभावना का दोहन करने में पीछे नहीं है. इसी का नतीजा है कि कोई जनसँख्या वृद्धि को किसी एक धर्म की सुनियोजित योजना बताता है, तो कोई धार्मिक झाँकियों को अपने धर्मस्थल के सामने से गुजरने देने से अपने इबादतगाह के नापाक हो जाने का प्रचार करता है.

मेरा एक दोस्त मुझसे हमेशा कहता था – “यार ये मुसलमान अपने मस्जिदों में किसी गैर मुस्लिम को नहीं जाने देते हैं.” मैंने एक दिन उसे सहारनपुर की जामा मस्जिद बुलाया और फिर जामा मस्जिद में ले गया. डरते-डरते वह सीढियों पर चढ़ने लगा और बोला – “यार कुछ होगा तो नहीं?” मैंने उसको यकीन दिलाया कि यह उपर वाले का घर है और यहाँ किसी के आने-जाने पर मनाही नही है. अगर ऐसा होता तो दरवाजे पर ही लिखा होता. हम दोनों काफी देर तक जमा मस्जिद में रहे और लोगों को बंदगी करते देखते रहे. उस दिन के बाद मेरे दोस्त के नज़रिए में बदलाव आ गया और वह इंसान बन गया.  मुदस्सिर अली

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