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आम बजट और आधी आबादी की उम्मीदें

Posted by Prashant Pratyush
February 3, 2018

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16वीं लोकसभा का मौजूदा वित्त वर्ष 2018-19 का केंद्रीय सरकार का आम बजट  तालियां, वाह-वही और आलोचनाएं सब कुछ बटोर रही है। आम बजट की बानगी मौजूदा सरकार के “अच्छे दिन” और “सबका साथ सबका विकास के” तिस्लिमी वादों पर खड़ी होते हुए दिखती है और लोगों के उम्मीदों का दामन भी नहीं छोड़ती है ख़ासकर आधी आबादी की।

देश के हर चुनावों में जिस अनुपात में महिला मतदताओं की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। उसके मद्देनज़र आधी आबादी को सामाजिक सुरक्षा, महिला स्वास्थ्य ख़ासकर सैनटरी नैपकीन पर जीएसटी के हटने, महिला शिक्षा, मातृत्व लाभ, समान वेतन और कामकाजी महिलाओं के लिए के लिए सुविधा को लेकर काफी उम्मीद थी। उस लिहाज से बजट के पहले, आर्थिक सर्वेक्षण की गुलाबी फाइल ने आधी आबादी को काफी उम्मीद बनी, क्योंकि गुलाबी रंग को महिला सशक्तीकरण का प्रतीक है।

मौजूदा वित्त वर्ष 2018-19 का केंद्रीय सरकार का बजट आधी आबादी के लिए संतुलित कहा जा सकता है क्योंकि केंद्रीय बजट में आधी आबादी के लिए अनुमोदित राशी 2920484.37 करोड़ रु. है, जो पिछले सभी बजट के तुलना में अधिक है। इसी के साथ-साथ आम बजट में  महिला और बाल विकास मंत्रालय को 24,700 करोड़ रुपये आवंटित किए गए है जो पिछले बजट की तुलना में 12 फीसदी अधिक है। इसीतरह कई योजनाओं के मद में विस्तार और कुछ योजनाओं के मद में संसोधन किया गया है।

आधी आबादी के लिए योजनाओं के मद पर ध्यान दिया जाए तो महिलाओं के एम्प्लाई प्रोविडेंट फंड(EPF) को 12% के जगह पर 8% किया गया है, जो नौकरीपेशा महिलाओं के हाथों में इनहैन्ड सैलरी में बढ़ोतरी करेगा, यह कामकाजी महिलाओं के लिए अच्छी ख़बर है। इसीतरह से मुस्लिम महिलाओं के लिए अल्पसंख्यक मामलों के लिए बजट में 4197 करोड़ से  करोड़ रु. किया गया है जिसका बड़ा हिस्सा शिक्षा पर खर्च करने की बात कहीं गई है। मौजूदा बजट में महिलाओं को लेकर योजनाओं के मद में आवंटित राशियों का आकंलन किया जाए तो बेटी बचाओं बेटी पढ़ाओं को 200 करोड़ से 280 करोड़ कमोबेश 40 फीसदी बढ़ोतरी, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना का तय बजट 2700 करोड़ से 2400 करोड़ कर दिया गया है, मौजूदा बजट में इस योजना में 300 करोड़ की कटौती, राजीव गांधी क्रेच स्कीम में 200 करोड़ से 128.39 करोड़, प्रधानमंत्री उज्जवला योजना का लक्ष्य 5 करोड़ से 8 करोड़ किया गया है, जिसमें BPL परिवार की महिला को 1600 रू. की आर्थिक मदद दिया गया है। महिला सशक्तिकरण के लिए महिला शक्ति केंद्र को 267 करोड़ दिए गए है जो पिछले बजट में 64 करोड़ ही था। इस तरह महिलओं के एक मद में कमी और दूसरे मद में बढ़ोतरी के हिसाब से कहा जा सकता है कि बजट में शहरी और ग्रामीण आधी आबादी को संतुलित रूप से खुश करने की कोशिश की गई है।

मौजूदा बजट में महिलाओं के मद में कुछ जमीनी सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है। आधी आबादी के लिए उपलब्ध कराई गई राशि भी पूरी तरह से खर्च नहीं हो पाता है, लिहाजा अगले बजट में उस में राशि में कटौती कर दिया जाता है। जबकि समस्याएं जस की तस बनी रहती है। मसलन, पिंक फाइल में बंद आर्थिक समीक्षा के रिपोर्ट के अनुसार उज्जवला योजना में मात्र 19 प्रतिशत सिलेंडर ही दूसरी बार रिफिल किए गये। जाहिर है जिन BPL परिवार की महिलाओं को LPG कनेक्शन मिले है वो सब्सिडी में छूट के बाद भी सिलेंडर रिफिल कराने में सक्षम नहीं है। इसीतरह अल्पसंख्यक महिलाओं के शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए रकम आवंटित किया गया जो स्वागतयोग्य कदम है, परंतु अल्पसंख्यक महिलाएं केवल आर्थिक कारणों से उच्च शिक्षा से महरूम नहीं रहती है उसके अन्य कारणों की पड़ताल और उस मद में बजट को केंद्रीत करने की आवश्यकता है। महिला सुरक्षा के मामलों में बजट की खामोशी भी निराश करती है इस मद में बजट में विशेष प्रावधान की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जाती रही है, परंतु महिलाओं के सुरक्षा के सवाल को केवल सीसीटीवी तक ही सीमित कर देना उत्साह नहीं जगाता है। इसी तरह कामकाजी महिलाओं के लिए 26 हफ्तों की सवैतनिक मैटरनीटी लींव का प्रावधान सरकार ला चुकी है पर इसका लाभ अभी भी महिलाओं को नहीं मिल रहा है, उल्टा कपंनियों ने गर्भवती महिलाओं को नौकरी देने से ही हाथ जोड़ लिया है। जाहिर है कि नीतियों के निर्धारण और उसके सुचारू रूप से क्रियान्वयन में गहरी खाई है जो आधी आबादी को सरकार के प्रति निराश करती है।

वास्तव में भारत जैसे देश को आधी आबादी के लिए बजट निर्धारण में यह सोचने की जरूरत है कि महिलाएं करवा-चौथ की थाली, रसोई सिलेंडर, दाल-अनाज में दामों में कटौती नहीं बल्कि सेनिटरी नेपकिन, सार्वजनिक स्थलों पर शौचालय, सुरक्षा, तीन तलाक/तलाक के बाद आर्थिक मदद की उम्मीद बजट में चाहती है। समय के साथ आधी आबादी ने भी अपनी जरूरतों में बदलाव किया है। समस्या यह है कि बजट में देश की महिलाओं की जरूरतों और उम्मीदों को परिवार या घरेलू जरूरतों से जोड़कर देखा जाता है जबकि बदलते हुए वक्त और सामाजिक स्थिति के अनुसार आधी आबादी आत्मनिर्भर होने के लिए आम बजट से अन्य कई उम्मीद रखती है, यह स्थिति शहरी और ग्रामीण महिलाओं में एक ही तरह की है। कामकाजी आत्मनिर्भर महिलाओं के तरह ही ग्रामीण भारत में कृषि और अन्य क्षेत्र की महिलाएं भी अपने स्वास्थ्य, सुरक्षा और स्वयं सबल होने के लिए आम बजट में विशेष प्रावधान चाहती है।

मौजूदा या आगे आने वाली किसी भी सरकार को आम बजट से आधी आबादी के जरूरतों को समझने की जरूरत है। यह समझना होगा कि जिस अनुपात में आधी आबादी ने देश के लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए मतदान करने में अपनी भागीदारी को मजबूत को किया है देश के आम बजट का महिलाओं के हक में होना भी जरूरी है।

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