उम्मीदों और चुनौतियों का बजट।

Posted by Sandeep Suman
February 2, 2018

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मोदी सरकार का या पूर्णकालिक बजट कई मायनों में खास रहा, उत्सुकता इसलिए अधिक भी थी क्योंकि ये मौजूदा सरकार का आखिरी पूर्ण बजट था,बजट से हर कोई उम्मीदे लगाए बैठे था लेकिन पिछले चार बजट के तरह या बजट भी ऐसा नही रहा जो लोकलुभावन हो या सबको सन्तुष्ट कर सके। एक और जहाँ नौकरी-पेशा मध्यवर्ग खुद को खाली पा रहा है तो दूसरी और बाजार की प्रतिक्रिया मिलीजुली है, लेकिन इन सबके बावजूद बहुत कुछ ऐसा है जो जिससे आम आदमी, खास कर गरीब और ग्रमीण भारत राहत की सांस ले सके, इसमे ग्रामीण भारत और निम्न तबके में बढ़ती बेचैनी को कम करने की कोशिश की है, भले ही अगले वर्ष होने वाले चुनाव से पूर्व की ये तैयारी हो किन्तु उनकी दशा-दिशा सुधारने के लिए एक ठोस कदम वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने बजट में रखा है जो स्वागत योग्य है। बुनियादी ढांचे पर जोड़ देते हुए सरकार ने ग्रामीण भारत को केंद्र में रखा है, गाँवो को सड़कों के माध्यम से बाजारों, स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों से जोड़ने का कदम स्वागतयोग्य है। अगले वित्तवर्ष में बुनियादी ढांचे पर लगभग छह लाख करोड़ रुपए राशि खर्च की जाएगी। कृषी की हालत सुधारने के लिए ई-मार्केट और स्थानीय बाजारों के साथ मिलकर एक समिति द्वारा बाहरी क्षेत्र.के प्रबन्धन और घरेलू सुधारों को लागू करने की ज़िम्मेदारी सौपी है। इससे न केवल किसानों की बाजार तक पहुँच बढ़ेगी साथ ही साथ जुखिम भी कम होगा। खेती और किसानों की दशा सुधारना प्राथमिकता में होना चाहिए, क्योंकि अर्थव्यवस्था का पहिया सही तरीके से घूमे इसके लिए ग्रामीण भारत की क्रय शक्ति बढ़ाना आवश्यक है, इसे समाज सरकार ने धयान रखना की किसानों को उसके लागत से कही अधिक मूल्य मिलना चाहिए और समय की मांग के साथ ग्रामीण ढाँचे पर ध्यान दिया।
सामाजिक क्षेत्र  के मामले में भी सरकार ने इसबार समझदारी दिखाई है, चुनावी रेवड़ियां बाटने के बजाय में शिक्षकों के शोध एवं विकास और प्रशिक्षण जैसे विषयों पर ध्यान केंद्रित किया है। दीक्षा जैसे कार्यक्रमो के द्वारा शिक्षकों को प्रशिक्षित किये जाने का प्रावधान है वही स्वास्थ्य के मुद्दे पर पहले से अपनाई नीति पर आगे बढ़ते हुए इसका दायरा व्यापक और विस्तृत कर सही दिशा देने का प्रयत्न किया है। टीवी जैसी बीमारियों से लेकर शौचालय बनाने की योजना है तो चालीस प्रतिशत आवादी को मुफ्त इलाज की सौगात है। निजी आयकर दरों में मध्य वर्ग को निराश हाथ लगी है तो करो के मामले में उद्योगों की मांग लगभग मांग ली गई है।
ग्रामीण और सामाजिक क्षेत्र में कई गई घोषणाओं को बड़ी हद तक पूरा करना सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी, कार्यकाल के आखिरी वर्ष में योजनाओ को धरातल पर लाने की चुनौती होगी। पिछले बजट को भी ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने वाला बजट कहा गया था, किन्तु वर्ष के अंत तक ज्यादा असर जमीन पर नहीं छोड़ सका है। स्पष्ठ सरकार को ग्रामीण,सामाजिक और कृषि क्षेत्र में में अनुकूल नतीजे लेन के लिए खासी मेहनत करनी पड़ेगी तब ही बजट का सही आशय निकल पाएगा और जो जोखिम सरकार उठा रही है उसका फायदा उन्हें आगामी चुनाव में मिलेगा। रोजगार देने के मामले पर अनिवार्य तौर पर निगाह रखनी होगी क्योंकि सरकार जो भी कहे पिछले चार वर्षों में रोजगार का सृजन उस प्रकार नही हुआ जिस प्रकार होनी चाहिए थी क्योंकि देश की एक बड़ी आबादी युवा है और उसकी नाराजगी सरकार को मुश्किल में डाल सकती है।
कुल मिलाकर बजट की खासियत ये रही कि लोकलुभावन बजट को धता बता कर सुधार पर जोड़ दिया गया। कृषि, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और बीमा जैसे क्षेत्रों को तव्वजो दी गई। सुकून देने वाली बात ये है कि सरकार का मकसद ईज ऑफ डूइंग के साथ ईज ऑफ लिविंग यानी आम आदमी का जीवन सरन बनाना भी है, अन्य सरकारों के चुनावी वर्ष में पेश बजट के मामले में ये बेहतर बजट है, किन्तु देखना ये है कि सरकार इसे धरातल पर पहुँचा पाती है या नहीं।

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